Wednesday, March 8, 2017

' विमेंस डे ' पर "आदम और हौआ" की कहानी !

मेरे जमाने में ..
न चलता था ये ..
हैप्पी वोमेन्स डे ..
का चलन !
वरना
एक बार और ..
तुझसे दीदार हो ही जाता !

हर बार ..
जब जब किसी स्त्री का....
सम्मान करता हूँ ...
या उसे सम्मान देने का ..
शगल होता है ..
तो तुम याद ...
आ ही जाती हो !

तुम्हें पता है ?
एक इंसा ;
जिसे तुम ...
गुस्से में ...
कभी कभी 'आदम' भी
कहती थीं ..
वो 'आदम' बनने से पहले ...
एक 'बेटा' ...
एक 'भाई' ...
और एक 'प्रेमी' ..
भी होता है ...और
बस इक
'बेवफाई' और 'रुसवाई' ही
उस इंसा को ...
इंसा से ;
'आदम' बनाती है !

कुछ कहना तो ..
नहीं चाहता था ; तुझे ...
क्योंकि आज ...
तेरा 'दिन' है कि ....
जब दुनिया ...
तेरी खुशफहमियों पर ...
इतरा रही है !

पर क्या करूँ ?
रोक नहीं पाता हूँ ....
इक 'इंसा' या 'आदम' के साथ ....
इक 'हौआ' के ...
गुज़रे पलों का ....
हिसाब किताब करने से !

बहुत बरस बीत गए !
तुम 'हौआ' से 'माँ' बन गईं और मैं ;
'आदम' से इक 'पिता'!

चलो छोड़ते हैं ;वो ज़िद्द ...
और कहीं बहुत दूर ...
भटके पंछियों की मानिंद....
पुनः जीना ....
शुरू करते हैं !

"तुम अपने 'विमेंस डे' के साथ ...
जी लेना और ....
मैं जी लूंगा ...
अपने 'फादर्स डे' ...
के साथ !"

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