Sunday, March 12, 2017

इस होली चलो गुज़रे दिनों की सैर पर जाते हैं !चलो गुलाल लगते हैं !

इस होली चलो गुज़रे दिनों की सैर पर जाते हैं !
चलो गुलाल लगते हैं !
चलो कुछ पुराने गीत गुनगुनाते हैं !
उन धीमीं धीमीं यादों की भट्टी को  .... 
फिर कुरेद कर  ... 
धीमीं आंच में सुलगाते है !
गुज़री उम्र के फासलों को 
नाप कर आते हैं !

तुम्हें याद है ???
जब उम्र से  ... 
हम नहीं शर्माते थे !
और जवां दिलों में खूब  ... 
होली के पानी से आग लगाते थे !

तुझे तन से और मन से ...
भिगो कर ..
जो उभरता था ;अक्स  ... 
अपनी मोहब्बत का !!
उसपर हम कितने  .. 
मर मर जाते थे !

मेरा तेरे गालों को रंग कर ..
और तेरा मेरे सीने में सिमट कर  ... 
जो लरजता था ;अक्स 
शर्म ओ हया का !
उन लम्हों पर हम  ... 
सच  .... 
कितनी कसमें खाते थे !

दोहरा कर अपनी जुल्फों को ...
जो निचोड़तीं थीं तुम ..
अपनी काली घटाओं को
मेरे भिगोने पर !
और  .... 
मैं भिगो कर भर देता था ..
तुम्हारी मांग को ...
अपनी मोहब्बतों के ..
गुलाबी रंगों से !
और  ...
फिर जो उभरता था ..
समुन्दर से भी गहरा अक्स ;तेरा  ....
ऐसा था ;रूप तुम्हारा ...
और मनती थी ...
अपनी अल्हड़ सी स्वछन्द ...
चोरी चोरी ...होली !
सच !कितनी हसीं होली  ... 
हम साथ साथ मनाते थे !

कोई देख लेगा ..
कोई आ जाएगा ..
नहीं न ..
तुम समझते क्यों नहीं ?
प्लीज ;मांग में नहीं ..
मम्मी बहुत गुस्सा होगी ..
जैसी बेफिक्रियों के साये में .. 
अपनी होली  ... 
हम कैसे मनाते थे !

साँसों से मिलतीं थीं ;साँसें
और धड़कन से धड़कन ..
तन से हथेली और
मन से ...
वचनों की बोली !

सच ...
कुछ कुछ ऐसे ही ..
मनती थी ..
अपनी ..
दो दिलों की ..
लरजती सिमटती ..
प्यारी सी होली !

अब जब कि उम्र ने भी  ... 
अपने होली के रंग  ... 
हम दोनों पर दिखाना शुरू कर दिया है !
कनपटी और जुल्फों पर  ... 
सफेदी के रंगों ने  .. 
भिगोना शुरू कर दिया है !
चलो  ..... 
अब रंगों को एक किनारे रख कर  .... 
गुलाल को अपनाते हैं !
कुछ पुराने गीत गुनगुनाते हैं !
आओ नफासत और नज़ाकत से  .... 
गालों पर गुलाल लगाते हैं !
और फिर  ... 
हाथों में हाँथ थाम ;पुनः  ... 
गुज़रे दिनों की सैर पर जाते हैं !

गर्वित गौरव!

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