Monday, January 30, 2017

ठूंठ होते वृक्ष ....

अगर ...
रहमत का असर ...
देखना हो तो ...
आ कर कुछ दिन ...
मेरे आंगन में ...
वक़्त गुज़ार कर देखो !

दुआओं की ...
बारिश होती है ;
हर रोज़ ...
मेरी धूसर ज़मीन पर !
और ...
मैं बागबान बन जाता हूँ ...
हर रोज़ ..
अपने गुज़रे पिता की ..
सीखों की बदौलत !

अरे ;
ज्यादा कुछ नहीं ..
प्यार के ...
दो मीठे बोल ही तो ...
बोल देता हूँ ...
मैं ;
उन सफेद पड़ चुके ....
बाल वालों से और .....
अपने बेटों से ....
चाहतों का इन्तिज़ार करते ...
ये ठूंठ होते वृक्ष ....
मुझे बेटा समझ ...
गले लगा लेते हैं !

Sunday, January 29, 2017

हक़ीक़त!

जब कुछ ले कर ...
जाना नहीं !

जब लौट कर ...
इस पते पर ...
दुबारा आना नहीं !

ये अरमाँ ...ये ख्वाब ..
ये फ़साने और मोहबत्तें ..
जन्मों जन्मों का ..
कोई तराना नहीं !

तो तू ..क्यों परेशां है ;
ऐ बन्दे !
इस मायाजाल से ?

"तुझे कुछ ...
ले जाना नहीं !
और ...
मालिक को ...
कुछ मंगाना नहीं !"

उम्मीद!

"उम्मीदों को ..
उम्मीद के सहारे ...
ज़िंदा रखे हूँ !
न उम्मीदों की फेहरिस्त में ...
इक आखिरी उम्मीद ...
तेरी उम्मीद है !"

Wednesday, January 25, 2017

बच्चे का उत्तर !

नेताजी की आलीशाान कार सिग्नल पर रुकी तो झंडा बेचने वाला नन्हा सा लड़का  कार के नजदीक आया  और नेताजी से झंडा खरीदने को  कहा !उन्होंने झंडा तो नहीं  खरीदा परन्तु बच्चे से पूंछा  ,
" कभी झंडे, कभी पेपर, कभी रुमाल ...
क्या क्या नहीं बेचते तुम ?"
बच्चे ने मासूमियत से उत्तर दिया..
" देश,...! "

Sunday, January 22, 2017

अंतिम मुलाक़ात फिर आजीवन का वनवास

✍✍
"ये आलिंगन ..
और तुम्हारा बाहुपाश !
ये बन्धन और विस्तृत ...
सारा आकाश !
कितना सुन्दर और
मधुर है ...
तेरा मेरा ये आलौकिक अहसास !
साथ बिताये ...
ये पल छिन्न और
सदा सदा के लिए ..
इस जनम में ...
न मिल पाने का ..
अहसास !
ओह ! तेरा साथ !
हाँ !
इतनी कसक जरूर ...
रह गई कि ...
मना न पाए हम अपना मधुमास !
अधूरी रह गई ;आस ..
और बस ...
अब सदा सदा के लिए ..
तेरा मेरा हो गया ...
अक्षुण वनवास !
क्या करें ?
इतना ही था साथ !!
एक रात ...
हाथों में हाथ ;
और फिर ...
इक लम्बा वनवास !
इस जनम में ..
तेरे बिन ;प्रिये ...
इक लम्बा कारावास !
ओह मेरी अधूरी श्नवास !
मेरी ज़िन्दगी !
मेरा वनवास !
ठहरना या पिघलना मत ...
देख मेरा ...
ये हाल बेहाल !!"
!✍✍✍✍

Thursday, January 19, 2017

रिश्तों की बागवानी!

रोज़ ढूंढता हूँ ...
अपने अंदर ...
रिश्तों की गर्माहट से ...
लदी रज़ाई और ...
उसे ओढ़ ...
सुबह से ही ...
निकल पड़ता हूँ ..
ज़िन्दगी को ...
ज़िंदा रखने की जुगत में ..
पंछियों की मानिंद ...
अपने दायरों के भीतर ...
सिमट कर !

भाईसाब नमस्ते !
दादा कैसे हैं ?
अरे !
कब ? कैसे हुआ ?
चलो कोई बात नहीं !
हमारे लायक कोई काम हो जरूर बताएं ?....और
आप चिंता न करें ;मैं हूँ न !
जैसे अपनत्व के शब्दों को ..
दिलासा की चादर में ...
लपेट कर ...
चल पड़ता हूँ ....
यूँ ही ....
निष्कपट और निरर्थक !

पता नहीं ..
ये रोज़ ...
सुबह सुबह से ..
सबंधों को ...
खाद और पानी देना और ..
रिश्तों की बागवानी करना ..
किसने सिखाया ?

बस लगता है कि -
पुरुष हूँ तो पौरुष होगा ही ?
ज़िंदा हूँ तो ज़मीर होगा ही ?
और दिल है तो ....
स्पंदन होगा ही ?

हाँ !इतना ज़रूर है कि अब ...
पौरुष,ज़मीर और स्पंदन भी ..
अपनी अपनी ...
मनगढ़ंत परिभाषाओं और ..
विवेचनाओं के दायरे में ..
सिमट कर ...
बदलने लगे हैं ...
अपने फलसफे !

मुझे क्या ?
मुझे तो पता है ;
अपना कद और प्रतिफल !
क्योंकि बस यही तो नियति है !
जो मेरे काले अध्याय हैं और जो मेरे हाथों रचित ..
कुनीति है ...
वही तो परिणिति है !

परिणिति से ..
पछतावा करना भी तो ...
मूर्खता है ?
क्योंकि ...
कभी वह भी तो ...
मेरी ही रचना और ..
मेरी ही प्रीति थी ?

Tuesday, January 17, 2017

बेलिबास है ज़िन्दगी !

"उस ऊपर वाले का ..
शुक्रिया कहो ;
जिसकी नेमत से ..
तुम रज़ाई में ..बख्तरबंद हो ..
चैन की नींद
सो रहे हो !"
वर्ना ..घोंसलों से लेकर .. झोपड़ियों तक ..
बेलिबास है ज़िन्दगी !

नागा साधु और ठिठुरती सर्दी

कभी कभी ...
आस्था विश्वास और ..
संस्कार ..
कहने लगते हैं कि ..
बुद्धि विवेक और चतुराई को  ...
हर जगह हावी नहीं होने देना चाहिए !

इस ठिठुरती सर्दी में ...
ज्यादा कुछ नहीं ...
एक नागा साधु को ...
एक शाल उढाया !
बस यूँ ही ...
मन में आया क्योंकि ..
वो साधु .....
बस यूँ ही टकराया !

उसने भी आशीर्वाद में
इक रुद्राक्ष थमाया !

ज़िन्दगी तो यूँ ..
चल ही रही है ..
ज्यादा सोचना और तौलना  ...
अनुचित !

Monday, January 16, 2017

पकड़ वटवृक्ष सी !

ऐ ज़िन्दगी !
जब जी चाहे ...
मेरा इम्तिहान ले लेना !
मैं तपाया गया हूँ ...
सोने की माफिक ;
जितना तू उलझाएगी ..
मैं सुलझता जाऊँगा !
मैं चमकता जाऊँगा !
मेरी रगों में और जड़ों में ..
पकड़ है ...
वटवृक्ष की मानिंद !
तू तूफ़ान भी लाएगी तो ..
कुछ पत्तियों के सिवा ...
कुछ न उड़ा पायेगी ...
और मैं ...
झेल जाऊँगा निर्भीक ...
तेरी हर चाल !

Sunday, January 15, 2017

मकर संक्र्रान्ति!

आदरणीय!
"मेरी जीवन पतंग को ...
डोर देने के लिए ;
मेरे ख़्वाबों को ...
पंख देने के लिए और
उड़ान को ...
गति देने के लिए ;
आभार ; दिल से !"
"आपको भी मकर संक्र्रान्ति शुभ हो ..
प्रखर हो ..
सात्विक और ऊर्जाशील  हो !
आभार तथा नमन ; दिल से !
[ गौरव !]

Saturday, January 14, 2017

मकर संक्रांति फौजी की याद !

प्रिय फौजी मित्रों !
"तुम बैठो हो ..
हिमाच्छादित बर्फ की -
तलहटी की खन्दकों में ..
बन्दूक और दूरबीन थामे ..
मातृभूमि और
हम सभी की
रक्षा करते !
और हम ..
अपने घरों की ..
छतों पर खा रहे हैं ..
तिल के लड्डू और गजक ..
धुप लेते हुए !
सच ...
बहुत कुछ त्यागते हो तुम ..
हम सब के खातिर !
बेआवाज़ दरख्त बन ..
तुम कभी भी ..
दफन हो जाते हो  ..
तिरंगे में लिपट कर ..
चन्द अखबारों के ..
पीछे के पन्नों की ..
सुर्खियां बन !"
मकर संक्रांति पर ..
जीवट और जौहर को ..
सदर नमन !

Wednesday, January 11, 2017

ज़िन्दगी -शब्दऔर प्रारब्ध!

ऐ ज़िन्दगी !
तू मुझे ले तो जा रही है.....
टेड़े मेढे रास्तों पर....
अपनी पूरी जदोजहद से पर-
यकीन नहीं होता कि-
ये तू ही है !

कल तक.......
नदी-पर्वतों  .......दूर गगन की छाँव की.....
बातें करने वाली ;ऐ रुखसार !
एक दम से  ....
तू इतनी बदल क्यों गई ;
मेरी हमनवां ?

कहाँ मुझसे गलती हो गई ?
जिसकी सजा  ...
इतनी बेहतरीन अदाओं के साथ  ...
मुझे परोस कर  ...
तू दे रही है ?

मुझे पता है कि -
मैं थोड़ा सा  ...
लिजलिजा सा इंसान हूँ।
न एकदम से बहुत तीखा और  ...
न शहद सा मीठा और  ...
शायद इसी कारण ;
मुझसे आलिंगन करने वाले लोग  ....
मुझमें न वो गर्मी पाते हैं और न वो कशिश,
जिसकी खोज में  ....
वे मुझे अपने बाहुपाश में बांधते हैं !

क्या करूँ ??
उस ऊपर वाले ने कुछ बनाया ही ऐसा है !
थोड़ा सनकी  ....
थोड़ा ठनकी  ....
बस कुछ कुछ ऐसा ही  ....
बेसिरपैर का  ..... बेवक़ूफ़  .... बदतमीज और
बेतकल्लुफी भरा एक नामाकूल इंसान !

मैंने भी सोच लिया है कि -
तू छका  .....
जितना छकाना हो ;
और मैं भी  ...
उतना ही चहकूँगा  .....
जितना तू छकाएगी !

मुझे पता है कि-
मेरी मन्ज़िल  ....
तेरे टेढ़े मेढ़े रास्तों से ही  ...
गुज़र कर जाती है क्योंकि;
मैं एक ऐसी शख्सियत का बेटा हूँ जिसने  ,,,
उसके हिस्से में मिले  ....
टेढ़े मेढ़े काँटों भरे रास्तों पर  ...
बिन माँ के हम दो भाइयों को भी  ....
गोदी में उठाया हुआ था।

चल  ....
दो दो हाँथ करते हैं और  ....
पंजा लड़ाते हैं।
तू अपना दांव लगा और  .... मैं अपना।
देखे ऊँट किस करवट बैठता है ?

मेरे पास मेरे शब्द और यकीन है तो  ...
तेरे पास मेरा प्रारब्ध।

मेरे शब्द और तेरे पास क़ैद मेरे प्रारब्ध के बीच हो जाए युद्ध।
देखे क्या होता है ;लिपिबद्ध !!!




विनम्र श्रद्धांजलि उस कांग्रेसी नेता को जो "गाँधी" नहीं है !

विनम्र श्रद्धांजलि उस कांग्रेसी नेता को जो "गाँधी" नहीं है !

"जितना बौना कद उतनी ही ऊँची शख्सियत !"
"जब मैं पैदा हुआ था तब आप अपना कर्तव्य और "जय जवान जय किसान" का अमर जयघोष दे कर जा चुके थे। बुजुर्ग अध्यापकों ,किस्से कहानियों और यदा कदा सामान्य ज्ञान की प्रतियोग्यताओं में अवश्य आपका नाम आता रहा और हमने और हमारी पीढ़ी ने धीरे धीरे उपलब्ध साहित्य और समाचार पत्रों के माध्यम से आपको जाना और पहचाना। वाकई आप गज़ब के इंसान थे !"जितना बौना कद उतनी ही ऊँची शख्सियत !" आपने भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रहते वर्ष १९६५ के युद्ध में न सिर्फ पाकिस्तानियों को उनकी औकात बताई वरन सादगी और सहज पन की एक ऐसी मिसाल और रेखा खींच गए जिसे आज भी कोई पार नहीं कर पाया। आज विश्वास नहीं होता कि बिना "गाँधी" टैग लगाए आप कैसे प्राचीन परंतु आधुनिक भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बन गए या बना दिए गए ?आप होते तो इस प्रश्न का जवाब जरूर पूंछता ?क्योंकि मेरे जीवन काल में जो भी कांग्रेस के प्रधानमन्त्री बने या बनाये गए हैं वे सदैव -"परिस्तिथि जन्य" उपज थे। मुझे पता है कि -उस समय आप एक "ज्वार" थे और समूचे हिंदुस्तान का जनसैलाब आपके पीछे खड़ा था। और शायद यही प्राकृतिक नैसर्गिक न्याय भी था जिसने आपको प्रधानमंत्री बना दिया। ताशकंद में आपकी मृत्यु और सैकड़ों अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब तो अब नहीं मिलेंगे परंतु हम सदैव आपको आपकी सज्जनता तथा विनम्रता के लिए अपने दिलों में सहेजे रहेंगे। दुःख है कि -आज आपको उन लोगों ने याद बहुत कम किया जिनकी पार्टी के आप सिपहसलार थे !खैर ;वे भी परेशान हैं और अपनी अस्मिता और अस्तित्व की अंतिम लड़ाई के दौर से उनकी पार्टी और नेतागण गुज़र रहे हैं। कभी कांग्रेस में आप जैसे महान नेतृत्व ने भी पथसंचलन किया ;यकीन नहीं होता !"
यकीनन -आप माटी के -"लाल' थे !
यकीनन -आप भारत के "बहादुर" बेटे थे !
यकीनन -आप प्रखण्ड विद्वान् "शास्त्री" थे !
सदर नमन !
[असंख्य भारतवासी !]

Saturday, January 7, 2017

रफ्ता रफ्ता !

ज़िन्दगी ....
चलती जा रही है ;
रफ्ता रफ्ता !

हम भी ...
मिलते,बिछड़ते और
हंसते मुस्कराते ...
चलते जा रहे हैं ...
रफ्ता रफ्ता !

माना कि -
मोहबतों के दरिया ..
न पार कर पाए हम ...
पर ..
बेवफ़ाई के छीटों से भी ...
हमें कोई ...
भिगो नहीं पाया ..
रफ्ता रफ्ता !"