Tuesday, January 17, 2017

नागा साधु और ठिठुरती सर्दी

कभी कभी ...
आस्था विश्वास और ..
संस्कार ..
कहने लगते हैं कि ..
बुद्धि विवेक और चतुराई को  ...
हर जगह हावी नहीं होने देना चाहिए !

इस ठिठुरती सर्दी में ...
ज्यादा कुछ नहीं ...
एक नागा साधु को ...
एक शाल उढाया !
बस यूँ ही ...
मन में आया क्योंकि ..
वो साधु .....
बस यूँ ही टकराया !

उसने भी आशीर्वाद में
इक रुद्राक्ष थमाया !

ज़िन्दगी तो यूँ ..
चल ही रही है ..
ज्यादा सोचना और तौलना  ...
अनुचित !

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