मैं दंग हूँ; इन दंगों से...
भारत की थाप और मृदंगों से...
खून से सने इन रंगों से...
मैं दंग हूँ ;इन दंगों से!
इन हलाकान शिकंजों से..
रोज़ रोज़ के पगों से...
कुश्ती करते लफंगों से...
मैं दंग हूँ ;इन दंगों से!
नफरत के इन छंदों से...
इज़्ज़तदार भिखमंगों से..
मुँहज़ुबानी करते नंगों से..
मैं दंग हूँ ; इन दंगों से
कपड़े उजले पहने हैं ;पर दीखते बिलकुल नंगे हैं..
उम्र बुढ़ापे की आई...
पर बने हुए ये चंगे हैं..
उफ़..
मैं दंग हूँ इन दंगों से...
इन शौक़ीन पतंगों से!
सच..
बहुत हैरान हूँ... उनसे
जो ढूँढ़ते हैं -जायका.. गाय का....
क्या उन्हें नहीं मालुम...
क्या होता है -पीहर और मायका!
वाकई !
मैं बहुत दंग हूँ ;इन दंगों से...
ओह! इन खुनी शिकंजों से...
मंदिर मस्जिदों की मुंडेरों पर बैठे -खामोश परिंदों से..
सीमा पर प्राण न्योछावर करते -वफादार जय हिंदो से..
और....
विजयी अट्टहास करते गद्दार जयचंदों से...
सच मैं बहुत दंग हूँ ;जीवन के इन दागी रंगों से...
इन नापाक जंगों से...
मुझे ये यकीन है...
इस पूरी कहानी का कारण-
बिहार का नमकीन है..
जिनकी खिसक रही जमीन है-
जिनके हाथों में सपेरों की बीन है...
वही ;
बना रहे यह 'क्राइम सीन' है...
सच में ; मैं दंग हूँ इन दंगों से इन नकाबपोश दरिंदों से....
अरे दंगों के सौदागर!
उम्र की रात आने को है...
फिर विदाई की बरात भी तो जाने को है...
पूरी ज़िन्दगी इक लोटे में सिमट कर...
अस्थियों के रूप में...
माँ गंगा में ही मिल जाने को है.. ; तो -
फिर!
क्यों करते हो यह हठ! खाली कर दो अपने ये राजनैतिक मठ!
और लगा लो सिर्फ एक ही रट की...
हे भगवन शंकर !
बुलालो हमें अपने घट और खोल दो अपने पट!
(गर्वित गौरव!)
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