Sunday, January 29, 2017

हक़ीक़त!

जब कुछ ले कर ...
जाना नहीं !

जब लौट कर ...
इस पते पर ...
दुबारा आना नहीं !

ये अरमाँ ...ये ख्वाब ..
ये फ़साने और मोहबत्तें ..
जन्मों जन्मों का ..
कोई तराना नहीं !

तो तू ..क्यों परेशां है ;
ऐ बन्दे !
इस मायाजाल से ?

"तुझे कुछ ...
ले जाना नहीं !
और ...
मालिक को ...
कुछ मंगाना नहीं !"

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