Thursday, October 29, 2015

मैंने प्यार किया!

मैंने प्यार किया!

कल मोहब्बतों का..
जलसा है...
चाँद की गवाही है ...
छत की मुंडेरों पर...
फिर -
इश्क़ की रहनुमाई है...

कुछ हकीकत की मेढ़ों पर...
मिलाएंगे नयन.. और
करेंगे दीदार अपनी सूरत
का...

तो कुछ मोहबत्तें...
चुपचाप अपने आंसू पौंछ  कर...
यादों के ढेरों पर...
तलाशेंगी अपना
चाँद!

तो -
कुछ बंदिशों के साथ...
बंद कंगूरों और चौखटों के दरख्तों पर...
रखेंगीं व्रत और
रहेंगी प्यासी..
अपने चाँद की सलामती की दुआ खातिर ...

वाकई!
कल चाँद को भी होगी जलन....
जब मोहब्बतों का आगाज़ उसकी ओर देख कर तो होगा..
पर लोग किसी और को चाँद कहेंगे..

कल माटी के करवे (घड़े) में...
सिमट जायेंगीं मोहबत्तें... अपनी वफाओं के साथ...

देखना!
कल " वहम " सहम कर दुबक जाएगा किसी कोनें में..... और
इश्क़ अंगड़ाई लेगा..
खुले आसमा में..
बेफिक्र.. बेखौफ...
अपनी पूरी शिद्दत से... सात फेरों के सात वचनों के साथ...
पर अपनी पूरी
शर्म,हया और तहज़ीबों के घूंघट में...

सच! क्या करिश्मा है ;
पंचतत्वों से बनी- मोहब्बत..
अपनी पाकीज़गी की इंतिहा में...
निहारती है -
आकाश की ओर-
चाँद को ढूँढ़ते हुए...
और थामती है ;
हाथों में मिटटी...
पृथ्वी की -करवा बन..

सच...
शब्द नहीं हैं...
उस इश्क़ को सलाम के खातिर..
जो प्यासे कंठ से...
आवाज़ देता है -
"मैंने प्यार किया! "

(गर्वित गौरव!)

माँ! मेरा स्वेटर कहाँ है?

माँ! बहुत दिनों से तुम्हारी याद नहीं आ रही थी...
जरा सी सर्दी ने क्या दस्तक दी...
तुम्हारी गर्म गोद और आँचल...
तुम्हारी उँगलियों से क्रोशिये से बुने हुए स्वेटर...
सिलबट्टे की पिसी  अमरुद की चटनी...
और
मेरे कानों को मफलर बांधती तुम्हारी झिड़की...
ने याद दिल दी...
तुम्हारी छाँव और तुम्हारे न होने का अहसास! "

Saturday, October 24, 2015

तलाश! लज्जा शर्म और हया की!

लज्जा- शर्म और हया की  खोज!

"लज्जा ढूढ़ने निकला था आज....
शर्म की भी तलाश थी...और 
हया को भी खोजता रहा मन...

बड़े बड़े माल्स में ढूंढ़ता रहा...
मैकडोनाल्ड्स से लेकर पित्ज़ा हट तक तलाशा...
पर ...
थके क़दमों से निराश हो लौटना पड़ा मुझे...
लज्जा की खोज में।

यूँ ही चलते चलते...
बुद्धा पार्क के साये तले...
झुरमुठ में...
कसमसाती सी...
लज्जा दिख गई...
पर वो भी...
बेहया बनने की कगार पर थी... तो..
मैं अपनी नज़र चुरा कर..
अपनी लज्जा बचा कर..
चला आया..
बुझा बुझा सा!

रिक्शा पर जरूर -
सलवार सूट में..
लज्जा दिख गई!
सच!
देखने में बहुत ही सुन्दर- सी थी -लज्जा!
सकुचाती, शर्माती और लजाती सी थी -लज्जा..
बार बार रिक्शा पे बैठी..
अपनी उड़ती चुन्नी सभाल रही थी...
तो कभी कंधे पे आलपिन से टंकी चुन्नी को छू कर...
तो कभी.. चुन्नी से ढंके आँचल को बार बार ढंकने  की घबराहट में..
चली जा रही थी -लज्जा!

तभी रास्ते में...
शर्म भी मिल गई है...

वो भी.. अपनी छोटी बहिन -लज्जा को -
तेज़ आवाज़ दे कर.. बुला रही थी..
शर्म भी...
साड़ी में लिपटी हुई...
सर से पल्लू तक.. ढंकी हुई... और
सिन्दूर -बिंदी से लेकर
बिछुए तक.. शर्म से दोहराती...हुई..
परेशान सी.. चली जा रही थी.. अकेले!

पर बहुत कोशिश की..
गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज़ करवाई...
पर
"हया" न मिल पाई...
मुझे सही सलामत..सौदाई....

हाँ!
जीन्स-टाप में...
कहीं कहीं..
धोखा जरूर हुआ..
की कहीं -
यह साठ के दशक की ....
देवानंद के समय वाली..
लज्जा की छोटी बहिन...
"हया" तो नहीं?
जो बचपन में -बम्बई चली गई थी... पढाई करने?

हिम्मत करी की -
रिश्ता निकालूँ -हया से..
याद दिलाऊं..
उसे -अपने पुराने रिश्ते..
जब...कभी कभी...
लज्जा और शर्म के साथ वो भी मिलने आया करती थी...
मेरे घर!

पर उसके मत्तंग शिखरों ने...
उन्नत तने फिकरों ने..
खुली बिखरी जुल्फों ने और
हिमाद्रि के भागीरथी बनने के जिक्रों ने...
रोक दिया मुझे..
हया से मुलाक़ात करने से.. और
चुप चुप रहा मैं...
दुनिया की और तमाम फ़िक्रों में!

दोस्तों!
यदि कभी...
कहीं...
किसी रोज़...
हिन्दुस्तानियत की सुगंध से आल्हादित..
चुनरी ओढ़े या अपना आँचल समेटे..
लज्जा -शर्म और हया मिल जाएँ...
तो प्लीज उन्हें...
तिरंगा थमा देना! "
(गर्वित गौरव!)

Friday, October 23, 2015

हे राम! क्या मैं ; रावण से दोस्ती कर लूँ?

"हे राम!
कैसे मारूं अपने अंदर के रावण को... जब

देखता हूँ -की
राम तो क़ैद हैं ; चाहरदीवारी में... और
भुगत रहे हैं...
अनचाहा कारावास...
वहीँ -
रावण जी रहे हैं -उन्मुक्त, बेपरवाह और बेखौफ... ज़िन्दगी...
निर्लज्झता के साथ...
वो भी दम से -
और हैं -विराजमान...
तख्तेताऊस पर...
बिलकुल वैसे
जैसे तुम भी कभी बैठते थे..
अयोध्या के राजदरबार में.... राजन  बन!

इस युग में...
कितनी सार्थक रह गई है -राम भक्ति???

हर बार..
क्यों जीत जाता है -रावण?
और
हार जाते हैं -राम?

क्यों डर लगने लगा है -
राम शब्द के उच्चारण में?

कहीं दो समुदायों की शांति भग न हो जाए..
'राम' शब्द से... और
लगाना पड़े...
कचहरियों के चक्कर..
जमानत की खातिर!

हे राम!
बहुत डर लगता है ;तुम्हें पुकारते हुए अब...
तुम्हारे ही देश में..

रावण! बलात् ; पर बाइज़्ज़त बरी?
रावण! दंगाई ; पर बरी?
रावण! भ्रष्टाचारी ; पर बरी?
रावण! हिंसक ; पर बरी?
और राम!
मेरे राम!
तुम कौन हो और किस अपराध में..
इतने सालों से..
हो अंदर..
और कब तक होगी..
तुम्हारी जमानत?

सब कहते हैं -की
यदि मैं रावण बन जाऊं या...
दोस्ती कर लूँ..
रावण, शूर्पणखा या मेघनाद से...
तो बाहर आ जाओगे तुम
अपने कारावास से..

तुमने विभीषण से मित्रता की थी

उस समय वही उचित था.... 

तो फिर... 

मैं आज! रावण से मित्रता करता हूँ... 

इस समय ;यही उचित है! 


हे राम!
क्या मैं रावण बन जाऊं?
तुम्हारी खातिर?
तुम्हें न्याय दिलवाने की खातिर?
बोलो राम! "

(गर्वित गौरव! )


Sunday, October 18, 2015

ओ रे मनवा! ये बता- देश बड़ा या पुरूस्कार?

मेरे कलमकार!
किसको नीचा दिखा रहे हो...
अपना यह सम्मान लौटा कर???

उन विचारों को जो तुम्हारे गर्भ में पनपे और शब्दों के रूप में जन्में?

या उस घिसी कलम और उसकी सियाही को -जिसने ताउम्र चल कर.. वो भी बिना थके या अटके... यह मंज़िल पाई?

या उस DNA को जिसने चिरंतन....
नश्वर हो कर....
पीढ़ी दर पीढ़ी....
विचारों की श्रृंखला को आगे बढ़ाया... और प्रतिफल स्वरुप पुरूस्कार के मंच तक तुमको पहुंचाया?

या उस तिरंगे को...
जिसकी छाया तले....
तुम पुष्पित और पल्लवित हुए?

या उस देश को...
जिसने "तुम्हें" -इक साधारण 'तुम' से -'आप' बनाया?

या इक पार्टी-सत्ता और शक्ति को?
जिसके पास आज देश की कमान है?

ओह रे कलम के धनी...
मेरे कलमकार!
'आप' यह तो बताओ की -
'पार्टी' को नीचा दिखाने के लिए...
'देश' को नीचा दिखा कर... उसकी राज्यमुद्रा से अंकित सम्मान लौटा दोगे?

क्या यह कोई 'सामान' था; जो पसंद नहीं आया तो 'डीलर' को लौटा दिया?

अच्छा रहा की 'आपको' मरणोपरांत यह सम्मान नहीं दिया...
वरना...
अभी तो सरकार पर गुज़र रही है...
उधर... चित्रगुप्त और यमराज पर क्या गुज़रती... जब 'आप' 'समय' को आवेदन देते -की मुझे -'भारत' वापस जाना है ;पुरूस्कार लौटाने!

अरे 'आपने' तो...
अपने विचारों से क्रान्ति लाई है...
देश को नवीन राह दिखाई है...
पर
अब कौन सा मार्ग प्रशस्त करने की- यह अगन जलाई है- मेरे विचारक?

जो देश हित में -
शहीद हो गएँ हैं...
वे भी मन करे तो -
परमवीर चक्र, महावीर चक्र, अशोक चक्र या वीर चक्र लौटा दें?

जरा सोचो... अगर 'आपकी' बनाई 'लीक' पर 'परम्परा' चल निकली...
तो अपमान -किसका होगा?
'देश' का या 'पार्टी' का?

अब हम 'आपको' क्या आईना दिखाएँ -
बस इतना समझ लीजिये -की -
यदि कुछ ज्यादा ही उथल पुथल का मन.... कर रहा हो तो -
गौतम बुद्ध की तरह....
सन्यास की ओर जाएँ...
"लाइब्रेरी और स्टडी रूम"
से मुक्ति पाएं...
जंगल में मंगल मनाएं... और फिर वहीँ नव ऋचाएं सृजित कर...
देश जो सद्द-मार्ग दिखाएँ!

धोखे में न रहना की -
ये मान सम्मान लौटाना
कोई गांधीगिरी है...

दुनिया देख रही है -की
यह विशुद्ध नेतागीरी है ;
जहाँ चापलूसी और षड़यंत्र...
आपस में नए उपन्यास का सृजन कर रहे हैं!

अरे कलम के खेवईयों!
क्यों दे रहे हो उनका साथ...
जिन्हें -
आज़ादी, भारतीयता या
कलम और तलवार पर..
मात्र ५०० सौ शब्दों का हिंदी में निबंध लिखना भी नहीं आता?

जो खुद मंच पर कागज़ को चिंदी में फाड़ कर....
उसकी 'औकात' जगजाहिर कर चुके हैं?

जिन्होंने कभी 'आपकी' कलम को -अपने कुर्ते, शर्ट या सदरी की जेब में जगह तक नहीं दी?
और आप!
नेपथ्य में उनका साथ दे
रहे हैं? क्यों?

याद रखना...
कलम- छोटे कद की...  स्याही से आच्छादित... विचारों की वह-
श्रृंखलाबद्ध समायोजन है;
जो संपूर्ण मानवता को
अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है...

अतः "कलम" को राजनैतिक विद्रूपताओं के तले.....
किसी राजनैतिक पार्टी की मरणासन्न-रुग्णावस्था में ;
बुढ़ापे की-
"लाठी या बैसाखी"
न बना देना!
वर्ना...
यही काले अक्षर...
तुम्हें निसंकोच अनावृत कर...
इतिहास में -काली स्याही से
नग्न स्वरुप में...
दर्ज कर देंगे!
(गर्वित गौरव!)

Thursday, October 15, 2015

मायूसी और चाँद!

मायूसी और चाँद!

"मायूसियों के बीच
फिर से....
ज़िन्दगी तलाशनी होगी...
चाँद को भी-अब ज़मी में-ठंडक तलाशनी होगी... "

मैंने अक्सर...
मायूसी को भी जमीदोज हो जाते देखा है...
प्रेम आशा और ख़्वाबों की दस्तक भर से...

"वक़्त के हाथों..
किसी के लिए-
टूटता तारा -
आसमान पे -
निर्बाध जीवन चक्र से मुक्ति है...
तो -किसी के लिए -
नव अंकुरण.. और
नव आगमन.. "

"खैर -यही है जीवन की दुश्वारियां...
कहीं बहुत दूर निकल जाने की तैयारियां! "

ओह मेरे ख्वाज़ा! 
बस-इतनी गर्मी दे की -ज़िन्दगी में -
मोहब्बत सुलगती रहे और..
इतनी ठंडक दे ; की
"ख्वाब" ठिठुर कर भी...
अमीन बोलते रहें!
(गौरव!)

Tuesday, October 13, 2015

बिहार समर! आहट वक़्त की!

बिहार समर!
वक़्त की तस्दीक़!

"मैं देख रहा हूँ ;तुझे पराजित होते...
पर तुझे जिताना भी नहीं है...

देख रहा हूँ ;तुझे डूबते हुए... पर तुझे बचाना भी नहीं है...

देख रहा हूँ ;तुझे गिरते हुए... पर तुझे उठाना भी नहीं है...

अगर इस बार... तू जीत गया तो...
तो उठ जाएगा भरोसा ज़िन्दगी का-"वक़्त की शह से! "

"इस कारण! हे राजन!
भांप ले अपनी परछाईं...
आने वाली तन्हाई...
और
क्षितिज से भोर की  उठने वाली शहनाई...
अब -
सिर्फ सत्ता से जुदाई! "

Saturday, October 10, 2015

मधुशाला के दो पात्र!

कुछ 'शब्द' उस अनकही अनसुलझी जोड़ी के नाम  जो भारतीय सिनेजगत  की Mystery बन गई और युगों युगों तक बनी रहेगी! उनका नाम न लेना ही मर्यादित होगा!
वाह रे खुदा! 
"क्या नुमाइश रची है ;मेरी मोहब्बत की! 
उनका दुनिया में आना -११ अक्टूबर को... 
और मेरा-१० अक्टूबर को! 
वो फिल्मों में और मैं भी! 
पर... 
कभी कभी.. 
सिलसिले... 
अधूरे रह जाते हैं... 
ज़िन्दगी भर सुलगने के लिए! "

"आज 'उनका' जन्मदिन है... कल 'मेरा'..था..
कल तक 'वो' 'मुझे' प्यार करते थे...
और 'मैं'; आज भी...
समंदर में नमक है या नमक में समंदर ; कुछ पता नहीं...
गहराई 'मेरे' प्यार में है या 'उनके' ; कुछ अहसास नहीं...
इक दुसरे के बिना -
ज़िन्दगी 'उन्होंने' काटी या 'मैंने' गुज़ारी .. कुछ पता नहीं..
गहराई 'उनके' अंदर ज्यादा थी या 'मेरे' ;कुछ पता नहीं..
बस..
कहानी का तबस्सुर यह है की -
'मैं' 'उनकी' नहीं और 'वो' 'मेरे' नहीं! "
शुभ जन्मदिवस!

Thursday, October 8, 2015

मैं दंग हूँ ; इन दंगों से!

��मैं दंग हूँ; इन दंगों से...
भारत की थाप और मृदंगों से...
खून से सने इन रंगों से...
मैं दंग हूँ ;इन दंगों से!

��इन हलाकान शिकंजों से..
रोज़ रोज़ के पगों से...
कुश्ती करते लफंगों से...
मैं दंग हूँ ;इन दंगों से!

��नफरत के इन छंदों से...
इज़्ज़तदार भिखमंगों से..
मुँहज़ुबानी करते नंगों से..
मैं दंग हूँ ; इन दंगों से

��कपड़े उजले पहने हैं ;पर दीखते बिलकुल नंगे हैं..
उम्र बुढ़ापे की आई...
पर बने हुए ये चंगे हैं..
उफ़..
मैं दंग हूँ इन दंगों से...
इन शौक़ीन पतंगों से!

��सच..
बहुत हैरान हूँ... उनसे
जो ढूँढ़ते हैं -जायका.. गाय का....
क्या उन्हें नहीं मालुम...
क्या होता है -पीहर और मायका!

वाकई !
मैं बहुत दंग हूँ ;इन दंगों से...
ओह! इन खुनी शिकंजों से...

��मंदिर मस्जिदों की मुंडेरों  पर बैठे -खामोश परिंदों से..
सीमा पर प्राण न्योछावर करते -वफादार जय हिंदो से..
और....
विजयी अट्टहास करते गद्दार जयचंदों से...

सच मैं बहुत दंग हूँ ;जीवन के इन दागी रंगों से...
इन नापाक जंगों से...

��मुझे ये यकीन है...
इस पूरी कहानी का कारण-
बिहार का नमकीन है..
जिनकी खिसक रही जमीन है-
जिनके हाथों में सपेरों की बीन है...
वही ;
बना रहे यह 'क्राइम सीन' है...
सच में ; मैं दंग हूँ इन दंगों से इन नकाबपोश दरिंदों  से....

��अरे दंगों के सौदागर!

उम्र की रात आने को है...
फिर विदाई की बरात भी तो जाने को है...
पूरी ज़िन्दगी इक लोटे में सिमट कर...
अस्थियों के रूप में...
माँ गंगा में ही मिल जाने को है.. ; तो -
फिर!
क्यों करते हो यह हठ! खाली कर दो अपने ये राजनैतिक मठ!
और लगा लो सिर्फ एक ही   रट की...
हे भगवन शंकर !
बुलालो हमें अपने घट  और खोल दो अपने पट!
(गर्वित गौरव!) ����������

Thursday, October 1, 2015

गांधी और पेटेंट!

गांधी और पेटेंट!

काश "गांधी' का पेटेंट भारत सरकार के पास होता....

कम से कम... कोई क्षद्म 'गांधी' मेरे -राष्ट्रपिता गांधी के नाम की चादर तो न ओढ़ पाता!

बापू कहने पर -अक्स तुम्हारा उभरता है.. जेहन में...
पर
गांधी कहने से एक लम्बी फ़ौज़ दिखने लगती है -गांधियों की ; और जेहन से आवाज़ आती है -
कोन सा गांधी?

सच बापू!
लाठी में तुम...
चरखे में तुम...
खादी में तुम...
ऐनक में तुम...
नंगे बदन और धोती में तुम.....
आज भी नज़र आते हो...
पर
'गांधी' कहने पर नहीं!

स्वावलंबन में तुम...
एकला चलो में तुम...
सत्य वचन में तुम...
जुलूस में तुम...
मौन में तुम...
शोक में तुम...
पर -
'गांधी' में मुझे 'तुम' नज़र नहीं आते!

काश! भारत की राजनैतिक भाग्यरेखा के 'आप'  प्रथम और अंतिम "गांधी" होते!

धीरे धीरे मिटती जा रहीं हैं तुम्हारी यादें...
बहुत दिनों से -किसी  परीक्षा में भी नहीं पुछा गया की -"My Experiment with Truth!" पुस्तक किसने लिखी?

अब तो पुलिस वाले भी कभी कभी कहने लगे हैं की -"डाल दो साले को अंदर... साला गांधी बनने चला था! "

खादी भी अब अमीरों की -"इलीट" क्लास की फसल हो गई है...

आपकी खादी को -"ब्रांडेड" रूप दे दिया गया है.... और
ऐसा लगता है -की -जैसे आप बहुत ही शौक़ीन किस्म के आला दर्ज़े के फैशन परस्त इंसान थे.... जिसने खादी जैसे उम्दा किस्म के महंगे कपडे पहने...
सच अब आपकी खादी अमीरों का चलन बन चुकी है और सामान्य लोगों का ख्वाब!

"काश! तुम बापू ही रहते गांधी नहीं! "
Happy Birthday Baapu!

(गौरव!)