Monday, November 30, 2015

सफर !



सफर तो काफी तय कर लिया था ;
हमने -
प्यार में चलते चलते  ....
प्यार में मिलते मिलते  ....
और
प्यार में बिछड़ते बिछड़ते  ....

धुप छाँव और बादलों का सफर  ...
कस्मे वादे और यादों का सफर  ...
रीत रिवाजों का ऊँच नींच वाला सफर और
हंसी ख़ुशी मिलने और बिछड़ने का
सबसे लम्बा सफर।

मंदिरों में मन्नत मांगने का सफर  ...
चादर चढ़ाने का सफर  ....
झोली फ़ैलाने का सफर और -
व्रत उपवास के साथ चालीस बीवी की कहानी ;
सुनने का सफर।

रात रात भर जाग कर  ... जागने का सफर  ...
रात रात भर आंसुओं से दरिया  ....  भिगोने का सफर  ....
आधी रात को बेफालतू में तेरी फोटो को  ....
बिंदी लगाने का सफर  ....
और
तेरे को गुस्से में फाड़ कर फेंक देने का सफर  ....
पर
फिर धीरे से तेरी कतरनों को बीन कर  ...
पुनः तेरा अक्स बनाने का  ...
सफर।

इतना सब कुछ करने के बावजूद  ...
कुछ ख़ास मिला भी तो नहीं।
तू निकल गई अपने सफर और -
मैं चल निकला बिना हमसफ़र।

बस लम्बा सफर  ...
तेरे बिना  ...
खाली खाली  ...
सिफर सिफर  ....

फिर मिला अगला पड़ाव।
इंतज़ार करता  ...
इक गहरा भंवर।
समेट लिया उसने -
मेरा सारा शहर।

उसने थामा मेरा सफर  ....
ऐसे जैसे -
वही हो कोई मेरा -
बाजूबंद और पूरा जीवन प्रहर।

खो गया पूरा वज़ूद मेरा  ....
उसके आगोश में ;कुछ ऐसे -
जैसे -उड़ते बादल ने समेट ली हो -
पूरी उन्नत नुकीली हिमाद्रित चोटी -
अपने बख्तरबंद लिबास में।

हाँ।
कभी कभी
अब भी याद आ ही जाती हो
पुराने मंदिरों में  ...
पुराने देवी-देवताओं के सामने  ....
तो कभी -
किसी कॉलेज जाती लड़की की किताबों में  ...
तो कभी किसी डरी सहमी झिझकती आँखों में  ...

पर चलो फिर बन जाएँ-
पथिक।
और छोड़ दें अपना वो-
कुछ अंतराल का  ...
जीवन सफर।

तुम सजदा करो -साथ में अपने हमसफ़र  ....
और
हम सज़दा करें ;साथ में --
अब जो है ;
मेरा हमसफ़र।

(गर्वित गौरव !)




Sunday, November 29, 2015

आत्मविश्लेषण नमो का!

आत्मविश्लेषण नमो का!

Mere Bhai! 

जय हिन्द!

नफरतों को कुछ दिनों के लिए तफ़रीह करने जाने दो...
मुझे अपने हाथों को -आजमाने दो!

देश तुम्हारा है...
तो मेरा भी रहेगा...
१९४७ की अलसाई भोर तुम्हारी थी...
तो आज २०१५ का सवेरा मेरा ही रहेगा!

तुमने चले मीलों फासले ; देश के लिये...
मैं कब झुठलाता हूँ
अरे चंद कदम...
अब मुझे भी...
देश हित में...
घिसटने दो!

थोड़ा मेरा भी तो
दम निकलने दो
मुझे भी तो कुछ करने दो!

वज़ूद मेरा भी शक के दायरे में है और
वज़ूद तेरा भी...

तू कर अपने पुश्तैनी वज़ूद के साथ सफर...
पर मेरे भाई!
मुझे अकेले ही सफर  करने दे!

अब हवाओं को रोकने से क्या होगा जब...
फ़िज़ाओं को बदलने की बयार बह निकली हो..

अब सूरज की रौशनी को क्यों रोकते हो...
जब आशा की किरण ; नव सम्वतसर की आस में निकल पड़ी हो....

फिर मैंने भी तो... मस्जिदों से निकलती अज़ान को कभी नहीं टोका... तो
तुम्हें फिर राम की आवाज़ क्यों चुभने लगी?

फिर मैं ठहरा नितांत विशुद्ध पर्वतारोही...
मेरा उद्देश्य -
कैलाश मानसरोवर की यात्रा करना था,
और परिणाम स्वरूप -उसे प्राप्य भी किया!

वही तुम -
मुझसे युवा!
उद्देश्य -विरासत की रक्षा
और परिणाम - पता नहीं!

क्यों करते हो मुझसे ईर्ष्या?
मेरा नाम लेने में चाहे जितना -"जी" लगाओ...
अंदर की असहिष्णुता परिलक्षित होती है -तुम्हारी निगाहों से...
नासिका के फूलने से... और
होठों के मिलने से!

कुछ ख़ास हासिल न कर पाओगे...
ऐसे निरुद्देश्य घूम कर...

जब कभी बड़े गौर से तुम्हें सुनता हूँ तो -
पूर्णतः अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं के -
"ब्रांड एम्बेसडर" तो नज़र आते हो...
परन्तु कहीं से भी -
इक शाश्वत सार्थक भारतीय नहीं!

अरे बदलो अपने आप को..
मन वचन और कर्मों से...

गंगा-जमुना-नर्मदा में पावनता ढूंढो...
तो विशाल हिमालय में -उसकी गरुता!
देखना... जिस दिन तुममें गरुता आ गई...
महानता स्वयं तुम्हें अपना लेगी और
उस दिन -तुम्हारी पार्टी..
अपनी खोई पगडण्डी खुद ढून्ढ लेगी!

मेरा क्या है?
न कोई आगे न पीछे...
इक बियाबान..
"रमता जोगी या बेहता पानी सा! "
न विरासत न सियासत..
न नफासत और न किसी से कोई शिकायत...
बस ; करता जा रहा हूँ वो सब जो उस शम्भू ने करने को दिया है!
तुम्हारा -
नमो!
(प्रकल्पित!)

Friday, November 20, 2015

गुमशुदा की अरज!

गुमशुदा की अरज!

आज भारतीय लोकतंत्र मिल गया मुझे...
पटना की सड़कों में...
थोड़ा घबराया सा.. सकुचाया सा...
शरमाया सा था...
बदहवास...
हर आने वाली बस से पूँछ रहा था की...
क्या ये बस दिल्ली जाती है?

मैंने भी उसकी पींठ को थपथपाकर पूंछा...
यहां कैसे???
इतना सुन कर बिलख कर लिपट गया मुझसे...
कहने लगा -
बचा लो मुझे...
ये लोग मुझे अपहृत कर के ले आये हैं... यहां...
कह रहे हैं -
अब पांच साल हम ही- तुम्हारे माई बाप हैं...
औकात से रहना...
वरना....

मैंने समझाया की -
घबराते क्यों हो?
तुम लोकतांत्रिक रूप से चुन कर आये हो...
सब कुछ तो तुम्हारा है!

लिपट कर चिपक गया...
पसीने और आसुओं से सराबोर हो कर रुंधे गले से बोला...
मैं बुरी तरह फंस गया हूँ...
सारे कौरव इकट्ठे हो गए हैं...
मुझसे खेलने के लिए...
मुझे नौंचने के लिए....

मैंने ढाढस बंधाया की -
अब तुम बिहार में हो..
ये धरती -
बुद्ध, महावीर, अशोक जैसे विवेक शील प्रतापियों की जननी है..
अब यही "लोग" तुम्हारे पालनहार हैं..
इनकी सेवा करना ही तुम्हारी करनी है..
तो बिचारा लोकतंत्र बोला..
तुम दिल्ली जा रहे हो...
बोल देना -"नमो! " से की निराश न हों...
कोशिश जारी रखें...
जितनी फिरौती मांगे..
दे दें..
पर देश हित में मुझे बचा लें..

न यहाँ कोई बुद्धा हैं..
न महावीर और अशोक..
और न समाजवाद के प्रणेता जयप्रकाश नारायण....
इक सन्नाटा पसरा है...
एक अँध्यारा है...
इक खौफ और धमकी है...

आज देश के सारे "क्षत्रप" ऐसे इकट्ठे हो चियर्स कर रहे थे... मानों
महाभारत के युद्ध में... पांडवों को मोम के या लाख के महल में जलने को छोड़ दिया हो और
कौरव ठहाके लगा रहे हों...
विश्व विजय और पांडवों  के अंत की! "

जैसे अभिमन्यु को रथ से गिरा कर...
कौरव ठहाके भरा अट्टाहास कर रहे थे.. वैसी ही -
मदांध हंसी....
मुझे आज सुनाई पड़ी है...

"नमो से मेरी इतनी सी पुकार बता देना की -
अपने बिहार को और अपने लोकतंत्र को भूल न जाएँ! "
"खंडहर में कुछ ही दिए हैं ; टूटे हुए से...
उन्हीं से काम चलायें...
इस दिवाली..
बहुत उदास थी -रात! "

(गर्वित गौरव!)

Thursday, November 19, 2015

Salute to You! Col.Santosh Mahadik!

पहली रात... बिन पापा!

"इन दुखी क्षणों में...
जब एक पांच साल के  बेटे ने...
अभी अभी - कुछ घंटों पहले... 
अपने वीर पिता (कर्नल संतोष महाडिक) को.... अपने मासूम कन्धों से... कांधा और अग्नि दी हो...
कैसे सो जाऊं -
निश्चिंत?

आज घटाटोप अँधेरी काली रात...
बहुत लम्बी होगी...
माँ -पुत्र और पुत्री के लिए...
जिनके पिता की चिता अभी शांत भी न हुई होगी..

क्या दर्द होगा...
उस पत्नी का.. जिसके
एक बाज़ू में -पुत्र होगा..
और एक में ;आसुओं से भीगी पुत्री..
वो खुद रोये या बच्चों को चुप कराये?

विकट ...
विराट... और
विलक्षण बलिदान!

कर्नल संतोष!
देश नतमस्तक है...
आपके जीवट पर..
आपके शौर्य पर... और
आपके उत्त्कृष्ट सर्वोच्च बलिदान पर...
कोटि कोटि प्रणाम! "
(गौरव!)

Monday, November 16, 2015

यात्रा! सात फेरों की... सात जन्मों तक!

यात्रा! सात फेरों की... सात जन्मों तक!

"लबों का थरथराना...
पलकों का झुक जाना...
लटों का उड़ जाना...
नयनों का बोलना और
कदमों के बहक जाने...
जैसी
चहलकदमियों से
बहुत दूर निकल आये हम..
हकीकत में -
साथ-साथ...
चलते चलते!

योवन से अधेड़ होती अनकही यात्रा के तीसरे पड़ाव में -
तुम अपनी सफ़ेद होती लटों के साथ...
माँ बन कर..
अपनी वफाओं को निभाती हुई.. और
मैं ;
पिता बन...
अपनी धुंधली होती नज़र के साथ..
आँखों के नीचे की... सिकुड़ती झुर्रियां देखता हुआ...
अपने तयशुदा कर्तव्यपथ पर...

बड़े होते बच्चों में -
अपने अक्स और नुक्स  खोजते खोजते...
धीरे-धीरे..
कहाँ से कहाँ तक..
निकल आये....
सात फेरों को निभाते हुए...
हम दोनों!

दर्द और दवा से दोस्ती करने की दस्तक भी...
धीरे से..
क़दमों की पदचाप ने दे ही दी है..
ब्लड प्रेशर और घुटनों के दर्द के रूप में...

एक मौन समझौते के तहत..
ज़िंदा रह कर..
बच्चों को स्थापित करने की ...
जिजीविषा के साथ..
हम दोनों चले जा रहे हैं... इक दुसरे का -
आत्मबल और सम्बल बन! "
(गर्वित गौरव!)

Thursday, November 12, 2015

राख!

राख!
"राकेट जो उड़े थे...
बम जो फ़टे थे...
फुलझड़ी जो चमकी थी..
सब राख हैं!

दिए जो रोशन थे..
मोमबत्ती जो जली थी..
सब राख हैं!

बस! ज़िन्दगी बदस्तूर चल रही है...
अपनी शाखों पर यथावत...अनवरत..
बिना बुझे...
बिना रुके...
बिना थके...
उस और...उस दिशा में.. जहाँ "दिया और बाती" गए हैं..
राख बनने! "

Tuesday, November 10, 2015

Happy Deepawali!

शुभ दीपमहोत्स्व!

"दिया" बन कर किया रोशन ज़िन्दगी को...
पर
अंतर्मन में छाया रहा -अंधियारा!

मोम बन कर किया उजियारा...
पर...
ज़िन्दगी में-पिघला लावा ; हाथ आया!

चाँद बन शीतलता से ज़िन्दगी को हंसाया
पर आखिर में...
गहरी काली वीरान रातों ने सारी ज़िन्दगी  भरमाया!

तुम कहती हो की बन जाऊं दीपक.... और
कर दूँ रोशन किसी की काया...
पर
अपने में मुझे दीखता है -जलते हुए कीट-पतंगे का ही हम साया!

तारे को भी देखा ऊपर आसमा पर इतराते...
सोचा! चलो तनिक इससे भी हैं -बतियाते...

पूछा उससे की -क्या करते हो तुम ;
दुनियां तकते तकते ?
उसने धीरे से बोला ...
हम जब जब जल कर गिरते...
तभी
किसी डूबते सपने का  सच पूरा करते!

खुद के लिए कभी जलने की मत सोच!
खुद को जला कर...
किसी और को रोशन करने की सोच!

कल किसी और ने भी जलाया था ;अपना सर्वस्व!
तुझे रोशन करने की उम्मीद से ;
झोंक दिया था उसने भी अपना पूरा वर्चस्व!

अरे!
सोचता क्या है???
अब तेरा मौका है..
देख! तू भी किसी का सवेरा है...
किसी की उम्मीद है...
किसी का बसेरा है...

बन कर ऊष्मा..
उड़ जा भांप बन..
झोंक दे अपना संपूर्ण वज़ूद और अंतर्मन...
ज़िन्दगी के "दिए" का
ताप बन...

सच! फिर देखना तू! बन कर किसी का उजियारा...
धीरे से चैतन्य हो जाएगा तेरे भीतर के अंतस का भी अँध्यारा!

जिसने इसको जान
लिया..
उसने -
"दिए और बाती" को पहचान लिया..
और
"जीवन सत्य" का रसपान किया! "

"शुभ दीपावली!"
"शुभ संकल्प!"
सदा आपके स्नेही -
[गौरव(शानू) -मधुमिता सब्यसांची व् यश्वी ]

Sunday, November 8, 2015

नन्द जीते... और चाणक्य हारा!

बिहार!
मुझे नहीं मालुम -
तुम जीते या हारे!

मन कहता है -
"वर्तमान" जीता और "भविष्य" पराजित हुआ!

"लालू" जीते परन्तु "लक्ष्य" पराजित हुए...

"नीतीश" जीते परन्तु "नियति" पराजित हुई...

नन्द वंश जीता और बिचारा चाणक्य...
इक बार फिर...
मौर्यों का साथ देकर
पराजित हुआ!

"एक बार जंगल के दस बारह सियारो ने झुंड बनाकर शिकार करने की योजना बनाई ओर शेर का शिकार कर लिया लेकिन इसका मतलव यह नही कि शेर को शेर कहना छोड दिया जाये! "

बिहार की जय हो!

Monday, November 2, 2015

Good Night Zindagi!

शुभ रात्रि!

"गुमसुम अँधेरी रातों में... चालीस पार की उम्र में...
सोते समय बेटे की लात आती है -सीने या पेट पर...
तो बरबस उंगलियां चली जातीं हैं...
उसके सर पर.. और पींठ पर...
थपकी देती हुई.. प्यार, दुलार और स्नेह से...
तो यकायक...
याद आ जाते हो आप...
मेरे बिछड़े प्यारे पापा!

जब आपका हाथ और कंधा...
मेरी तकिया हुआ करता था और -
आपके पेट पर मेरी टांगें पसार कर...
घूमतीं थीं -पूरी दुनिया और खो जाती थीं -ज़िन्दगी -
निंदिया रानी की गोद में!

कल आप पापा थे...
आज मैं -पापा
कल आप संसार थे और
आज -मैं
कल आप संस्कार थे..
आज मैं -संसार!

सामने आ जाता है -आपका अक्स और आकार...
आपकी छाया और प्यार...
पर फिर याद आता है -
अब आप हैं -बहुत दूर..
निराकार!