Monday, September 24, 2012

"किस्मत कनेक्शन"


"हम-तुम एक साथ नहीं हुए तो क्या हुआ?
सात फेरे नहीं लिए तो क्या हुआ ?
मांग में सिन्दूर नहीं भरा तो क्या हुआ? 
दो शरीरों का मिलन नहीं हुआ तो क्या हुआ? 

चलो कम से कम -

हम दोनों ने एक-साथ डूबते हुए सूरज को निहारा और उस सूरज में 'ज़ुदाई' और 'इक नई सुबह' दोनों को तलाशा तो !
हम दोनों ने एक दुसरे की आँखों में निश्चल मन से झाँका तो!
एक-दुसरे का हाथ पकड़ के कुछ कदम साथ में चले तो!
कुछ सपनें साथ में बुनें तो!
कुछ शब्द साथ में गुथें तो!
एक-दुसरे की आँखों पे सिमट आई लटों को हक से हटाया तो!
और ......
बहुत करीब से अपनी उँगलियों से एक-दुसरे के आसुओं को पोंछा!
जानती हो -
ऐसा  जीवन सुख और सत्य बहुत से शादी-शुदा लोगों को नहीं मिल पता है;जो-
हम-दोनों ने बांटा,एहसास किया और जीवन भर के लिए मन में संजोया!

जहाँ तक मेरी बात है -

मै खुश हूँ!तुम्हारी उड़ती हुई चुनरी या दुपट्टा संभालने में-
मै खुश हूँ तुम्हारी खिसकती बिंदी को माथे पे संवारने या लगाने में-
मै खुश हूँ -जाते-जाते बदहवास में तुम्हारे -"अपना ध्यान रखना"कहने के अंदाज़ पे!
मै खुश हूँ मंदिर में साथ-साथ भगवान् के सामने मत्था टेकने पे!
मै खुश हूँ  तुम्हारा कुछ अपने हाथ से बना के चोरी-चोरी मुझे खिलाने पे!
मै खुश हूँ तुम्हारी जूठी प्याज़ खाने और पानी पीने में!
और--
मै  बहुत खुश हूँ इस बात पे कि -इस ज़िन्दगी में "प्यार";बनकर तुम आयीं-
मुझे वाकिफ कराया कि प्यार क्या होता है?
और मेरे शब्दकोष में-
निश्चलता,पावनता,अमानत,पक्का,वादा,तुम्हारी कसम और सच्ची-मुच्ची; जैसे शब्दों के मायने जोड़े और
तुम्हारी-सिर्फ तुम्हारी,,इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में,पहला प्यार,सच्ची सिर्फ तुम्हारी कसम ;जैसे मुहावरों की गहराई को बताया!
"तुमने आत्मा और शरीर के मिलन के अंतर को समझाया कि -शरीर तो एक जन्म में सात फेरों से बांधा जा सकता है परन्तु "आत्मा" निर्बाध है और उसे कोई मिलने से कोई नहीं रोक सकता!"

जहाँ तक तुम्हारी बात है -तुम खुश होगी? यकीनन खुश होगी!
जानती हो क्यों? -
तुम्हारे न मिलने पर भी- मेरे न भटकने पर!
तुम्हारे न मिलने पर भी- मेरे संभलने पर!
तुम्हारे न मिलने पर भी -मेरे कुछ बनने पर!

मुझे मालूम है कि -तुम बहुत खुश होगी-

मेरी सफलता पे!
मेरी ख़ुशी पे!
मेरी व्यस्त ज़िन्दगी पे!
और मेरे उसी  'मस्त-मौलापन' पे जो कभी! जब तुम ज़िन्दगी में थीं तब भी था और आज भी है; क्यूँ कि -
'मै'  नहीं बदला - बिलकुल भी ......
क्यूँ की ज़िन्दगी! प्यार न मिलने पे ख़त्म नहीं होती बल्कि-
शुरू होती है !!!"

 इतना ही बहुत है-कि तुमने मेरे लिए
अपनी पलकों को झुकाया!
उन पलकों से मेरे हिस्से की चंद आँसूं की बूंदें भी ढलकाई !
मेरे पसंद के कंगन पहने
मेरी पसंद के रंगों के सलवार-सूट पहने!
और वो सबकुछ किया जो मुझे पसंद था या आज भी है!

चलो ये जन्म न सही!
अगला जन्म ही सही!
शायद!
"किस्मत कनेक्शन" क्लिक कर जाए-

 एक जन्म की अधूरी उमंगें शायद-
अगले जन्म में पूरी हो जाए!!!
शायद ............
शायद।।।"












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