उपन्यास -परछाइयों का!
हम दोनों!
समुन्दर में डूबे नहीं...
पहाड़ों पर घूमे नहीं...
और
बरसती फ़िज़ाओं और महकती हवाओं में..
खोए नहीं...
और
यही कुछ बातें...
हमारे "उपन्यास" की.. किवदन्ती कहानिया..
और जीवन स्पंदन बन गई...
इस जनम के लिए!
मेरी तेरी...
कहानी में
"हम" शब्द न आ पाया तो क्या हुआ...
यही नियति और उसका दस्तूर था...
जिसे हमने निभाया भी....
बड़ी ही पाकीजगी... और संजीदगी से...
और...
हम-दोनों की यही बात.. गवाह बन गई की -
दो परछाइयों ने कोशिश तो की थी -
हम साया बनने की...
पर
ऐसा हो न पाया!
कुछ न कुछ...
रूहानी तो होता है...
जिसपर...
हमारा बस.
नहीं होता...
और
वही रूहानी वाक्या... बन जाता है...
एक पूरी ज़िन्दगी का तिलिस्म!
जब कुछ अच्छा हो जाता है...
तो यकीन नहीं होता न.. की ये हमने किया है???
मेरा तुम्हारा प्यार भी ... कुछ ऐसा ही...
हो गया था!
जिसे...
हम दोनों ने...
नहीं किया था...
इतना पावन और पुनीत...
बस...
यूँ ही...
हो गया था...
कुछ ऐसा की...
अब ..
हम जब कभी भी... मिलेंगे...
तो हमारी नज़रें....
न झुकेंगी....
एक दुसरे के सामने!
हमने नहीं किया -
प्रकृति को अनावृत...
सौंदर्य को सशंकित... और
प्रेम को कलंकित...
बस ..
हवा की मानिंद मिले... और
पेड़ के झरते पत्तों की मानिंद...
दूर हो गए...
हमेशा के लिए -
अनछुए...
अनासक्त और अविचलित!
आज...
जब हमदोनों के बच्चे...
बड़े हो रहे हैं...
तो शुक्र है...
हम-दोनों...
अपने फूलों से...
वही सोंधी मिटटी की महक की उम्मीद...
कर सकते हैं...
जो कभी..
हमने अपने अंदर समेट कर...
रचाई और बसाई थी..
प्रेम की सार्थकता और पवित्रता की खातिर!!
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