लज्जा- शर्म और हया की खोज!
"लज्जा ढूढ़ने निकला था आज....
शर्म की भी तलाश थी...और
हया को भी खोजता रहा मन...
बड़े बड़े माल्स में ढूंढ़ता रहा...
मैकडोनाल्ड्स से लेकर पित्ज़ा हट तक तलाशा...
पर ...
थके क़दमों से निराश हो लौटना पड़ा मुझे...
लज्जा की खोज में।
यूँ ही चलते चलते...
बुद्धा पार्क के साये तले...
झुरमुठ में...
कसमसाती सी...
लज्जा दिख गई...
पर वो भी...
बेहया बनने की कगार पर थी... तो..
मैं अपनी नज़र चुरा कर..
अपनी लज्जा बचा कर..
चला आया..
बुझा बुझा सा!
रिक्शा पर जरूर -
सलवार सूट में..
लज्जा दिख गई!
सच!
देखने में बहुत ही सुन्दर- सी थी -लज्जा!
सकुचाती, शर्माती और लजाती सी थी -लज्जा..
बार बार रिक्शा पे बैठी..
अपनी उड़ती चुन्नी सभाल रही थी...
तो कभी कंधे पे आलपिन से टंकी चुन्नी को छू कर...
तो कभी.. चुन्नी से ढंके आँचल को बार बार ढंकने की घबराहट में..
चली जा रही थी -लज्जा!
तभी रास्ते में...
शर्म भी मिल गई है...
वो भी.. अपनी छोटी बहिन -लज्जा को -
तेज़ आवाज़ दे कर.. बुला रही थी..
शर्म भी...
साड़ी में लिपटी हुई...
सर से पल्लू तक.. ढंकी हुई... और
सिन्दूर -बिंदी से लेकर
बिछुए तक.. शर्म से दोहराती...हुई..
परेशान सी.. चली जा रही थी.. अकेले!
पर बहुत कोशिश की..
गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज़ करवाई...
पर
"हया" न मिल पाई...
मुझे सही सलामत..सौदाई....
हाँ!
जीन्स-टाप में...
कहीं कहीं..
धोखा जरूर हुआ..
की कहीं -
यह साठ के दशक की ....
देवानंद के समय वाली..
लज्जा की छोटी बहिन...
"हया" तो नहीं?
जो बचपन में -बम्बई चली गई थी... पढाई करने?
हिम्मत करी की -
रिश्ता निकालूँ -हया से..
याद दिलाऊं..
उसे -अपने पुराने रिश्ते..
जब...कभी कभी...
लज्जा और शर्म के साथ वो भी मिलने आया करती थी...
मेरे घर!
पर उसके मत्तंग शिखरों ने...
उन्नत तने फिकरों ने..
खुली बिखरी जुल्फों ने और
हिमाद्रि के भागीरथी बनने के जिक्रों ने...
रोक दिया मुझे..
हया से मुलाक़ात करने से.. और
चुप चुप रहा मैं...
दुनिया की और तमाम फ़िक्रों में!
दोस्तों!
यदि कभी...
कहीं...
किसी रोज़...
हिन्दुस्तानियत की सुगंध से आल्हादित..
चुनरी ओढ़े या अपना आँचल समेटे..
लज्जा -शर्म और हया मिल जाएँ...
तो प्लीज उन्हें...
तिरंगा थमा देना! "
(गर्वित गौरव!)
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