Monday, March 27, 2017

गर्मी में बंटता इंसान !

गर्मियों में असल औकात पता चलती है ; जब एसी कूलर और फर्राटा पंखों के बीच बंट जाता है इंसान !
जब फ्रिज़ सुराही और मटकों की दीवार खड़ी हो जाती है हलक में ठंडी प्यास बन कर !
जब जूस,कोल्ड ड्रिंक लस्सी ठंडाई और शरबत बयां करने लगते हैं ;आदमी की हैसियत !
जब आइसक्रीम कुल्फी और बर्फ के गोले भी सेंध लगा कर बचपन को बाँट देते है अमीर गरीब की गर्मी की तपन को !
जब रे-बैन,फैंदी और बरबरी जैसी चश्मों की विश्वस्तरीय ब्रांड तय करते हैं ;दुनिया से रूबरू होने की जद्दोजहद में आँखों की औकात !
वर्ना सर्दियों में तो
रुई की रज़ाई में दुबक जाते हैं सारे अमीर और गरीब जानवर ;
एक इंसा के नक़ली भेष में !
सच यार !
गर्मियों में गर्मी से निजात पाने को ये आदमी इतना नीचे गिर जाता है कि -बस बेलिबास होने से रह जाता है !

Saturday, March 25, 2017

"चहलक़दमियों का  इश्क़ था तफ़रियों में खत्म हुआ !"

इश्किया अंदाज़ में की थी ...
हम दोनों ने मोहब्बत ;
और कुछ लोग उसे इबादत समझ बैठे??
न फना होने की गुंजाइश इधर थी और
न उधर !
कुछ बातें इधर थीं ...
जो मन में रहीं ...तो
कुछ बातें उधर थीं ...
जो तन में रहीं !
बस यूँ ही ...
"चहलक़दमियों का  इश्क़ था
तफ़रियों में खत्म हुआ !"
अब तुम सोचते थे कि -
हम लैला-मजनूँ बन ..
तुमसे दरख्वास्त करेंगे ..
तो गलतफहमीं थी ;
तुम्हारी !
हम इश्क़ में ...
पाने का नहीं ...
खोने का हुनर रखते हैं !
अरे ज़िन्दगी है ;
ऐसे कई धक्के लगते रहते हैं ...
लेकिन ..
यकीनन हम नहीं रुकते हैं !
अरे ..
हमारी मोहब्बत ...
जरा हट के थी !
बस यूँ समझ लो ..
चार क़दमों का साथ था ..
पांचवें क़दम पर ..
वो अपनी मन्ज़िल ...
अपने नए सफर पर ...
अपने नए हमसफ़र के
पहलू में ...
और मैं ;
तन्हां-अकेला-वीरान-ठूंठ  वटवृक्ष ...
आने वाले प्रेम पथिकों को रास्ता बताने के लिए !
बस यूँ ही ..समझ लो ..
"चहलक़दमियों का इश्क़ था
तफ़रियों में खत्म हुआ !!"

Friday, March 24, 2017

ख्वाबगाह की दरकार!


किसी को बड़ा सा घर चाहिए जहां ज़िन्दगी की भाग दौड़ के बीच ..
सारी खुशियां मिल सकें ! तो ...
किसी को घने जंगलों के बीच इक छोटी सी झोपड़ीनुमा कुटिया चाहिए ...
जहां ज़िन्दगी की अफरा तफरी के बीच ...
थोड़ी सी खुशियां मिल सके !
वाह री ज़िन्दगी !
क्या दस्तूर हैं तेरे!
किसी को जंगलों में चाह है ;मोहब्बत की तो ...
किसी को महलों की दरकार है !
शौक अपने अपने तो
चाह भी अपनी अपनी !
आदमी आदमी है और
इंसान इंसान !
फर्क थोड़ी सा है ..
"कोई गलतफहमियों के दायरों में है तो कोई हक़ीक़त की पगडंडियों में !!"

कहीं तो कोई होगा!

Good Night Zindagi!
कहीं तो कोई होगा जो .. समझेगा मेरा यह धुंआ ?
कहीं तो कोई होगा जो ... समझेगा मेरी यह राख ?
और
कहीं तो कोई होगा जो ... समझेगा मेरी यह आग ?
या ..
यूँ ही धुंआ, आग और राख के दायरों के बीच से हवा बन निकल जाऊँगा ...
बहुत दूर ...
क्षितिज से उस पार ..
कभी नहीं लौटने के लिए ??

Thursday, March 23, 2017

न्योता मुस्कराने का !

उम्मीदों के दामन में सैकड़ों  सितारे हैं !
उन सितारों के बीच एक आधा चाँद भी है !
जो पूरी रात ...
जागता रहता है ...
मेरी ख्वाइशों के माफ़िक़ कि ...
अमावस ख़तम होगी तो  ...
पूरनमासी भी आएगी और
दूधिया आकाश में ..
मुस्कराता चाँद ..
मुझे भी ..
मुस्कराने का न्योता देगा !

लेकिन ....
ज़िन्दगी में पूर्णमासियों की ..
बाट जोहते जोहते ....
कितनी अमावस्याएं ...
निकाल दीं और ..
अब तो जीवन की ..
अमावस्या की बेला भी ..
दस्तक देने लगीं हैं ...
लेकिन ..
अभी तक ...
कोई मेरे मुस्कराने का ...
न्योता लेकर नहीं आया !"

"खंडहर की वीरानियों में
कुछ दिए हैं ...
टूटे हुए से ;
उन्हीं को ...
पूर्णमासी का चाँद समझ ...
काम चलाओ ;दोस्त ...
बहुत उदास है ;
रात !!

Tuesday, March 21, 2017

मोहपाश के धागे और हम !

तृप्त आत्माओं सा ...
बनना पड़ेगा ...
इस जीवन उपवन के ...
दर्शन में ;
वर्ना
निरर्थक हो जाएगा ...
प्रसंग तुम्हारा ...
यदि रहे तुम ..
प्रेमपाश के बन्धन में !

मोहपाश में पड़कर ...
तुमको....
सिर्फ यहां ...
अपमान मिलेगा !
बदनामी और लज्जा रूपी .. 
किंचित मोह का ज्ञान मिलेगा !

वहीँ अगर तुम ;
आसक्ति और प्रेमपाश का त्याग करोगे ...
यकीनन सम्मान मिलेगा !
मर्यादा और पवित्रता का .. 
सार्थक रसपान मिलेगा !

बंधु !
यह जीवन ...
ऐसा ही है !
"लघु है ..
तो कहीं लम्बा !
लस्सी है ....
तो कहीं मट्ठा !"

"कभी तिरस्कृत कभी पुरुस्कृत !"
कभी अनावृत कभी चर्चित !
कभी प्रसंशित कभी शापित !

इस जीवन के महासफर में  ...
सिर्फ वही है ...
हर्षित और स्पंदित ;
जिसने खोले ज्ञान चक्षु और 
सौन्दर्य बोध को किया तिरोहित !

हाँ ! इतना है ; अवश्य .. 
अपमानित हो कर ही तुम ; 
सौन्दर्य विवश ...
छलका पाओगे ;
मधुशाला जैसे ...
अमृत कलश !

(गर्वित गौरव !)


Sunday, March 19, 2017

क्यों लिखता हूँ ?

कोई तो बात है ;
जो ...
बिना कवि हुए ..
इतना कवित्व ..
भरा हुआ है ..
कलेजे में !
जो बरबस ..
बरसता रहता है ...
यहां वहां ..
तप्त बदली सा ...
यूँ ही ..
यकायक !

समझ नहीं आता की ..
यह क्या है ?
क्यों??
जूंझता रहता हूँ ...
इन मतलबी शब्दों से ...
जिन्होंने ..ज़िन्दगी के ..
महत्वपूर्ण मोड़ों पर ...
मुझे सदा झुठलाया है !

आखिर मन्ज़िल कहाँ है ??
कौन है ...
वह जो रोकेगा ...
यह बरसना ?
तटबन्ध कहाँ हैं ?
जो बांधेंगे ...
इन सुलगते विचारों के ..
फलसफे को ?

कब तक चलेगी ...
ये अंगूठे और अक्षरों की ..
कभी न ख़त्म होने वाली ...
दोस्ती और दुश्मनी ?

कौन है ?
जो हांक रहा है ?
मेरी कलम और उसकी स्याही को ?

मुझे पता है !
हांकने वाले वे हैं ..
जो ;अब नहीं हैं !

हाँ ! वे ही हैं; मेरे खिवैया!
जो अपने जाने के ..
दो दशकों के बाद भी ...
लहू बन ..
समाये हुए हैं ...
रगों में ..
मेरे पिता बन !

न जाने क्यों ...
आज भी ...
अपने कांधों पर ...
महसूस करता हूँ ...
आपका हाँथ ...
और दिलो दिमाग पर ..
महसूस करता हूँ ...
आपका राज !

कुछ तो ....
ऐसा नहीं है ...
जो आपका न हो !
ये शब्द ...ये अक्षर !
ये भाव ..ये लगाव !
ये साँसें ..ये धड़कन !
ये उमंग ..ये प्रसंग !
सब कुछ तो ...
आपका अक्स है !

इसलिए कहता हूँ -
आप ही हैं ...
जो सदा परछाईं बन ..
कभी शब्द बन ..
कभी शहद बन ...
समां जाते हो ...
मेरे वज़ूद में !
और ...
मैं इन उँगलियों से ...
रचता रहता हूँ ...
वह किताब ...
जो अधलिखी ...
छोड़ गए थे ;आप !

एक ताक़त सी ..
मिलती है ..
आपको सुमर कर !

और सच ..
आपकी कसम ...
प्यारे पापा !
आज ..
इतना बड़ा हो गया हूँ ..
लेकिन लगता है ...
आपकी गोद का ही ..
परिंदा हूँ !

मिलते रहना ..
आते रहना ..
सुलगाते रहना ;
मनोभावों को !
और कसम से ..
मैं वहीँ पहुंचूंगा ...
जहां आपकी सोच थी !
Garvit Gaurav!

Monday, March 13, 2017

आज खूब रंग बदले; मैंने !!

"आज खूब रंग बदले;
मैंने !!
कभी हरा ...
तो कभी पीला ...
तो कभी लाल हुआ ;मैं !!
श्यामल,स्याह और गुलाल हुआ; मैं !!
लेकिन ; फिर ...
शाम बीतते बीतते ....
रंग उतरते ही ...
बेहाल हुआ ;मैं !!
नंगा और फटेहाल हुआ; मैं !!
एक दिन को ही सही ..
शीशे के आगे ..
भूल जाता हूँ ;
सारे दर्द ...क्योंकि -
पहचान नहीं पाता हूँ ..
बदले हुए रंगीन ...
अक्स के बीच ...
अपना सर्द मर्ज !!
क्या करूँ ??
ये रंग ...
छुपा देते हैं ...
हर दर्द और उसके पीछे का ...
अकेला तन्हा खुद्दार मर्द !!
काश !
ये ज़िन्दगी भी ...
होली के रंगों के मानिंद ..
चटकीली होती !
हम लगा कर ...
रंगों के मुखौटे और ....
अपनी तस्वीर ...
कोशिश करते ...
बदलने की ...
अपनी फूटी तक़दीर !!"
Garvit Gaurav!!

Sunday, March 12, 2017

इस होली चलो गुज़रे दिनों की सैर पर जाते हैं !चलो गुलाल लगते हैं !

इस होली चलो गुज़रे दिनों की सैर पर जाते हैं !
चलो गुलाल लगते हैं !
चलो कुछ पुराने गीत गुनगुनाते हैं !
उन धीमीं धीमीं यादों की भट्टी को  .... 
फिर कुरेद कर  ... 
धीमीं आंच में सुलगाते है !
गुज़री उम्र के फासलों को 
नाप कर आते हैं !

तुम्हें याद है ???
जब उम्र से  ... 
हम नहीं शर्माते थे !
और जवां दिलों में खूब  ... 
होली के पानी से आग लगाते थे !

तुझे तन से और मन से ...
भिगो कर ..
जो उभरता था ;अक्स  ... 
अपनी मोहब्बत का !!
उसपर हम कितने  .. 
मर मर जाते थे !

मेरा तेरे गालों को रंग कर ..
और तेरा मेरे सीने में सिमट कर  ... 
जो लरजता था ;अक्स 
शर्म ओ हया का !
उन लम्हों पर हम  ... 
सच  .... 
कितनी कसमें खाते थे !

दोहरा कर अपनी जुल्फों को ...
जो निचोड़तीं थीं तुम ..
अपनी काली घटाओं को
मेरे भिगोने पर !
और  .... 
मैं भिगो कर भर देता था ..
तुम्हारी मांग को ...
अपनी मोहब्बतों के ..
गुलाबी रंगों से !
और  ...
फिर जो उभरता था ..
समुन्दर से भी गहरा अक्स ;तेरा  ....
ऐसा था ;रूप तुम्हारा ...
और मनती थी ...
अपनी अल्हड़ सी स्वछन्द ...
चोरी चोरी ...होली !
सच !कितनी हसीं होली  ... 
हम साथ साथ मनाते थे !

कोई देख लेगा ..
कोई आ जाएगा ..
नहीं न ..
तुम समझते क्यों नहीं ?
प्लीज ;मांग में नहीं ..
मम्मी बहुत गुस्सा होगी ..
जैसी बेफिक्रियों के साये में .. 
अपनी होली  ... 
हम कैसे मनाते थे !

साँसों से मिलतीं थीं ;साँसें
और धड़कन से धड़कन ..
तन से हथेली और
मन से ...
वचनों की बोली !

सच ...
कुछ कुछ ऐसे ही ..
मनती थी ..
अपनी ..
दो दिलों की ..
लरजती सिमटती ..
प्यारी सी होली !

अब जब कि उम्र ने भी  ... 
अपने होली के रंग  ... 
हम दोनों पर दिखाना शुरू कर दिया है !
कनपटी और जुल्फों पर  ... 
सफेदी के रंगों ने  .. 
भिगोना शुरू कर दिया है !
चलो  ..... 
अब रंगों को एक किनारे रख कर  .... 
गुलाल को अपनाते हैं !
कुछ पुराने गीत गुनगुनाते हैं !
आओ नफासत और नज़ाकत से  .... 
गालों पर गुलाल लगाते हैं !
और फिर  ... 
हाथों में हाँथ थाम ;पुनः  ... 
गुज़रे दिनों की सैर पर जाते हैं !

गर्वित गौरव!

Thursday, March 9, 2017

मुझे पता है !

"मुझे पता है कि तुम सो गई होगी पर ...
सोते हुए तुममें ;
मैं ज़रूर आसपास होऊंगा !
और
तुझे भी पता होगा कि ..
मैं जाग रहा होऊंगा और ...
मेरे जागते हुए अक्स के आसपास ....
ज़रूर तुम होओगी !"

Wednesday, March 8, 2017

' विमेंस डे ' पर "आदम और हौआ" की कहानी !

मेरे जमाने में ..
न चलता था ये ..
हैप्पी वोमेन्स डे ..
का चलन !
वरना
एक बार और ..
तुझसे दीदार हो ही जाता !

हर बार ..
जब जब किसी स्त्री का....
सम्मान करता हूँ ...
या उसे सम्मान देने का ..
शगल होता है ..
तो तुम याद ...
आ ही जाती हो !

तुम्हें पता है ?
एक इंसा ;
जिसे तुम ...
गुस्से में ...
कभी कभी 'आदम' भी
कहती थीं ..
वो 'आदम' बनने से पहले ...
एक 'बेटा' ...
एक 'भाई' ...
और एक 'प्रेमी' ..
भी होता है ...और
बस इक
'बेवफाई' और 'रुसवाई' ही
उस इंसा को ...
इंसा से ;
'आदम' बनाती है !

कुछ कहना तो ..
नहीं चाहता था ; तुझे ...
क्योंकि आज ...
तेरा 'दिन' है कि ....
जब दुनिया ...
तेरी खुशफहमियों पर ...
इतरा रही है !

पर क्या करूँ ?
रोक नहीं पाता हूँ ....
इक 'इंसा' या 'आदम' के साथ ....
इक 'हौआ' के ...
गुज़रे पलों का ....
हिसाब किताब करने से !

बहुत बरस बीत गए !
तुम 'हौआ' से 'माँ' बन गईं और मैं ;
'आदम' से इक 'पिता'!

चलो छोड़ते हैं ;वो ज़िद्द ...
और कहीं बहुत दूर ...
भटके पंछियों की मानिंद....
पुनः जीना ....
शुरू करते हैं !

"तुम अपने 'विमेंस डे' के साथ ...
जी लेना और ....
मैं जी लूंगा ...
अपने 'फादर्स डे' ...
के साथ !"

Sunday, March 5, 2017

इस होली ...

झुक कर ..
लगवा लेना ..
रंग गुलाल और अबीर ..
इस होली ;
उनसे !
अब क्या गिला ...
और क्या शिकवा करूँ ...
मैं तुमसे !

मैं जला दूंगा अपनी यादें ;
इस होली ...
अपने मन से !
और तुम भी धो लेना ...
अपने किये वादे ...
इस होली ...
अपने तन से !!

Friday, March 3, 2017

जनपद की अस्सी लाख की दुकानें और बेरोज़गार लवकुशनगर!



बेहतरीन तरीके से जनपद की दुकानों की नीलामी हो गई। जनपद पंचायत को लगभग ८० लाख रुपए मिल गए। देखना यह है कि इस नीलामी से और इन दुकानों को लेने वाले सम्मानित ग्राहकों को क्या मिलता है ? 
सात लाख से १२ लाख रुपए के बीच खरीदी गई इन दुकानों से ऐसा क्या व्यापार और मुनाफा कमा लेंगे अपने लवकुशनगर के भाई बंधु; यह यह चिंता का विषय है !
कोई बोली बढ़ाता जाएगा और बोली बढ़ती जायेगी  .... जैसी सोचों से हम किधर जा रहे हैं ?
कितना दायरा और 'स्कोप' है हमारे लवकुशनगर का ? इस बारे में चिंतन करने का वक़्त आ गया है !
पूंजीवाद का फंडा होता है कि -"अमीर ;अमीर होता जाता है और गरीब; गरीब  ... !" कुछ कुछ ऐसा ही हमारे लवकुशनगर में भी हो रहा है !
सामाजिक वर्जनाओं के ताने बाने में जनपद पंचायत की यह दुकानें कौन सा धंधा अपने भाइयों का सफल कर देंगी ;यह शोध का विषय है ?
महोबा मार्ग पर बनीं यह दुकानें जब अपने चरम पर सजेंगी और फलेंगी-फूलेंगी तब यह हमारी बदलती सोच और विकास का आइना होंगीं !
चूँकि यह स्कूल मार्ग है और अधिकांशतः बच्चे इसी मार्ग से गुज़रते हैं अथवा इन दुकानों के सामने स्थापित शासकीय विद्यालयों में पढ़ते भी हैं तो इन दुकानों में खुलने वाले प्रतिष्ठानों से लवकुशनगर का नज़रिया और विकासपरख दृष्टिकोण भी परिभाषित होगा !
अब जब हमारे तहसील के एसडीएम ,तहसीलदार ,सीईओ एवम प्राचार्य महोदय रोज़ाना इस लवकुशनगर की सिविल लाइन्स वाली सड़क से गुज़रेंगे तो इस तथ्य पर तो अवश्य नज़र रखेंगे कि -इन दुकानों का व्यापारिक दृष्टिकोण क्या है अथवा होना चाहिए ?
काश !कभी यह भी तय होता कि -चूँकि सामने विद्यालयों की भरमार है तो -
एक दूकान स्टेशनरी के लिए आरक्षित है तो
एक दूकान कंप्यूटर सेण्टर खोलने के लिए !
कोई दूकान जनपद पंचायत अपने किसी सरपंच को दे देती तो
कोई दूकान रिटायर्ड शासकीय कर्मचारी को !
लेकिन यह सब तो हमारी कपोल कल्पना एवम सोच है जो  ...
'काश' शब्द से शुरू हो कर 'काश' शब्द पर ही ख़त्म हो जाती है।
लेकिन इतना जरूर है कि -दुकानें चाहे जितने में हमनें या हमारे भाई बंधुओं ने खरीद ली हों लेकिन यह मुनाफे और समझदारी भरा फैसला कतई नहीं लगता क्योंकि -
"सबकुछ गवां के होश में आये तो क्या किया ?"

"रोज़ मर जाती है मेरे सामने की एक नदी और रोज़ उसके उद्धार की एक गूँज सुनाई देती है !"



Wednesday, March 1, 2017

ख्वाब!

"ख्वाब तो होने चाहिए ;
रात सोने के लिए ...
ख्वाब तो होने चाहिए ;
सुबह फिर जुट जाने के लिए ..
ख्वाब तो खोने चाहिए ;
ज़िंदा रहने के लिए ..
और
ख्वाब तो ढोने चाहिए ;
प्यार सुलगते रहने के लिए !"