Tuesday, January 31, 2012

खजुराहो-चुनौती और यथार्थ!

खजुराहो! खजुराहो मे आयोजित पर्यटन से जुडी हुई 'इन्वेस्टर्स मीट' के दौरान जब प्रदेश के दिग्गज राजनीतिज्ञ एवं पर्यटन-विद-खजुराहो के इक पंच-सितारा होटल के प्रांगन मे  प्रदेश एवं खजुराहो में पर्यटन के बढ़ावे तथा समाज के निचले तबके तक इसका लाभ पहुचाने पर  चिंतन करेंगे तब इस नगर का आम आदमी अपनी रोज़-मर्रा की समस्याओं से जूझने मे परेशान होगा!पांच सितारा संस्कृति के होटलों मे विराजमान मध्य प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति विभागों के सरमाए-दारों एवं आला अफसरों तक इस बस्ती का  आम आदमी तथा आम 'बिज़नस-मेन' अपनी आवाज़ कैसे भेजे; इस जुगत मे रहेगा!ऐसी अनेक समस्याएं हैं जिनसे यहाँ का आम आदमी रोज सुबह से शाम तक संघर्ष करता है पर महंगी कारों के नीचे उसकी  आवाज पिस कर रह जाती है!इस आलेख की इतनी भूमिका बनाने के बाद जो समस्या सबसे ज्यादा मुखर रूप से उभरती है वह है -पश्चमी मंदिर समूह के चारों तरफ फ़ैली -'साइलेंट ज़ोन' की!मंदिरों का छरण रोकने के लिए इस समूह के सामने से निकली प्रमुख सड़क को पूरे दिन के लिए बंद कर दिया जाता है!रात को आम जनता जब अपने घोंसले में पहुँच जाती है तब नियम शिथिल कर के यह रास्ता खोल दिया जाता है कि खजुराहो के आम वाशिंदे को दिक्कत न हो!देखने की एवं काबिले-गौर बात यह होगी कि -'होटल ललित टेम्पिल' से आने-जाने के लिए जिला-प्रशासन पश्चमी मंदिरों के समूह के सामने  की सड़क से- मंदिरों के छरण की चिंता किए बिना मुख्य-अतिथि तथा देश के बड़े बिज़नस-मैनो को गुजरने देते है या फिर औपचारिक 'बाई-पास ' का उपयोग करते है?आप खजुराहो के नागरिकों को पर्यावरण एवं अनुशासन का पाठ पढ़ा कर उनकी जीने एवं सांस लेने की आज़ादी नहीं छीन सकते!पर्यटकों से पहले खजुराहो उन आम नागरिकों का है जो यहाँ बसते हैं!उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना प्रशासन का काम है और अतिथी को सौगात देने के लिए हम अपनी निजी ज़िन्दगी को आघात नहीं कर सकते!यह लोक-प्रशासन को ध्यान में रखना पड़ेगा!ऐसे अनेक अफसाने,मन्नत-मानौतिया,आरज़ू,आशाएँ इस मध्यकालीन गाँव की है जो मंदिरों-मस्जिदों तक तो जाती हैं पर प्रशासन के कानों तक शायद ही पहुँच पाती हों!अब समूचा खजुराहो सोच रहा है कि माननीय शिवराज जी का उड़नखटोला शायद कुछ ऐसी सौगात  दे जाए जिसकी हमे जरुरत तो है पर पुलिस और प्रोटोकॉल के चक्कर मे हम उनके मंच तक अपनी खंखारती आवाज़ नहीं पंहुचा पाते!श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी ,उमा श्री भारती,रामकृष्ण कुसमारिया एवं वर्तमान सांसद श्री जीतेन्द्र सिंह की राजनैतिक उड़ानों का प्रथम साक्षी बना यह खजुराहो आज भी अपनी कुछ लटकी हुई  योजनाओं का इंतज़ार कर रहा है जो इसके विकास मे अहम् किरदार अदा करेंगी!कुछ प्रमुख,सार्थक तथा जायज़ मांगे है:
  • नवीन पुरातत्व संग्रहालय का उदघाटन!
  • लटके यूथ हॉस्टल का कार्य पूरा करना! 
  • शताब्दी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों को शुरू करना! 
  • 'लपको' को पर्यटन की मुख्य धारा मे लाकर उन्हें 'पर्यटन मित्र' जैसे कार्ड जारी करना! 
  • एअरपोर्ट के रुके हुए कार्यो की गती तेज़ करना! 
  • ट्राफ्फिक पुलिस द्वारा 'चेक्किंग' के नाम से खजुराहो के चंदेला चौराहे के आस-पास 'एंट्री फी' के नाम से अवैध वसूली करने को रोकना! 
  • काले धन के निवेश के लिए खजुराहो सुरक्षित स्थान माना जा रहा है!ज़मीन की खरीद-फरोक्त के लिए खजुराहो काले धन के निवेशको का 'सोफ्ट-टार्गेट'बन रहा है!ऐसे प्रोत्साहन को रोकना!
  • खजुराहो-झाँसी एवं खजुराहो-सतना  के मध्य ए.सी वातान्कूलित 'एमपी टूरिस्म' की बसों का संचालन करना!
  • श्रम विभाग द्वारा होटलों में सख्ती करना एवं कर्मचारियों के शोषण को रोकना!
  •  खजुराहो में स्थापित टूर-ट्रवेल एजेंट्स को उचित मंच एवं सम्मान प्रदान करना एवं उन्हें 'हेंडलिंग एजेंट्स' नुमा कठपुतली नाम तथा तमगा न देकर उचित संबोधन देना!
  • मध्य प्रदेश पुलिस से हट के नवीन मध्य प्रदेश टूरिस्ट पुलिस संगठन की स्थापना के बारे में चिंतन करना!
शायद इस महत्व पूर्ण मेल-मिलाप का परिणाम कुछ ऐसा हो जाए जो आगे आने वाली पीढीयो के लिए इक वरदान से कम न हो! 

Sunday, January 22, 2012

वफ़ा की क़द्र!

वफ़ा की क़द्र!

"आँखों के भीतर समाई नमी की क़द्र,
झुकी पलकों मे समाई मौन स्वीकृति की क़द्र,
दिल के भीतर बसी वफ़ा की क़द्र, 
शिराओं में दौडती ईमानदार मुहब्बत की क़द्र,
मस्तक पे आती पसीने की बूंदों की क़द्र,
कांपते लबों पे समाई वफाओं की क़द्र,
नाजुक उंगलिओं की कंप-कपाहट की क़द्र, 
चेहरे पे आई शर्म की लाली की क़द्र,
बिरले ही महसूस कर समझ पाते है!" 

किसी की आँखों को देखना आसान है 
पर किसी की आँखों मै अपना प्रतिबिम्ब दिखना बड़ी बात है!

कोई भगवान से पूजा मे आपको मांगे-यह बड़ी बात नहीं है बल्कि 
कोई पूजा कर के ईश्वर की आरती आपके माथे पे लगा दे -यह बड़ी बात है!

शुक्र है की -हम दोनों ने समझा उस फलसफे को जिसका मै जिक्र कर रहा हूँ!
मुहब्बत पाना मुश्किल नहीं है बल्कि उसे वफादारी से निभाना मुश्किल है!















Sunday, January 15, 2012

जय जय बुंदेलखंड!

कभी तो वो दिन आयेगा  जब-
हमारा बुंदेलखंड इक प्रदेश होगा,
हमारी इक राजधानी होगी, 
हमारा इक बजट होगा, 
और हमारा इक मुख्यमंत्री भी  होगा!


हमारे नेता वापस अपने घर लौट आयेंगे!
-सत्यव्रत वापस छत्तरपुर की 'टौरिया हाउस' की  शोभा बनेंगे!
-उमाश्री वापस आयेंगी!
-नए चेहरे आगे आयेंगे!
-पुराने चेहरे अपना अनुभव बाटेंगे!


हमारा अपना बिजली उत्पादन सयंत्र होगा !
सीमेंट,लोह-अयस्क,हीरा एवं अन्य खनिज संसाधनों पे हमारा वाजिब हक होगा!
पर्यटन हमारा प्रमुख आय का स्रोत होगा!
रेलवे की पटरिया बुंदेलखंड की भाग्य-रेखा बन जायेंगी!
नदी और जल कि समस्या हम आपस मे सुलझा लेंगे!
शताब्दी ट्रेन एवं इंटर-नेशनल हवाई सेवाएँ रोज-मर्रा कि बात होगी!  


आओ सोचे कुछ नवीन!
कुछ नया और अलग !
कुछ सच्चा और जरूरी! 
कुछ आगे आने वाली अपनी पीड़ियो के लिए !


आओ हकीकत में-
पृथक नए बुंदेलखंड राज्य का स्वप्न को हकीकत में बदलने का प्रयास करें!
आओ आतंकवाद से मुक्त हिन्दुस्तान का इक विकसित राज्य बनाने का प्रयास करें!


जय जय बुंदेलखंड!
जय जय भारत भाग्य विधाता!



Thursday, January 12, 2012

Effort!

' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव  प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या  विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!वो दिन या पल दूर नहीं जब महारानी लक्ष्मी बाई ,वीर छत्रसाल की जन्म भूमि अपना विगत इतिहास पुनः प्राप्त करेगी और विकास की हवाएँ अपनी दिशाएँ बदल कर इस तरफ का रुख करेंगी और "जैजाक्भुक्ती"  का यह प्रदेश अपने स्वर्ण युग को फिर प्राप्त करेगा!
आइए अपने विचारों को साहस और निर्भीकता का बल देकर इस मंच की आवाज को बुलंद करें!
जिस तरीके से समूचे बुंदेलखंड को इक प्रयोगशाला बना दिया गया है और विकास का दीया दिखा के इसे कई हिस्सों में बाँटने की बात चल रही है हम उस पे भी चर्चा करेंगे!आईए हम इस पिछड़े अविकसित कुछ राज्यों के गढ़ को इक अनूठा प्रखर संवाद पृष्ठ प्रदान करें

Tuesday, January 10, 2012

बचपन का जोश.....



"बचपन का जोश....."


"बहुत गुरुर है तुझे-  ऐ सिरफिर तूफ़ान 
 मुझे भी  जिद्द है कि दरिया को पार करना है!" 





अम्मा आप चिंता मत करना ...

"अम्मा तुम्हारे जाने के इतने दिनों के बाद-
अब लगने लगी हूँ,
अपने ही  घर मे अजनबी मै!

सोचती हूँ कि-
कभी यह घर मेरा ही था,
या आज भी मेरा है?

कितना बदल जाता है घर लड़की के लिए
माँ के जाने के बाद!

वो कमरे जहाँ मै अपनी बहनों के साथ रहती थी
आज अजनबी हो गए हैं !


वोह आँगन जहाँ मै कभी शरारत करती थी-
जिद्द से आसमान उठा लेती थी-
और वो तुलसी-घरा जहाँ  धमा-चौकड़ी मचा कर सारा घर उठा लेती थी
आज ....
बहुत दूर चला गया है
तुम्हारे जाने के बाद!

अम्मा बहुत याद आती है तुम्हारी जब-
-तुम्हारी बेटी के -
सिर मै दर्द होता है,
मन घबराता है,
सुख-दुःख बांटना पड़ते हैं-
और....
जीवन के उतार-चड़ाव निराश करते है !

लगता है फिर वही पुराने दिन लौट आएँ-
जब संसार के सारे दुखों की दवा तुम थी.!


माता बम्बरबैनी से ओरछा के रामराजा सरकार तक-
छोटी भवानी से बड़ी भवानी तक -
पूजा वाली अटारी से अम्मा वाली अटारी तक-
इस अलमारी से उस अलमारी तक-
इस भगोने से उस कढ़ाई तक-
बड़ी गुड्डी से मंझली गुड्डी तक -
बड़े मुन्ना से बबलू तक -
और ....

इक छोटे से दुप्पट्टे से लेकर महंगे सलवार सूटों तक -
घर की चप्पलों से महंगी सेंडिलों तक -
और....

अपनी लक्का म़े-
लक्का कि बीमारी म़े-
लक्का के इलाज मे-
ईशु- ईशा के जन्म म़े-
हर कण कण म़े
अम्मा तुम्हारी यादें समाई हुई हैं !

बुड़की नजदीक आती है तो  तुम्हारे हाथ के मंगोड़े और दाल के बरे याद कर आँखों म़े आंसू आ जाते है!
बात तुम्हारे हाथ के साथ उस प्यार और अधिकार की है जो जब तक तुम थीं तो हम जताते थे!

हमारी पूज्य प्यारी  अम्मा!
आप के जाने के बाद हमने जाना
पीहर म़े माँ का क्या वजन होता है?
और माँ के रहते मायके से-
बेटी का रिश्ता कितना घना होता है!

अम्मा आप चिंता मत करना-
पूज्य बाबूजी की बाहें हम सब बहनों के लिए आज भी शाश्वत हैं!
उनका ढेर सारा प्यार आप दोनों की ढेर सारी घनी छाया का अहिसास आज भी कराता है!
बाबूजी ने आपके जाने के बाद
अपने आप को बदल लिया है!
अब वो आपके हिस्से का प्यार और दुलार भी  हमे देने लगे है!

अम्मा आप चिंता मत करना ...
अम्मा आप चिंता मत करना....
अम्मा आप चिंता मत करना...
हम सब ठीक है,सुखी है!"

                                                               
                                                                                                               






Friday, January 6, 2012

Happy New Year!

इस सर्द नई साल कि,
ठिठुरती सुबह मे,
जब मेरे बच्चे मुझसे-
'हैप्पी न्यू इयर' कर रहे थे;
मैंने भी-
दीवाल पे टंगी अपने स्वर्गीय माँ/पापा की तस्वीर को निहारा और
 मन ही मन  ऑंखें मूंद कर,
अपने उन बिछड़े हुए माँ/पापा को
नमन किया!

अपना स्वेटर तलाशते हुए बड़े बक्से मे-
हाथ लग गई वो पुरानी पापा की  शाल,
जो मेरे प्यारे पापा अक्सर मुझे उढा देते थे!

उसी बक्से मे मेरा वो क्रोशिए से बुना हुआ स्वेटर भी  मिला जो-
माँ ने कभी किसी जमाने मे....
अपने शानू के लिए बुना होगा!

मैने उन पेड़ो को भी निहारा....
जो पूज्य पापा ने बड़े जतन से सहेज कर बड़े किये थे  कि,
जब बच्चों पर  माँ/पापा की छाया नहीं होगी,
तब ये पेड़ बच्चों को-
छाया देंगे!
सच मे उस दिन नए साल मे,
जब मे पेड़ो के नीचे आया-
ऐसा लगा कि ....
जैसे माँ/पापा के आगोश मे
पहुँच गया हूँ!

दोस्तों! मेरे प्यारे दोस्तों !
आओ; इस नव वर्ष की हाड कंपाती सर्द रातों मे,
अपने माँ-पापा को सोते मे,उधड़ी रजाई फिर से उड़ाएं!
अपनी माँ को नया कार्डिगन लाकर दें,
पापा को एक प्यारा सा 'शाव्ल' लाकर दें,
और अपने हाथ से अदरक डाल के चाय बना के पिलाएं
बस.........
आओ समझे उस जीवन सत्य को-
कि माँ/पापा की छाया क्या होती है?
माँ/पापा का आशीर्वाद क्या होता है?