Wednesday, September 26, 2012

खजुराहो किसका है???



खजुराहो किसका है???

"खजुराहो का असली मालिक कौन?
खजुराहो का असली नेता कौन???
खजुराहो का असली शुभ चिन्तक कौन???
खजुराहो का सरपरस्त कौन???
खजुराहो का चौकीदार कौन???
खजुराहो का पल्लेदार कौन???
और ....
खजुराहो का थानेदार कौन???

आज "विश्व पर्यटन दिवस" पे-
बहुत सारे ठेकेदार इक्कट्ठा हो कर-
हुंकार भरेंगे की वो ही खजुराहो के असली शुभ चिन्तक हैं-
और उन्हीं के सुरक्षित हाथों से -
इस कस्बे  का उद्धार होगा!

Cheers Cheers Cheers !!!
Happy World Tourism day!!!
Happy World Tourism day !!!
Long Live Khajuraho !!!
  • उद्धार तो कभी "टी एस बर्ट" ने भी किया था
          जो इसे विश्व मंच पे लाये!
  • उद्धार तो चंदेलों ने भी किया था जिन्होंने अपने ख्वाब को मूर्त रूप दे कर
          अपने अस्तित्व को अमरता प्रदान की!
  • उद्धार तो-खजुराहो के महाराज जी ने भी किया था जिन्होंने अपना सब कुछ निछावर कर दिया था इन मंदिरों को को विश्व मंच पे लाने  के लिए-
और----
  • असली उदधारक तो स्वयं भगवान् मतंगेश्वर हैं; जिन्होंने खजुराहो और उसकी कला को चिरंतनता का अमर वरदान दे कर स्वयं उसकी रक्षा का भार लिया और खुद विराजमान हो गए-अपना त्रिशूल ले कर इस कस्बे की रक्षा के लिए !!!
  • उद्धारक तो पवनपुत्र हनुमानजी भी हैं जो राजनगर के पास "चोडा-खेड़े" में विराज कर और सेवाग्राम खजुराहो में विराज कर अपनी कृपा बनाये हुए हैं!उन्होंने ही दशकों पहले स्व,हरिवंश राय बच्चन को खजुराहो आ कर कुछ अमर पंक्तियाँ लिखने को कहा था जिन्हें आज हम उन्हीं के पुत्र अमिताभ की आवाज़ में रोज -Light & Sound Program me में सुनते हैं और स्वम पवन पुत्र की दक्षिण मुखी सबसे बड़ी मूर्ति है!
  • रक्षक तो एअरपोर्ट boundary के किनारे स्थित "माता मंदिर "भी हैं जो अपने आँचल में खजुराहो के सारे दुःख समेटे हुए हैं!
  • और वो क्लार्क होटल की दीवाल से सटा हुआ चबूतरा- नदी किनारे वाला हम कैसे भूल सकते हैं जो वाहनों की रक्षा करते हैं!   
"असल में अपने अपने समय में सभी ने अपना अपना काम पूरी ईमानदारी से किया और जीवन पथ पे आगे बढ़ गए!!!"
  • चाहे वो बर्ट साहब हों या चंदेल वंशज हों अथवा स्वर्गीय दाऊ साहिब अर्थात स्वर्गीय कुंवर अर्जुन सिंह हों???
  • परन्तु हम उन्हें भी कभी नहीं भूल सकते या नज़र अंदाज़ कर सकते हैं जिन्होंने खजुराहो नाम के खंडहर हो चुके जर्जर ध्वस्त कस्बे और उसकी धरोहरों को उचित मंच प्रदान किया -फिर चाहे वो -श्री कांति पोतदार हों या श्री अशोक जैन हों अथवा वयोवृद्ध श्री लावानियाँ जी हों!
  • स्वर्गीय श्री अनिल ओस्मंड,जापानी बाबु अथवा उन आत्माओं को हम कैसे बिसरा सकते हैं जिन्होंने एक ज़िन्दगी लगाई इस खजुराहो नाम की अबूझ पहेली को सुलझाने में!
  • आवाज़  के ऋणी तो हम श्री अमिताभ बच्चन के भी हैं जिन्होंने- "Light & Sound show" के माध्यम से इस खजुराहो नाम के काव्य को जीवंतता प्रदान की!
  • और भी इक नाम है जो बड़ी तन्मयता से अपना काम किये जा रहा है और विश्वास है की हमेशा करता  रहेगा और वो नाम है -आदरणीय श्री ब्रिजेन्द्र सिंह मामाजी guide का;जिन्होंने भी लाखों बार अपनी वाणी से खजुराहो को मंचासीन किया है!

आज जब सारी दुनिया पर्यटन दिवस मन रही हैं हम क्यों बात करें उनकी जो दीमक और लालच भरी नजरों से देख रहें है -विलक्षण खजुराहो को !जो आज गर्व से मंचासीन है- अपने हुनर और कला के बल-बूते पर और कोशिश कर रहा है कि -आगे और आगे बढ़ता ही जाये।

आओ कोशिश करें -खजुराहो को भू-माफियाओं से बचाने की ;जो सुड़क या गुटक जाने को तैयार हैं-खजुराहो के चंदेल कालीन तालाब और बेशकीमती जमीनें जिन पर येन-केन-प्रकरेण कब्ज़ा कर ये नकाबपोश सफेदपोश तथाकथित "खजुराहो के शुभ-चिन्तक" इस चंदेल कालीन कसबे को गर्त पे लाने की कोशिश कर रहें हैं!

"देखना यह है कि -वो भागीरथ तारनहार कौन है जो इस धरा को इन जिंदा दानवों से बचा कर वर्ष 2050 ईस्वी के बच्चों के लिए उपहार स्वरुप विरासत में खजुराहो नामक यह "विश्व दाय स्मारक " भेंट कर के जायेगा??? "

आओ कभी अपनी चुश्कियों के बीच कुछ समय उस -खजुराहो को भी दें जो बड़ी खामोशी से हम सब को पाल रहा है -बिना किसी न-नुकुर के???
आओ सच्चे मन से सोचें -

खजुराहो का असली मालिक कौन?
खजुराहो का असली नेता कौन???
खजुराहो का असली शुभ चिन्तक कौन???
खजुराहो का सरपरस्त कौन???
खजुराहो का चौकीदार कौन???
खजुराहो का पल्लेदार कौन???
और ....
खजुराहो का थानेदार कौन???"

उत्तर है दोस्तों -सिर्फ हम!सिर्फ हम!

जय जय मतंगेश्वर महादेव जय जय !!!!!





Monday, September 24, 2012

"किस्मत कनेक्शन"


"हम-तुम एक साथ नहीं हुए तो क्या हुआ?
सात फेरे नहीं लिए तो क्या हुआ ?
मांग में सिन्दूर नहीं भरा तो क्या हुआ? 
दो शरीरों का मिलन नहीं हुआ तो क्या हुआ? 

चलो कम से कम -

हम दोनों ने एक-साथ डूबते हुए सूरज को निहारा और उस सूरज में 'ज़ुदाई' और 'इक नई सुबह' दोनों को तलाशा तो !
हम दोनों ने एक दुसरे की आँखों में निश्चल मन से झाँका तो!
एक-दुसरे का हाथ पकड़ के कुछ कदम साथ में चले तो!
कुछ सपनें साथ में बुनें तो!
कुछ शब्द साथ में गुथें तो!
एक-दुसरे की आँखों पे सिमट आई लटों को हक से हटाया तो!
और ......
बहुत करीब से अपनी उँगलियों से एक-दुसरे के आसुओं को पोंछा!
जानती हो -
ऐसा  जीवन सुख और सत्य बहुत से शादी-शुदा लोगों को नहीं मिल पता है;जो-
हम-दोनों ने बांटा,एहसास किया और जीवन भर के लिए मन में संजोया!

जहाँ तक मेरी बात है -

मै खुश हूँ!तुम्हारी उड़ती हुई चुनरी या दुपट्टा संभालने में-
मै खुश हूँ तुम्हारी खिसकती बिंदी को माथे पे संवारने या लगाने में-
मै खुश हूँ -जाते-जाते बदहवास में तुम्हारे -"अपना ध्यान रखना"कहने के अंदाज़ पे!
मै खुश हूँ मंदिर में साथ-साथ भगवान् के सामने मत्था टेकने पे!
मै खुश हूँ  तुम्हारा कुछ अपने हाथ से बना के चोरी-चोरी मुझे खिलाने पे!
मै खुश हूँ तुम्हारी जूठी प्याज़ खाने और पानी पीने में!
और--
मै  बहुत खुश हूँ इस बात पे कि -इस ज़िन्दगी में "प्यार";बनकर तुम आयीं-
मुझे वाकिफ कराया कि प्यार क्या होता है?
और मेरे शब्दकोष में-
निश्चलता,पावनता,अमानत,पक्का,वादा,तुम्हारी कसम और सच्ची-मुच्ची; जैसे शब्दों के मायने जोड़े और
तुम्हारी-सिर्फ तुम्हारी,,इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में,पहला प्यार,सच्ची सिर्फ तुम्हारी कसम ;जैसे मुहावरों की गहराई को बताया!
"तुमने आत्मा और शरीर के मिलन के अंतर को समझाया कि -शरीर तो एक जन्म में सात फेरों से बांधा जा सकता है परन्तु "आत्मा" निर्बाध है और उसे कोई मिलने से कोई नहीं रोक सकता!"

जहाँ तक तुम्हारी बात है -तुम खुश होगी? यकीनन खुश होगी!
जानती हो क्यों? -
तुम्हारे न मिलने पर भी- मेरे न भटकने पर!
तुम्हारे न मिलने पर भी- मेरे संभलने पर!
तुम्हारे न मिलने पर भी -मेरे कुछ बनने पर!

मुझे मालूम है कि -तुम बहुत खुश होगी-

मेरी सफलता पे!
मेरी ख़ुशी पे!
मेरी व्यस्त ज़िन्दगी पे!
और मेरे उसी  'मस्त-मौलापन' पे जो कभी! जब तुम ज़िन्दगी में थीं तब भी था और आज भी है; क्यूँ कि -
'मै'  नहीं बदला - बिलकुल भी ......
क्यूँ की ज़िन्दगी! प्यार न मिलने पे ख़त्म नहीं होती बल्कि-
शुरू होती है !!!"

 इतना ही बहुत है-कि तुमने मेरे लिए
अपनी पलकों को झुकाया!
उन पलकों से मेरे हिस्से की चंद आँसूं की बूंदें भी ढलकाई !
मेरे पसंद के कंगन पहने
मेरी पसंद के रंगों के सलवार-सूट पहने!
और वो सबकुछ किया जो मुझे पसंद था या आज भी है!

चलो ये जन्म न सही!
अगला जन्म ही सही!
शायद!
"किस्मत कनेक्शन" क्लिक कर जाए-

 एक जन्म की अधूरी उमंगें शायद-
अगले जन्म में पूरी हो जाए!!!
शायद ............
शायद।।।"












Sunday, September 16, 2012

"खुदा की लाठी चलती है तो आवाज़ नहीं करती!"

















"क्यों लगने लगा है आस्थाओं,आदर्शों और अपनों से डर ???
क्यों ऐसा लगता है कि -मर्यादा,ईमानदारी और वफादारी बेकार की बातें है;
और इसे अपनाने से कुछ ख़ास हासिल नहीं होने वाला है और
इस प्रकार पूज्य बापू के-"शोध सत्य के साथ" के फलसफों को अपना या लागू कर -
मै अपने बच्चों को धकेल रहा हूँ -
ज़िन्दगी की दौड़ में कई हाथ पीछे ........?????

"जो ईमानदार नहीं है वो क्यों सफलता के झंडे गाड रहे हैं ???
जो बेईमान हैं वो क्यों सुख से ज़िन्दगी गुजार रहें है???
और कभी कभी तो बड़ा आश्चर्य होता है जब
पूज्य ईश्वर  के मंदिर में ये लोग -
मुझ से ज्यादा प्रसाद चढाते हैं और महंगी महंगी अगरबत्तियो से ऊपर वाले का आहवान करते हैं और
उन्हें देख के लगता है जैसे-
ये ही सच्चे पुजारी हैं और मै  तुच्छ पापी जो अपने पापों के कारण
भगवान् का भी सामना नहीं कर पा रहा हूँ???"

सभी कहते हैं कि -चिंता मत करो -"खुदा की लाठी चलती है तो आवाज़ नहीं करती!"
ईश्वर-न्याय जरूर करता है और उसकी मर्ज़ी से ही सब-कुछ होता है!
पर ईश्वर का ऐसा कैसा न्याय जो-
तोड़ दे उसके प्रति हमारी आस्था और विश्वास को?
प्रश्न चिन्ह लगा दे हमारी कर्मठता और ईमानदारी को?
या--
विश्वास को ही डिगा दे???

अब सबसे बड़ी दिक्कत यह नहीं है कि -मै  ज़िन्दगी की रेस में पीछे रह गया पर---
दिक्कत यह है की-आगे आने वाली पीढी को उस परम पिता परमेश्वर के बारे में क्या बताऊँ जो सदियो से
सत्य और न्याय का हम-सफ़र रहा है???
यह ठीक है कि -कल युग है पर .....
कलयुग में "भ्रष्ट" तो हम हैं न??? फिर ?
भगवान् के न्याय पर सवाल क्यों ???
उसकी तर्क संगत  नवीन परिभाषा क्या हमें स्वयं गढ़नी पड़ेगी???
कितने प्रश्न कितने तर्क ......
अरे पर बिचारे भगवान्!!! को तो छोड़ दो-उसने क्या बिगाड़ा?????
कुछ कुछ ऐसा ही आप सभी सोच रहें होंगे???है न???

पर चिंता मत करो!!!
इसी को इम्तिहान कहते हैं।

अपने विचार जिंदा रखो!
अपने ख्वाब जिंदा रखो।
अपने मील के पत्थर ताकते रहो।
अपने कर्तव्य याद रखो।
अपने वादे दोहराते रहो।
अपने कायदे पे कायम रहो।

फिर देखना एक दिन-

अँधेरों के बाद रौशनी आएगी!
उमस के बाद बारिश होगी।
ठण्ड के बाद सुनहली धूप निकलेगी।
और ........
राहत,सुकून व सफलता की ब्यार चलेगी

देखना एक दिन---
बेटा "आई ए एस " में सिलेक्ट होगा।
बिजनेस ठीक-ठाक चलेगा।
बुढ़ापा सुकून से बीतेगा।
और .......
और .......
और भी बहुत कुछ होगा।

बस इतना करना कि -
अगरबत्ती वही सस्ती वाली लगाते-जलाते रहना
और ......
आस्था और विश्वास को कभी खंडित मत करना
क्यों कि यही कुछ जीवन सत्य रह गए हैं जो
कभी संतृप्त मानवता को
नई दिशा देंगे!!!!!"





Friday, September 14, 2012

देखो रामा अस्सो बाहर निकल गओ पकड़ो गिर न जाय!

"चले गए अपने
और दे गए एक मजबूत बाहुपाश
जिसने सात जन्मों के रिश्तों में
हम सब को बाँध दिया है .....

अपनी अम्मा जी के नाम के आगे -स्वर्गीय लगाना
कुछ ऐसा लगता है -जैसे जाने वाले को जबरन जाने को कह रहे हों?
माना  कि  अपनी अम्मा -स्वर्ग सिधार गईं
पर अपनी अम्मा तो आज भी हम सब के साथ में हैं
रग -रग में हैं,कतरे कतरे में हैं ,खून की बूंद बूंद में हैं और  अपनी
यादों में हैं वादों में हैं
साँसों में हैं।।।

हम सभी अम्माजी की तेरहवी में इक्कठा थे
पर क्या ऐसा लगा कि -
अम्मा हमारी अम्मा हम सब के बीच नहीं हैं???
बल्कि हमें तो ऐसा लगा कि जैसे-

-अपनी अम्मा कह रहीं हों-

देखो रामा "अस्सो" बाहर निकल गओ पकड़ो गिर न जाय!
सविता कां गई?
मंजू अबे तक नैं  आइ ?शाम हो गई?
पिरभा ने माचिस कितेक रखी ?
राजू देखो बद्री काय बुला रओ ?
जो असीस भौतई छकाएँ हैं!
और----
तुम ओरें हमाए सब - नाती-नातिनन को ध्यान राखिओ !

सच कहा न मैंने???

हम सभी लोगों को कल मऊ में ऐसा ही लगा ???
और ऐसा लगा जैसे अम्मा अपने आँगन में
अपनी नातिनों -नाती,बिटिया-दामादों,और बेटों को देख के-
संतोष में होंगी की -
चलो सभी ऐसे ही मिलजुल के रहना और-
मौरानीपुर का घर कभी मत छोड़ना
और ......
सुखदुख हमेशा मिल-बैठ के मानना!!!

अम्मा आप की भाषा और भाव हम सब ने समझ लिए हैं और
हम-सब हमेशा आप और पूज्य दद्दा जी के आशीर्वाद से
मिल जुल के रहेंगे!!!

मौरानीपुर की बड़ी देवीओं की छाया में पनपा  यह कायस्थ परिवार का वट-वृछ सदा ऐसे ही फलता फूलता रहेगा!आप दोनों की छाया और आशीर्वाद के सहारे सफलता का सौपान हम सभी हमेशा करते रहेंगे!









Wednesday, September 12, 2012

Pain!!!


"कुछ सपने बन ढल जायेंगे ;
कुछ दर्द चित्ता तक जायेंगे ;
उसमे इक दर्द तुम्हारा  होगा 
उसमे इक दर्द तुम्हारा होगा!"


Sunday, September 9, 2012

अम्मा को नाती की पाती!







"बहुत आसानी से,भारी मन से ,रोते हुए-सिसकते हुए-
हमने आपको-
वहीं पहुंचा दिया जहाँ की आप मुसाफिर थीं।
और बहुत दिनों से कह रहीं थीं कि -
हमें जाने दो -तुम लोग जाने नहीं दे रहे हो?"

"कितना कठिन होता है  -

गंतव्य से इलाहाबाद तक का सफ़र-
-यह कोई उनसे पूंछे जो अपनों को इक थेले में लेकर और गोद में बिठा के -
सदा सदा के लिए माँ गंगा के जल में सदा सदा के लिए प्रवाहित कर-
विदा-अलविदा कर देते हैं -अपने माँ-पिता को
और बस ....सब
पछ्ताते रह जाते हैं अपनी यादों के साथ,
अपने वादों के साथ ....
अपने बिछोह के साथ .".

"कल तक हम जिसकी गोद में खेल के बड़े हुए-
आज उसकी अस्थिओं को अपनी गोद में लेकर इलाहाबाद जाना-
और .......
माँ गंगा में प्रवाहित कर बिछड़ जाना-
हे भगवान .....
कुछ समझ नहीं आया?"

"ले आते हैं वापस घर .......
कुछ प्रसाद ....
कुछ यादें-
कुछ वादे -
कुछ दवाईयाँ -जाने वाले की- बची हुई;
और ....
कुछ सूखे हुए आँसूं
कुछ आती हुई हिचकियाँ
कुछ गुट्कता सा थूंक
और ......
कुछ वीरान आँखें-
कुछ स्याह रातें।

गूंजती रह जाती  हैं -अपनों की आवाज़ और सुर -
जो बचपन में हमें -
सुलाते थे-बहलाते थे -मनाते थे;
लोरी की थाप से गाते थे और पीठ में-
खुजली कर के -
सुलाते थे।"

"कितनी विचित्र है ऊपर वाले की लीला-
इक जीता-जागता शरीर-
हो जाता है हमसे जुदा ...
और तब्दील हो जाता है ...
तस्वीरों के फ्रेम में ......
अपनी मालाओं के साथ .....
हमें सिर्फ रुलाने और सिसकाने के लिए??????"

आप बहुत याद आओगी अम्मा-
सदर चरण वंदन सहित-
आपके सारी -
नातिनें और नाती और आशीष /शानू !









..



Friday, September 7, 2012

सफलता के पैमाने!


"यह ठीक है कि-
ज़िन्दगी की दौड़ में मै पिछड़ गया हूँ।
पर मै हारा नहीं हूँ!
मै हताश नहीं हूँ !
और निराश नहीं हूँ!

जज्बा अभी जिंदा है,
आग अभी भी  सुलग रही है,
सपने अभी भी तैर रहें हैं,
या यूँ कह लो कि -
ख्वाब अभी ज़मीदोज नहीं हुए हैं!

ऐसा नहीं है कि -
वही घिसा-पिटा तर्क दूं  कि -
ईश्वर ने साथ नहीं दिया या
किस्मत ठीक नहीं थी भाई!
और----
कोशिश तो बहुत की पर क्या करूँ सफलता नहीं मिली।

ईश्वर,किस्मत और मेरी मेहनत मेरे साथ हमेशा रही और आगे भी रहेगी।
इन आधार स्तंभों के कारण  ही-
सच्चा जीवन साथी मिला,
प्यारे प्यारे दो बच्चे मिले,
बड़े बड़े तो नहीं पर छोटे छोटे सपने साकार हुए,
और-----
इतने भीषण एक्सीडेंट के बावजूद भी -
मेरा परिवार अखंडित रहा और आज मै जिंदा हूँ।

असल में भगवान् और पूर्वज उतनी ही मदद और दया करते हैं जितने के आप हक़दार है।
दूसरों के पास लाखों-करोड़ों रुपए हों पर कुछ तो बात है जो मुझे विचलित नहीं करती?
इसे मेरी अकर्मण्यता कह लो या मेरा आत्म-विश्वास ?
मै सुकून में हूँ क्यों कि -
मुझे संतोष है अपनी उप्लब्धियों पे और अपने उन सपनों पे -
जो मुझे और मेरे भगवान को, मेरी आस्था को मेरे अन्दर-आज भी जीवित किए हुए हैं।
जिससे ---
मेरे अन्दर समाई सपनों को जीवंत करने की जीजिविषा कहीं ख़त्म न हो जाय और-
यही चंद बातें  कहीं उदाहरण न बन जाएँ ----
आगे आने वाली पीढयों को  -
मेरे सफलता के पैमाने को नापने की।।।"