चूल्हे की धीमी आंच में पक रही है-
ज़िन्दगी!
आहिस्ता आहिस्ता....
धीरे-धीरे...
बिलकुल -
अपनी मोहब्बत के जैसे...
तप रही है.. ज़िन्दगी!
खप रही है -ज़िन्दगी!
खिसक रही है -ज़िन्दगी
निचुड़ रही है -ज़िन्दगी!
हर बार -
"ज़िन्दगी की देगची"
के ढक्कन को उठा कर देख लेता हूँ....
की कितनी पकी?
और कितनी रह गई है ; अधपकी?
मेरी ज़िन्दगी की मेरी खिचड़ी?
कभी ....
उँगलियों से मिथिलता
हूँ...
तो कभी जीभ से चखता हूँ....
खुशबू से भी सोचता
हूँ...
अब बहुत वक़्त हो चूका...
पक गई होगी
ज़िन्दगी!
पकते पकते थक न
गई हो -ज़िन्दगी!
इसी उहापोह में...
उठा देता हूँ...
कभी कभी....
"ज़िन्दगी की खिचड़ी" का वजनी ढक्कन......
और देगची के..... ढक्कन के भीतर...
दिख जाते हैं.....
वे सारे स्वाद या परिदृश्य.....
जो मेरे ही कर्मों का.... प्रतिफल और प्रतिबिम्ब हैं....
ज़िन्दगी के.....
चूल्हे-चौंके में...
आंसूं तो बहुत आये..
पर
आंसूं के बाद....
कुछ ऐसे पल....
भी आये.....
जो ताउम्र....
मन को ; बहुत भाये!
तपती हुई लकड़ियों से आंच भी बहुत लगी...
और कई बार तो..... जल भी गया.....फिर
जख्मों से उबर भी
गया...और
कुंदन बनने की.... कोशिश में......
चन्दन तो बन ही गया.... और -
अपनों के जीवन में शीतलता देकर.....
संभल भी गया!
परन्तु....
आखिर में -
अब...
जब की मोटे लेंस के चश्मे ने...
आँखों पर...
अपना कब्ज़ा...
कर लिया है.....
बालों ने भी...
अपनी रंगत...
बदल कर...
सफ़ेद रंग को...
अपना नया चेहरा..
बना लिया है...
और टूटते हुए...
दाँतों ने -
जीभ और मसूड़ों के साथ....
नज़दीकियां बढ़ा ली हैं.. ज़िन्दगी में-
खिचड़ी के अलावा... कुछ खाने का... औचित्य रहा भी नहीं!
आप सोचोगे....
किसने सिखाया ये
खिचड़ी बनाने और खाने का हुनर?
सिर्फ एक जवाब -
मेरे -
प्यारे पापा!
"सच मैं कितना भाग्यशाली हूँ-की
मुझे.....
उस "ज़िन्दगी की.... थाली" में.....
खिचड़ी खाने का.... मौका मिला...
जिस थाली में......
मेरा छोटा सा परिवार... "प्यारे पापा" के साथ... बिना चम्मच के.... उँगलियों से खाते थे -खिचड़ी ; एक साथ!"
असल में खिचड़ी कुछ नहीं....
संस्कार हैं!
जीवन के मधुर.... चित्रहार हैं!
माँ-बाप द्वारा....
बच्चों को दिए.....
उपहार हैं!
आओ मित्र!
हम भी छोड़ें...
अपना हुनर...
अपनी खिचड़ी...
अपने बच्चों को...
पिरो कर-
भारतीयता के ज़मीनी संस्कारों में....
की कभी...
वे भी कहें की-"ये बातें उन्होंने अपने दादाजी या पापा से आत्मसात की थी! "
(Gaurav!)
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