Saturday, December 31, 2016

२०१७ - तू फिर खड़ा हो गया ?

और .....
तू फिर खड़ा हो गया ...
चुनौती -२०१७ बन ..
मेरे द्वार पर !
ठहर !!
करूँगा हर स्वप्न और लक्ष्य पूरित ;
समय के कपाल पर !
जवाब दूंगा तेरे हर सवाल पर !
चल चलना शुरू करते हैं ;
२०१७ ..
तेरी हर चाल पर !!"

Thursday, December 29, 2016

चलो इस बरस कुछ नया करते हैं ...कुछ मन की करते हैं !!

"चलो कुछ नया करते हैं  ...
चलो मन की बयां करते हैं !"

नए बरस की ...                                            
आमद देती -                                             
खुशियों के बीच ...                                        
देश के प्रति ...                                             
उभर रही ग़द्दारियों की ..                         
चिल्लहटों को ..                                        
बेजुबां करते हैं !                                           
चलो कुछ नया करते हैं !

चलो ...
नव इबारत का ..                              
सृजन करते हैं !                                            
जहां कलम की स्याही भी ...                         
तिरंगे से रची गई हो ...                                   
ऐसी स्याही गढ़ते हैं !                                       
नव स्वर लहरियों से ..                                     
नव प्रभात में ...                                   
भारतीयता से ओतप्रोत ..                              
कुछ नया करते हैं !

यकीनन उन्होंने लिए ..                                    
कई गाँव गोद ..                                            
चलो .....                                                       
हम पढ़े लिखे नौजवां भी ...                           
किसी गरीब अविकसित ..                           
पिछड़े कसबे को ...                                     
"शमा" करते हैं !                                               
हाँ चलो ...
उसे बदलते हैं !                             
चलो कुछ ...                                               
नया करते हैं !

अपनी जरूरतों को त्याग ....                          
चलो इस बरस ..                                            
देश की पगडंडियों का ..                                
रुख करते हैं !                                            
तिरंगे को ओढ़ ...                                         
फिर सड़कों पर ...                               
वन्देमातरम करते हैं!                                      
चलो .....                                                    
कुछ नया करते हैं !

कुछ उनकी तरफ भी ...                                 
रुख करते हैं ...                                               
जो नोटबन्दी के बाद ....                               
सदमे में हैं !                                                  
देख लो ;गौर से ;कल के हुक्मरानों को ...        
देखो वाकई ...                                                
ये आज कितने भड़के हैं !                              
चलो कुछ नया करते हैं !                                
ऐसे पहलवानों को ...                                  
परस्त करते हैं !                                          
चलो यकीनन ..                                            
कुछ नया करते हैं !                                      
चलो कुछ कदम ...                                   
देशहित में रखते हैं !                                      
चलो कुछ नया करते हैं !

नए बरस में ..                                               
कुछ नए जीवन रंगों से ....                            
दोस्ती करते हैं !                                               
वे माँ बाप ...                                                  
जो अपने बच्चों के लिए तरसते हैं...                
चलो कुछ पल ...                                        
उनके कदमों के साथ साथ पैदल चलते हैं !     
उनके थके कदमों के लिए ...                       
 मरहम बनते हैं !                                           
चलो कुछ नया करते हैं !

बूढी साँसों और ...                                       
टूटते चश्मों की डोरों के ..                             
धागा बुनते हैं !                                             
चलो इस बरस कुछ नया करते हैं !                   
कुछ अनाम बन्धनों की ...                            
उधारी चुकता करते हैं !                                 
चलो नए बरस पर ...                                    v
कुछ नया करते हैं !!



[ गर्वित गौरव ]



Friday, December 23, 2016

अम्मा तुम कहीं नई गईं ; यहीं आसपास हो !

"A day Dedicated to My Mother in law on her Demise Anniversary! "

"अम्मा
तुम यहीं कहीं हो !
हमारे
आस पास हो !

अम्मा वाली अटारी में हो !
पूजा घर में हो !
माईं अम्मा की दुगई में हो !
आँगन के तुलसी घरे में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !

तुम बबलू की पूजा में हो !
लक्का की सुहागलों में हो !
छुटकू की आवाज़ में हो !
रानू की सीधेपन में हो !
मंझली गुड्डी के समर्पण में हो !
और बड़ी गुड्डी के अपनत्व में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !

अम्मा !
तुम बाबूजी के
हर दर्द में हो !
हर कौर में हो !
हर कांखने में हो !
हर ख़ुशी में हो और
हर विजय में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !

पप्पू ,जगदीश और बड़े मुन्ना की यादों में हो तो ..
रिमी,गोलू ईशु-ईशा-यश, प्रभव-चीनू और मनु के बचपन में हो !
चिंटू मोंटी की सफलता में हो  ...
तो शुभी-विमल के उत्कर्ष में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !

अम्मा मेरी अम्मा !
तुम लक्का के गर्दन के दर्द में हो तो ...
बड़ी गुड्डी के ब्लड प्रेशर में हो तो ...
मंझली गुड्डी की घबराहट में हो तो ...
छुटकू की ठसकी में हो और रानू के सिरदर्द में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !

अम्मा !
तुम बंधिया ,खेत-खलियानों में हो !
ट्रैक्टर और बबलू की मारुती में हो !
बड़े वाले हाल में हो तो
अन्नपूर्णा माता बन ...
रसोई घर में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !

अम्मा ! तुम -
हम सभी की परछाईं में हो ! हम सभी के वज़ूद में हो !
पूजा में हो !
आस्था में हो !
अम्मा तुम बाबूजी में हो !
अम्मा तुम हम सब में हो !
सच अम्मा ...
तुम आस पास हो !"

अम्मा !
आपकी याद में -श्रद्धानवत -
सादर वन्दन सहित - (हमसभी ;आपके !)😔😔
🙏🙏🙏🙏🙏
💐💐💐💐💐

Friday, December 16, 2016

Happy Birthday; Soul!

मैं बहता पानी तो ..
तुम मेरी बन्धान !

मैं बहती पवन तो ..
तुम मेरी शीतलता !

मैं अबूझ पहेली तो ...
तुम मेरी समाधान !
और 
मैं हताश लाचार तो ..
तुम आस और नव प्रयास !

"आओ बाँध दूँ ..
वो ताबीज़ गले से ..
जो रखे सलामत तुझे ..
ज़िन्दगी की ...
हर बला से !

हर तरह से !!
मुझे पता है ...
तेरी सलामती से ही -
जुड़ा है मेरा वज़ूद ..
हर तरह से !"
"शुभ जन्मउत्सव प्रिये !"

Wednesday, November 30, 2016

काल और काले धन से जूंझता इंसा !

आदरणीय पीएम सर !

इस नोटबन्दी के दौर में-
मेरे पास ..
अपने स्वर्गवासी पिता के ..
पुराने सन्दूक से निकले ..
कुछ दस्तावेज और
धरोहरें मिलीं हैं !

कृपया पथप्रदर्शित करें कि-
मैं अपनी यह धरोहरें ...
कहाँ जमा करूँ ?
इस पर कोई बन्दिश तो नहीं है ; न ?

कुछ टूटे हुए चश्में की डंडियाँ  ....
कुछ उधड़े हुए जूतों की निशानियां ...
एक पुराना बेंत ..
बहुत पुरानी ...
सर्दियों में पहनने वाली बंडी और -
कुछ मनीऑर्डर की रसीदें ...
मेरे पिताजी के सन्दूक से-
आज मुझे मिलीं हैं !

कहीं यह काला धन तो नहीं ?

मेरी ...
स्वर्गवासी माँ के हाथों ...
मेरे जन्म से पहले ..
मेरे लिए बुना गया ..
क्रोशिये का स्वेटर और
धूप में ..
मेरी मालिश के लिए ..
पुराने डबल बेड के ..
चादरों को जोड़ कर ..
बनाई गई ..
मेरी दरी ही ..
मेरे गुप्त खजाने की ..
अमानतें हैं !
जिन्हें मैंने ...
किसी भी बैंक में ..
घोषित नहीं किया है !
क्यों कि -
ये मेरी छुपी दौलत हैं ...
जिनमें मेरी यादें और
वादे बसते हैं !

एक बहुत बड़ा खजाना ..
और भी है ;
जिसे हासिल करने के लिए ..
नब्बे के दशक में -
मैंने अपना -
मन वचन और कर्म तक ...
गिरवी रख दिए थे !

आज भी ..
कुछ फ़टी हुई ..
आंसुओं की सोख्ता बनी  चिट्ठियां ...
कुछ कसमें ...
कुछ वादे और
कुछ रुस्वाइयाँ ...
बड़े जतन से ..
सम्भाल कर रखे हुए हूँ ..
अपने ह्रदय की ..
अतल गहराईयों में !

समझ नहीं आता कि -
कहाँ जमा करूँ ...
अपनी यह बेशुमार दौलत ??

रोज़गार निर्माण के कुछ पन्ने  ...
कुछ प्रवेश पत्र ...
कुछ प्रमाणपत्र और ...
कक्षा पहली से एलएलबी और
एमबीए तक की मार्कशीटें भी अक्सर ...
चिढ़ाती रहतीं हैं मुझे कि -
मैं बहुत अमीर हूँ !

पीएम सर जी ;
बस अमूमन ..
इतनी सी ही दौलत है ..
एक आम हिंदुस्तानी के -
बैंक खाते में !

कुछ मोहबतें ...
कुछ जुदाईयां ..
कुछ वफ़ाएं ..
कुछ बेरोज़गारियां ...
कुछ दर्द और कुछ रिश्ते !
अब कोई इसे -
काला धन बोले या सफेद ..
हमारे लिए यह है ;
बस ...
मन का भेद !

खुशियों की तलाश में ..
दौड़ते ..
ज़िन्दगी से रोज़ समझौता करते ...
एक आम हिंदुस्तानी से ..
क्या बटोर लेंगे ;आप ?

हाँ यदि ...
काला / सफेद का अंतर ...
स्प्ष्ट करने का ...
मन करे तो -
जो संसद में ...
इस मंथन में ...
अन्तर्नाद कर रहे हैं ...
उनकी सूची बना कर ...
प्रत्येक से ...
इतना ज़रूर पूंछियेगा कि-
२५ से ३० वर्षीय ..
राजनैतिक जीवन का ...
लेखा जोखा दें ...
जिसमें वे -
हज़ारपति से अरबपति ..
बनें हैं !

आपके इतना पूंछते ही -
वे गर्भ गृह में आकर ..
शोरगुल करके ..
सदन का बहिर्गमन ..
कर देंगे!
वह भी ..
अनिश्चितकाल के लिए !

बस ...
आप अपनी जीवटता से ..
बहिर्गमन मत करियेगा !

यकीन मानिये ..
देश आपके साथ है !

जब भागीरथ ..
नमामि गंगे को ..
पृथ्वी पर लाने के लिए ..
तप कर के ..
शिव की तपस्या ...
कर रहे थे तो -
भागीरथ के समतुल्य ..
ऋषियों ने ;
उन्हें भी -
वैसा ही कहा था ...
जैसा ये लोग ..
आपको कह रहे हैं !

नमन !

(गर्वित गौरव !)

Tuesday, November 22, 2016

नोटबन्दी पर राजनैतिक नक्सलवाद की मंडराती छाया !

कुछ ऐसी रफ्तार ..
हो गई है ज़िन्दगी की ..
कि न कुछ भाता है ..
और न सुहाता!

देश को -
दीमक की तरह ..
खाने वालों की सोचूं ?
उनका विरोध करूँ ?
या
अपने बच्चों ..
अपने परिवार का ..
ध्यान रखूं ?

देश की उथलपुथल ..
आहत करती है ;
एक आम भारतीय की ज़िन्दगी और
उसके सफरनामे को !

रंग भरते भारतीय को ..
बेरंग करने की ..
कुचेष्ठा करते रहते हैं ..
न जाने कितने ..
जयचंद और ब्रूटस !

किस से लड़ूं ?
किसको जवाब दूँ ?
और कैसे रोकूँ ..
अपने उद्देलित मन को ?
जो उकताहट और
अकुलाहट से ..
सोचता रहता है -
चंद्रशेखर आज़ाद बनने की!
और इन ..
देश विरोधी नामुरादों को ..
बस एक ही गोली से ...
काम तमाम करने की ..
जद्दोजहद में ...
बीत जाती है -
ज़िन्दगी की सुबह से शाम !

कब होगा मेरा भारत
इन घटिया शक्तियों से मुक्त ?
विरोध ,खिलाफत और बगावत में ..
धीरे धीरे ..
घिसट रही है -
बेचारी ज़िन्दगी !

बहुत दूर छोड़ आये ;
हम सफरनामा ...
प्यार और व्यापार का !

बस कुछ समझौतों से
गुज़र बसर चल रही है ...और
अब तो मन्दिरों के ..
देहरी पर भी ..
इन जल्लादों के ..
खात्मे की मुरादें ..
मांगी जाने लगीं हैं !

ख़ुशी इस की है कि -
इन मक्कारों के सीने में ..
ऐसी जलन मची है ..
जिसका इलाज ..
लाइलाज है !

 भ्रष्टाचारी ;
तड़पते ही रहेंगे !
ऐसी कमर तोड़ी है  ..
कि एक झटके में ..
झटक गए हैं और
मोदी की ५६ इंच छाती की
बात करने वालों की ...
खुद की कमर ..
छह इंच कम हो गई है !

तुमसे ...
कहने का मन करता है कि -
पांच सालों के लिए ..
तुमको हमने -
"छप्पन चौरंगी लेन"
से उतार कर ...
"डस्टबिन" में फेंका है ...
तो वहीँ पड़े रहो और
अपने गुज़रे ज़माने की ..
स्मृतियों की लिहाफ ओढ़े ..
समय गुज़ारो !

तुम्हारी हर कारगुज़ारियां .. 
देश प्रेम और राजधर्म ..
न हो कर ...
"राजनैतिक नक्सलवाद"
की श्रेणी में आतीं हैं और
यह देश तुम्हें ...
तुम्हारे नग्न स्वरुप में ..
देख रहा है; चुपचाप !

हम सन्तोष में हैं कि -
यह देश....
जितना अधिक ...
तुम्हें देख लेगा ...
उतना तुम्हें समझ लेगा ...
जिससे कभी ...
भविष्य में तुम्हारे प्रति ..
आसक्त न हो !

Friday, November 18, 2016

नोटबन्दी -राहुल और मोदी का द्वंद !

काश! राहुल; नितीश जैसे परिपक्कव होते और कभी कभी उचित बात पर मोदी जी का साथ भी दे लेते ; तो शायद लुप्तप्राय कांग्रेस बच जाती !
मोदी की हर बात में चापलूसी करना यदि गलत है तो फिर राहुल या विपक्ष को समर्थन देना भी तो अंधभक्ति को बढावा देना है !
वास्तविकता में कोई भी जन्मजात भाजपाई नहीं है और दस वर्षों पहले -मोदी -किसी भी प्रकार से देश की पहचान भी नहीं थे लेकिन -समय के प्रवाह में - सत्तारूढ़ कांग्रेस भारतीय मूल्यों और स्नेहपटल से दूर होती गई और सर्वश्रेष्ठ अपवाद के रूप में भाजपा का अभ्योदय होता गया और शिक्षित सवर्ण मगर बेरोज़गार उससे जुड़ता गया !
बेरोज़गारी ,आरक्षण ,भारतीयता और हिंदूवादी भावनाओं से ग्रसित जन उससे जुड़ते गए और कुछ इसके विरोधी भी होते गए !
प्रदेश स्तरीय राजनीति में ; मैं -भाजपा में कोई अतुलनीय कद नहीं पाता हूँ लेकिन उपलब्ध परिस्तिथियों में- जबकि कांग्रेस में किसी से लड़ने की क्षमता भी नहीं दिखती तो भाजपा ही उचित प्रतीत होती है !
यह भी मध्यप्रदेश का सौभाग्य है कि -
छोटी पार्टियों की राजनीति से हमारा प्रदेश अभी बचा हुआ है और सपा बसपा और मार्क्सवादी आदर्शवाद से अनछुआ हैं !
कतिपय आस्थाएं हो सकती हैं कि -यदा कदा विचरण करतीं हों लेकिन उनके शासन करने के मनसूबे अभी निकट भविष्य में फलीभूत होते नहीं दिखते !
गलतियां सभी में हैं !
नँगे सभी हैं !
दूध का धुला कोई भी नहीं !
ये भी नहीं और वे भी नहीं थे !
बस जिसकी गाड़ी चल निकली तो उसकी बातें भी चल निकलती हैं !
व्यक्तिगत तौर पर ;मैं किसी पार्टी का सदस्य नहीं परंतु भारतीयता के विषय पर उपलब्ध पार्टियों में मुझे भाजपा सवश्रेष्ठ लगती है !


"इंदौर से भोपाल जाना हो और
रात गहरा रही हो तो
जो भी संसाधन मिले
उससे लक्ष्य तक पहुंचना
उपयुक्त होता है ! "

कुछ ऐसा ही हाल -देश का भी -दो साल पहले था ; जब कांग्रेस को उतार कर भाजपा सत्तासीन हुई थी !

खैर ;सर जी!बहुत लम्बी दिल की बात हो गई !   आगे भी होती रहेगी !

अपनी अपनी सोच और अपने अपने तर्क !
कभी समझ का फर्क तो कभी बेडा गर्क !
सादर नमन सहित -
आपका सदैव -
गौरव !

Saturday, November 12, 2016

अनाम योगी कर रहा अपना काम !

मुझे नहीं पता ..
तुम कौन हो ?
बस इतना पता है कि -
किसी अनाम शक्ति ने ..
तुम्हें हिंदुस्तान के ...
भले के लिए भेजा है !

कभी लगता है कि -
तुम सरदार पटेल का
पुनर्जन्म हो ..
तो कभी लगता है कि -
कोई मायावी हो ..
जो न उत्तेजित होता है ..
न विचलित ...
न लांछित और ..
न शापित !

इतनी सारी ..
गलतफहमियों के बीच ..
इतनी सारी ..
बद्दुआओं के बीच ..
लक्ष्य को प्राप्त करना ..
कोई तुमसे सीखे !

साधारण !
नागा साधु !
न आगे कोई न पीछे !
निर्द्वन्द !
निष्कपट !
निर्भीक !
निर्लिप्त और निर्विकार !
ऐसे न जाने कितने ..
तमगे लगाने का ..
मन करता है पर ..
सोचता हूँ कि -
कोई इसे "अति" न कह दे !

खैर !
यदि महाकाल और मतंगेश्वर का आशिर्वाद रहा तो -
ऐसे ही ..
तुम्हारे लिए ...
लिखता जाऊँगा और ...
देखना एक दिन -
तुमसे जरूर भेंट होगी !

Friday, November 11, 2016

नोट सी मोहब्बत !

अब नोटों पर दिल बना कर ..
नाम लिखना ;
छोड़ दे ग़ालिब !

पता नहीं ..
मोहब्बत भी कमबख्त ..
एक हज़ारी नोट ..
की मानिंद निकले !

दिनभर साथ थी ..
रात बीती तो -
मुकर गयी !"

Monday, November 7, 2016

आखिरी रात पिता के साथ @ ७/११/१९९५

प्यारे पापा !
पता न था कि -
२१ साल पहले कि..
यह रात ;
आपके आगोश में ..
आपके साथ ...
मेरी इस ज़िन्दगी की ...
आखिरी रात थी !

अगर पता होता तो ;
ज्यादा कुछ नहीं तो ;
उस रात को ..
पूरी शिद्दत से ..
जीता और जागता ..
हर एक पल ..
आपके साथ ..
ताउम्र के लिए ..
यादें ....
बन जाने से पहले !

मेरे प्यारे पापा !
कहाँ हो आप ?
मुझे पता है ;
जहाँ हो आप !
पर ..
क्या करूँ ?
कैसे लूँ ; उस दुरी को नाप ?
जहाँ छुपे हो ; मेरे आप !

मेरे भी बाल अब ..
पकने लगे हैं ;
आँखों में भी ...
कुछ गड्ढे ..
उभरने लगे हैं ;
आपसे मिली ...
बीपी की बीमारी भी ...
धड़कने लगी है और -
बच्चे भी बड़े होने लगे हैं !
लेकिन
इतना सब होने पर भी ..
लगता है कि -
कहीं से ..
आप दिख जाओ और ...
मैं फिर से ..
छोटा सा ..
आपका दुलारा शानू बन ...
सीने से ....
चिपक जाऊं !

लेकिन अब ..
न आप हो ..
न आपकी परछाईं !
बस अगर कुछ है तो -
यादें और ..
ज़िन्दगी की वे अनमोल बातें जो कभी थीं ;
आपने बताईं !

सच !!
आज की रात ...
बड़ी मुश्किल से ...
फिर कट रही है ;
बिन आपके !!
पिछले बीस बरसों से ...
हमेशा की तरह !!

कोशिश करना कि ..
चल चित्रों की भांति ..
स्वप्नों में आकर ...
मुझे दुलार कर के ...
अंतर्ध्यान हो जाने को
मिल जाए !
फिर भगवान् की मर्ज़ी !!


राजनैतिक प्रदूषण !

जरा सी धूल क्या उडी सड़कों ...
सारी दिल्ली में -
जीना हराम हो गया !

उनसे भी ..
एक दफे पूंछ लेते ..
इलाज़ प्रदूषण का ..
जो पचास बरसों तक
झोंकते रहे धूल ....
हिंदुस्तानियों की नज़रों में ;
राज करके तख्तेताऊस पर !"

Tuesday, November 1, 2016

दीपावली!अकेला इंसा और सुलगते अरमा !

चकाचौंध करती रौशनी ..
धोके से फूटते पटाखे ..
जख़मीं होते इंसा ..
हंसता बुज़दिल !
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
महँगी मिठाईयां और पटाखे ..
बिगड़ता महीने का बजट ..
चढ़ती उधारी ..
दिखावटी श्रृंगार ..
बारूदी वहशी गन्ध और
शोशेबाज़ी !
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
भाइयों का ..
घर में जमा होना !
"दिवाली में दीवारें" खींच बंटवारे पर विस्तृत चर्चा ...
माँ पापा के स्वास्थ्य पर- परिचर्चा कि -"बढ़ती उम्र में कितना और चल जाएंगे ?"
और
लौटने के "कन्फर्म टिकट " की जदोजहद !
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
दिवाली बाद-
फिर सूना आकाश ..
बारूदी राकेट की जगह ..
उड़ते असली हवाईजहाज़ ..
टूटते तारे ..
गाँव में अकेली पगडंडियों पर
बुजुर्ग माँ-बाप ..
उठतीं मिठाई की दुकानें ..
धुलती कढ़ाइयों - खोमचे ..
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
फिर दिवाली की जगह ..
पटरियों पर दौड़ती ..
हक़ीक़त को लौटती ..
दिखावटी मगर दिलकश ज़िन्दगी ...
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !

Sunday, October 30, 2016

मन के दिए !

दीपावली पर -
कल ...
उनके पास ...
दिए रौशन करने गया ...
जिन्होनें हमें ..
रौशन किया !

बताया उनको कि -
अब वे ...
बहुओं और ..
पोते पोतियों वाले ...
हो गए हैं !

उनसे कहा कि -
"आपके आशिर्वाद से ..
हमारी ज़िन्दगी ..
रौशन है ...
और हमारी ...
रोज़ दिवाली है !

बस ......
कहीं अंतर्मन व्यथित है !
आपकी और माँ की ..
जगह खाली है !

उस "दिवाली" के -
रचियता से ...
एक ही "सवाली" है ?
इतनीं जल्दी क्यों ...
हमारे वटवृक्ष पर
अपनी कुल्हाड़ी चाली है ???

दिन महीने बरस ...
सब दशकों में बदल गए !
बिछोह का दर्द भी ..
पत्थर बन गए !
हम सम्भल और संवर गए !
लेकिन ..
बिन आपके ..
बहुत कुछ "ख्याली" है !

बच्चों की खातिर -
ऊपर से हंसता और ..
हंसाता हूँ ..लेकिन
अकेले में ;
बिन आपके ..
सचमुच नीरस दिवाली है !


एक सैनिक का सीमा से What's App सन्देश!

प्रिय !
पाकिस्तान की तरफ से ...
गोलीबारी हो रही है !
मैं झुरमुटों में ...
छिपाए अपना वज़ूद ..
लड़ रहा हूँ ...
मातृभूमिं हित !
प्रिय !!
तुम "दिए" जला कर ..
बच्चों को ...
मिठाइयां और पटाखे ..
बाँट देना !
एक "दिया"
मेरी तरफ से भी ...
माँ लक्ष्मी को ...
अर्पित कर देना !
सब कुछ ठीक रहा तो .. 
अवश्य जल्दी मिलूंगा !
शुभ दीपावली !
तुम्हारा
(सबकुछ !)

Saturday, October 29, 2016

इस दीपावली पर मेरी अरदास !

इस दीपावली ...

उम्मीदें कायम रहें ...
ज़िन्दगी में रोशिनी की !
आस्था कायम रहें ...
ईश्वर के अस्तित्व की !
लगन बनी रहे ;परिश्रम से.....                    सफ़लता पाने की !

विश्वास ;कमज़ोर न होने पाए  ...
सत्य की विजय का !
श्रद्धा बनीं रहे :माँ पिता के ...                          स्नेह और संस्कार की !
और ....
दृढ़ प्रतिज्ञ रहें :हमारा स्वाभिमान ...
देश के प्रति सम्मान का !

आओ प्रदीप्त करें-
"एक दिया" ...
आशा और निष्ठा का ...
और बुझा दें ...
सारा तमस और अँधियारा जो घेरे है ....
हमें चारों और से....
हमारे अंतर्मन को ...
कलुषित करता !

आओ पुनः स्पंदित करें ..
उन स्वप्नों को ..
जो समय के फेर में ..
काल की गति से ..
हार गए !

अभी चुके नहीं हैं ; हम !
अभी बुझे नहीं हैं ; हम !
साबित करेंगे ...
अपना वज़ूद और प्रकाश
 दैदीप्यमान हो कर ..
सारे नक्षत्र और ..
आकाश में !

"मैं ;
"दिया" हूँ !
अंधेरों के आगे ..
घटाटोप अँधेरी रात में ..
जब सूरज भी ..
सोने चला जाता है तब -
मैं अकेला ही ;
जागता रहता हूँ और ..
लोहा लेता हूँ ..
उस अँधेरे से जिसे ...
गलतफहमीं होती है कि -
वह रोशनीं से ...
जीत जाएगा !"

इस दीपावली -
जीवन लक्ष्यों को पुनः संकल्पित करने की ..
अरदास सहित -
शुभकामनाएं अग्रेषित हैं !

"रोशन हों -
आपकी दहलीज पर ...
खुशियों का संसार और
फुलझड़ियाँ बिखरा दें ...
चारों और ...
वैभव सम्पन्नता और प्यार !"
आपके सदैव -
[गौरव-वन्दना ;
आशीष -अर्चना ;
सब्यसांची ,अर्णव एवम यश्वी ]

Monday, October 24, 2016

मिटटी के मानुस का मिटटी से उचटता मन !

कितनी अच्छी होती थी ..
वो चिल्लर ..
जो भर देती थी ...
बचपन में ..
उमंगों की गुल्लक और -
रात में ...
जब हम सोते थे तो ...
बड़े आदमीं होते थे !

रोज़ सुबह ..
हाँथ फेर कर ..
जायज़ा लेते थे ..
उस बुलन्दी का ...
जो मिटटी से बनीं ..
हमारी गुल्लक होती थी !

अब समय के साथ ...
कुम्हारों ने भी -
बन्द कर दिया है ..
मिटटी की गुल्लकों को
बनाना ....
क्योंकि अब ...
बच्चों ने -
पैसों को छोड़ ...
रुपयों से दोस्ती कर ली है !
और
मिटटी की गुल्लकों ने ,,,
ले लिया है -
ड्राइंग रूम या बैठक में
करीने से प्राचीनता दर्शाती संग्रहित की गई
नायाब धरोहरों में स्थान !

ये कैसी दुनिया है मेरे भाई ???
जो ज़िन्दगी की आदतें थीं ..
वे क्यों बनतीं जा रहीं हैं -धरोहरें ??...
और मज़बूरियां ..
क्यों बनतीं जा रहीं हैं -आदतें ??

दीपावली में मिटटी के दिए छूटे ...
मिटटी की गुल्लकों का चलन छूटा और -
मिटटी के मटके या घड़े भी ...
जोह रहे है ..
अपनी उपलब्द्धता और चलन की
अंतिम साँसें !

मिटटी से दूर होता इंसान ...
आखिर में ...
मिटटी ही तो बन जाता है !

लेकिन उस मिटटी से ...
कतराता है ...
जो अंगीकार कर लेती है;
उसका वज़ूद ...
उसकी साँसें उखड़ने के बाद !!

Sunday, October 23, 2016

मेरी कहानी ... बस इतनी सी !

मेरी कहानी ...
बस इतनी सी !

लोग मिलते गए और ..
मैं प्यार करता गया !

लोग बिछड़ते गए ...
मैं उलझता गया !

मैं छोड़ नहीं पाया उन्हें ...
जो छोड़ गए मुझे !

मैं भूल नहीं पाया उन्हें ...
जो भूल गए मुझे !

मकड़ी के जालों के चंगुल जैसा ...
फँसता गया मैं ...
हाँथ पैरों की भांति -
दिल ओ दिमाग भी
जकड़ता गया
उन अनाम .....
बिछड़े रिश्तों के बाहुपाश में
और एक दिन ...
इन बेगैरत अफसानों ने ..
चूस कर मेरा वज़ूद ...
झोंक दिया मुझे ..
समय की भट्टी में ...
हमेशा हमेशा के लिए;
नेस्तनाबूत होने को !

लेकिन इतना भीषण ...
तेज़ाब फेंकने के बाद भी ..
मैं लौट कर आ गया ...
अपनी स्वप्निल दुनिया में ..
जहाँ ...
अब मैं बहुत खुश हूँ ...
अपने इकलौते ...
दिल के सहारे ...
जिसका ह्रदय प्रत्यारोपण ..
कर दिया है ...
मेरी उलझनों के बाद आई ..
सुलझन ने !

देख लो-
ऐ दिल के बेईमान सौदागरों !!
मैं जिन्दा हूँ !
अपने होशोहवास में !
तुम्हारे श्रापों के बावज़ूद !

Saturday, October 22, 2016

एक बून्द के पीछे भागता रहता है इंसान!

एक बून्द के पीछे भागता रहता है इंसान ...

यदि "ठोस" की अपनी  उपयोगिता होती तो; "तरलता" के क्यों इतने मायने होते ??

एक बून्द प्यार में -समर्पण ..
एक बून्द -आंसू से -दुःख तो एक बून्द -आंसू में समाया सुख भी !
एक बून्द -मदिरा के रसपान से कलह तो ...
एक बून्द दुग्धपान से -
माँ शब्द की उत्पत्ति !

एक बून्द अमृत पान से .. अमरता तो ...
एक बून्द विषपान से मृत्यु !

एक बून्द अमृत के इन्तिज़ार में ....
शरद पूर्णिमा की खीर ..
तो एक बून्द अमृत के इन्तिज़ार में ....
देवताओं द्वारा
समुद्र मंथन !

एक बून्द स्खलन से .. जीवोत्पत्ति तो
एक बून्द जबरदस्ती से व्याभिचार !

एक बून्द तर्पण में -जीवन  चक्र से मुक्ति ?
तो एक बून्द अर्पण से ...
भागीरथी का आगमन !

एक बून्द नफरत से दंगे तो
एक बून्द मोहब्बत से ..
सभी खुशियों संग रँगे !

एक बून्द  -
लहू निछावर करने से -शहीद तो
एक बून्द पसीने से -कर्मठता !

एक बून्द सिन्दूर से सुहागिन और
एक बून्द बिन सिन्दूर के ....
एक सधवा की ...
विपरीत यात्रा का अनुगमन !

देखना बूंदों पर टिका संसार ....
बूंदों में समा जाएगा !
देखना प्रलय भी बूंदों से होगा....

Wednesday, October 19, 2016

करवे और चाँद के बदलते मिजाज !

न जाने कैसे ..
कुछ दशक पहले ..
उसके करवे का
चाँद बना था -
मैं !

लेकिन बस ..
वही ..
छुटपुट छुटपुट  -
कुछ पलों के लिए ही ..
उसका ...
भगवान् बना था ;
मैं !

अब सहा नहीं जाता ..
ये दस्तूर ..
ऐ दिल ;
उम्र के हर पहलू में ...
एक इम्तिहान बना था ;
मैं !

आज -
जब खड़ा होता हूँ ...
छत पर ...
जीवन साथी का चाँद बन ..
तो
क्यों याद आते हैं ..
वे अक्स ...
जिनके लिए कभी ..
मेहरबान बना था -
मैं !

बहुत कठिन होता है -
किसी के ..
जज्बातों से खेलना !
लेकिन ..
जब खेल और खिलाडी ..
दोनों रजामन्द हों तो ..
हार में भी और
जीत में भी ..
खुशियां तलाशनी पड़ती हैं !
और इन्हीं पलों में ....                                   जीवन का दस्तूर और ....                         इम्तिहान बना था मैं !

आह !
पता नहीं ..
तब श्मशान बना था; मैं ??
या अब ...
इंसान बना हूँ ; मैं ??

Tuesday, October 18, 2016

और मुहर्रम गुज़र गया !

"और मुहर्रम गुज़र गया !
मैं;सोचता रह गया ..
हाथों में नया रूमाल लिए ..
कि -
"वह आएगी ...
दुखी मन से ...
मुहर्रम पर तो -
मैं उसके आंसू पोंछ दूंगा !"

लेकिन ..
न वो आई न मेरे ख्वाब ..
सच हुए !

बस अब ...
ताज़िये हैं ;सुस्ताते  हुए....
अगली मुहर्रम के इन्तिज़ार में  ...
और मैं हूँ  -
परेशां परेशां !"

Sunday, October 16, 2016

Antique Love in Letters!

महफूज़ रखा करो ..
"जज़्बातों" को ,
पुरानी चिट्ठियों के अंदर !

जमींदोज़ कर दो इसे ..
महफ़ूज़ियत से ..
किसी बर्तन के अंदर
कई दशकों के लिए !

जब कभी ..
सैकड़ों साल बाद ..
मोहब्बत जैसी -
किसी प्राचीन चीज़ की तलाश  ...
मनोवैज्ञानिक  करेंगे तो ...
ये चिठियाँ ...
उड़ेल देंगी ...
अपना सारा प्यार और पवित्रता ...
उन भटकते लोगों पर ...
जो खोज रहे होंगे ..
मोहब्बत और उसकी फितरत में ....
ईश्वर का वास !
क्योंकि ...
भगवान् भी मोहब्बत में ही बसते हैं !

अब कोई ...
मोहब्बत के नाम से ..
चिट्ठी नहीं लिखता !

न कोई कसमें खाता है ..
न वादों की भीड़ ..
लगाता है ;
और न -तड़प कर ..
आंसू बहाता है !

सिर्फ सेटिंग, प्लानिंग और मैनेज कर के ही ..
हो जाती है ..
डेटिंग और चैटिंग और
बेचारी मोहब्बत ...
बैठी रहती है ...
किसी मंदिर की ...
चौखट पर ...
अपनी पाकीजगी ..
बयां करती हुई !

Saturday, October 15, 2016

शरद पूर्णिमा - ज़िन्दगी की खीर की कटोरी और एक बून्द प्यार की दरकार !

शरद पूर्णिमा !!!

उन धड़कनों को ..
तहेदिल से सलाम ..
जो कभी ...
ज़िन्दगी की दौड़ में ...
मुझ चकोर की ...
चांदनी बनीं !

उन धड़कनों को -
"नज़राना सुकून का" ;
जिन्होंने कभी ..
चाँद सी शीतल बन ...
मुझे शीतलता दी !

उन कराहटों को -
दर्द भरी कराह ...
जिन्होंने -
वीरान रातों में ...
एकांकी कराह दी !

उन मासूम ,हसीन ...
चेहरों को -
"दस्तक दिल की" ;
जिन्होनें अपना ....
चाँद सा मुखड़ा ...
कुछ दूर तक ...
मुझे सौंपा ;
यूँ ही ...
साथ चलते चलते ...
गलबहियां करते ...
प्यारी सी बातें ....
बतियाने को !

उन बादलों को भी ..
भीना भीना सा सलाम ;
जो अक्सर ..
शरद पूर्णिमा की रात को ..
ढाँप लेते थे ,
हम जैसे ...
"चाँद और चकोर" को -
जिससे ..
हम ...
उस अँधेरी चाँदनीं के ..
दो पलों में -
दो ज़िन्दगानियां ...
गुज़ार लेते थे ;
बेखटके !

उन अँधेरी चांदनी रातों को ..
दर्द और सर्द का ...
मिलाजुला सलाम ..
जो ज़िन्दगी में आईं और ..
जिन्होनें दस्तक दी ..
मोहब्बत करने की !
उड़ता दोपट्टा...
सम्भाल कर ...
उढाने की जुर्रत करने की !
और
उड़ती जुल्फों को ...
अपनी उंगलियों की ...
कंघी से ...
संवार कर ...
सलीके से प्यार करने की !

आखिर में ...
उन रज़ाइयों को ..
उन तकियों को ..
उन चादरों को  ..
और उन तन्हाईयों को ..
सिगरेट के धुओं के छल्लों सा  ...
सलाम ...
जो गुज़र गईं ..
तुम्हारे इन्तिज़ार में ...
एक पूरी उम्र ...
कोरी कोरी ..
सूनी सूनी ....
और बासी बासी ....
के किसी शरद पूर्णिमा के दिन  .....
पैदल चल कर ..
खुद मेरे मन के आँगन में ..
उतर आएगी ..
मेरी धवल चांदनी और
छा जायेगी -
मेरी ज़िन्दगी में ...
मोहब्बत की मिसाल बन !

पर ......?
सारी रात गुज़र गई ...
सैकड़ों पूर्णमासियां निकल गईं ...
तुम्हारा चकोर ...
आज भी इन्तिज़ार में है;
तुम्हारे मिलन के !

काश !!
मेरी ज़िन्दगी की खीर में ..
शरद की ...
इस पूरनमासी में ...
टपका देतीं तुम ...
अपनी एक बून्द शहद की ...
तो ...
संवर जाती ...
मेरी भी ज़िन्दगी और ...
अमर हो जाती ...
मेरी प्रेम कहानी !
काश !!

Thursday, October 13, 2016

ऐ ज़िन्दगी मेरा हिसाब कर दे !

सांझ होने को आई लेकिन
धूप ढलती नहीं ...
फ़िज़ाएं बदलती नहीं और
बादल बरसते नहीं !

सुबह ने बोला कि -
मेहनत कर ..
सांझ में सुकून मिलेगा !

दोपहर ने बोला कि -
मत घबरा ;
सांझ में सुकून मिलेगा ...
और सांझ में -
जब मैं पहुंचा कि -
ऐ ज़िन्दगी ;
मेरा हिसाब कर दे ...
अब सांझ की बेला ...
आ गई है ..
तो सांझ ने बड़ी -
तसल्ली से कहा की ...
घबराओ मत और
मेहनत करो ...
देखना कल की सुबह ..
बहुत सुनहरी और
सुखद होगी !

और ऐसे ही ...
सांझ के सुकून और
सुबह की सुनहरी ..
आशा की चाह में ...
दौड़ गया ...
एक पूरी ज़िन्दगी की ..
मैराथन दौड़ !

और आज जब ..
खोजता हूँ -
इतनी लम्बी दौड़ के बाद ..
सुकून के कुछ पल तो ..
बस ;
बुढ़ाता शरीर और
उखड़ी हुई साँसों के सिवा ..
ज्यादा कुछ नहीं दिखता !

वो तो शुक्र मनाओ ..
मेरे जीवट का ;
जो इस दहलीज पर ..
मुझे खुद के नागा सम्प्रदाय के होने का .. अहसास हुआ और
आत्मा ने समझाया कि ...
क्यों घबराता है ..
न सिकन्दर की ..
न अकबर की ....
औकात थी कि -
मौत के समय ..
कुछ ले दे कर ..
ज़िन्दगी को ..
"दाखिल दफ्तर" करें !

किसी को चीटियों ने खाया ..
तो कोई गंगा की खाद बना !
वाकई
बादशाहों को भी ..
नँगे बदन और खाली हाँथ ..
जाना पड़ा !

ये तो -
ज़िन्दगी का निचोड़ है !

दूर की हर चीज़ ..
सोना लगती है और
उसकी चाह में ..
ये निरा पागल मानव ..
भागता रहता है ;
सारी उमर और -
जब भोगने का वक़्त ..
आता है तो -
डाइबिटीज और
हार्ट पेशेंट बना कर ..
सबसे पहले उसका
खाना पीना ..
हराम किया जाता है और ..
फिर धीरे से -
रवानगी रजिस्टर पर ..
दस्तखत करवा कर
उसे
RIP कह कर ..
निबटा दिया जाता है !

तू क्यों घबराता है ?
जरा उनकी भी सोच ..
जिनकी ज़िन्दगी में -
हर रात के बाद ..
सुबह नहीं ;
बल्कि रात ही आती है ??

ज़िन्दगी !
अपना दस्तूर निभाती है
और तुझे !
अपनी सीरत निभा कर ..
इस बेअदब ज़िन्दगी को ;
तहज़ीब और मोहब्बत सिखानी है !

"तू अपना काम कर और
वो तो -
अपना काम कर के ..
तुझे निबटा ही रही है !"


Tuesday, October 11, 2016

हम जल गए और रावण जिन्दा रह गए !

बहुत कोशिश की ...
बहुत बारूद डाली ..
लेकिन
जला न सका मैं ;
कल रात ..
देश के रावणों को !

अरे!
एक आध रावण होता ..
तो यूँ ही मार कर ;
फांसी पर चढ़ जाता ..
लेकिन
यहाँ तो -चारों और
रावण तो रावण ..
अरे उसके भी पितामह 
खड़े हुए हैं !

रावण के तो दस सर थे ..
इन आधुनिक रावणों के तो ..
सैकड़ों सर हैं !

बहुत ही शक्तिशाली हैं ..
ये रावण के वंशज !

न जाने कौन सा 
वरदान है ..
इन अताताइयों को जो ..
इनकी मोटी खाल में -
कुछ भी ..
असर ही नहीं करता ?

बेशर्मी ,निर्लजता और गद्दारी से
सराबोर ये रावण ..
शायद उस त्रेतायुगीन ..
रावण के ही ..
वंशज होंगे ;
तभी तो ..
हनुमान जी द्वारा ..
लगाई आग का बदला ..
लेने ये वंशज ..
लंका से आकर ..
सारे भारतवर्ष को ..
जला रहे हैं !

सच !
कभी कभी लगता है जैसे -
जलाना ..
हमें रावण को था;
और आज -
रावण हमें जला रहे हैं !!

इन रावणों ने बदल दिए हैं - बाणों के नाम !

कभी काश्मीर तो कभी आरक्षण और धर्मनिरपेक्षता जैसे ....
सर्वव्यापी बाणों से ..
भारत वर्ष का ..
संहार करते हैं !

न ये डरते हैं और ..
न ये मरते हैं !

यदि भारतवर्ष को ..
बचाना है तो -
सिर्फ एक ही रास्ता है ;
इन बुढाते ,लँगड़ाते और
खांसते - खंखारते ..
रावणों को -
चुनाव में इनकी औकात दिखलाओ और ..
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम से-
आग्रह करो कि -
हे प्रभु !
ऐसी कोई "इंटरनल स्ट्राइक"  चलाओ की ..
ये सारे रावण ...
देश हित में ..
थोड़ा जल्दी ..
नरकारोहण की और
पलायन कर जाएँ !