कभी कभी ...
आस्था विश्वास और ..
संस्कार ..
कहने लगते हैं कि ..
बुद्धि विवेक और चतुराई को ...
हर जगह हावी नहीं होने देना चाहिए !
इस ठिठुरती सर्दी में ...
ज्यादा कुछ नहीं ...
एक नागा साधु को ...
एक शाल उढाया !
बस यूँ ही ...
मन में आया क्योंकि ..
वो साधु .....
बस यूँ ही टकराया !
उसने भी आशीर्वाद में
इक रुद्राक्ष थमाया !
ज़िन्दगी तो यूँ ..
चल ही रही है ..
ज्यादा सोचना और तौलना ...
अनुचित !
No comments:
Post a Comment