Wednesday, December 30, 2015

दस्तक! मन से मन तक!

मेरे हर बदलते वक़्त की तलहटी में... क्यों आ जाती हो तुम... इतने साल बाद भी...
यादों की बदली बन?

तुम्हें क्यों समझ नहीं आता.. की -
मैं तुम्हें भूल चुका हूँ...
डायरी के अंतिम पन्नों तक..

आज फिर नए साल की -
दहलीज पर...
"आर्चीज की गिफ्ट गैलरी" तक..
क्यों परेशान करने लगता है..
वो तुम्हारा...
बरसों पुराना अक्स...
जो बीस बरस में....
शायद इतना बदल गया होगा की -यकायक...
तुम्हें सामने देख...
पहचान भी न पाऊँ!

कुछ बाल तो पक कर सफ़ेद होने लगे होंगे न??

कभी कभी....
किसी शेर शायरियों में...
पुराने मुकेश के गानों में...
ज़िद्दी प्रेम कहानियों में...
और
"प्रेम एक कटु अनुभव है" जैसे जीवन दर्शन में -
बेसाख्ता...
हलकी हलकी सी....
बुझी बुझी सी...
राख राख सी...
आंसू आंसू सी...
मेरी याद तो...
आ ही जाती होगी ; न?

खैर नया साल दस्तक दे रहा था...
तो सोचा...
की पहली शुभकामना तुम्हें ही दूँ...
मुझे यकीन है की -
मेरे दिल से निकली बात..
तुझे छूती जरूर है!
Happy New Year-2016!

Wednesday, December 23, 2015

नमो की उड़ान!

उसकी उड़ानों को देख फड़फड़ाते हो...
उसके ख़्वाबों को देख झुंझलाते हो..
उसके भाषणों को सुन -सकपकाते हो...
अरे सुकुमार राजकुमार! कभी अपने भीतर झाँक कर देखो...
तुम्हारा हाल- "उस चूल्हे की तरह है... जिसमें लकड़ी न हो!"

Wednesday, December 2, 2015

दरिया ज़िन्दगी का!

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"अब जब उम्र के पत्ते...
ज़िन्दगी की शाख से -
गिर चुके हैं..
ज़िन्दगी की भट्टी में... पक चुके हैं...
अल्हड यौवन...
और बसंत से -
फिसल चुके हैं..
गृहस्थ को आजमा ही चुके हैं...
क्यों पूंछते हो -
सफर कैसा रहा?

��सफर -हसीं दिलकश
और खुशगवार था!

��शुरुआत में दृश्य बड़े सुहाने थे...
माँ पापा की लोरी थी... पींठ पर थपकी थी और नींद भरे तराने थे...
फिर
कुछ अंतराल थे -
वीराने थे ..
तप्ती मोहबत्तें थी...
तो कुछ डूबते फ़साने थे...
कुछ दूर...
धुंध भी मिली
तो कभी ठहराव भी!

��ज़िन्दगी की दोपहर भी मिली...
लपट के साथ धुल भरी आंधी थी तो
बीच बीच में -कभी कभी बिन मौसम बदरा भी बरस जाते थे..

��नदी आकर चलने लगी बगल से...
थाम लिया हाँथ...
पकड़ लिया दामन...
रिश्ता था -पावन..
संवर गया जीवन...
फिर
मैंने भी झोंक दिया अपना
तनमन....
क्यों की -यही तो था-
जीवन-हवन!

��बड़े होते उपवन के पौधों को भी संभाला तो...
अपनी ख्वाइशों के गले को भी तसल्ली दी!

��फिर आया चक्रवाती तूफ़ान...
गिर गया...
स्नेह और आशीर्वाद का वटवृक्ष...
रह गया अकेले...
मैं और मेरा संघर्ष...
मेरा खाली मैदान...
मेरा श्मशान!

��साँझ की बेला...
मिलीजुली...
कुछ रूखी रूखी बातें...
तो कुछ
सूखी सूखी  यादें...

रुक रुक कर अपनों के बिछड़ने का दुःख...
तो
अपने आप से बात करते करते...
ईश्वर से बात करने का सुख...
परन्तु -
हकीकत में -
सबकुछ -विमुख!
जीवन अनादि से -
सुख और -
अंत में दुःख!

सुख और दुःख...
गौ मुख...
विमुख...

वास्तव में -सफर ; बेहतरीन था! "
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(गर्वित गौरव!)