Thursday, October 15, 2015

मायूसी और चाँद!

मायूसी और चाँद!

"मायूसियों के बीच
फिर से....
ज़िन्दगी तलाशनी होगी...
चाँद को भी-अब ज़मी में-ठंडक तलाशनी होगी... "

मैंने अक्सर...
मायूसी को भी जमीदोज हो जाते देखा है...
प्रेम आशा और ख़्वाबों की दस्तक भर से...

"वक़्त के हाथों..
किसी के लिए-
टूटता तारा -
आसमान पे -
निर्बाध जीवन चक्र से मुक्ति है...
तो -किसी के लिए -
नव अंकुरण.. और
नव आगमन.. "

"खैर -यही है जीवन की दुश्वारियां...
कहीं बहुत दूर निकल जाने की तैयारियां! "

ओह मेरे ख्वाज़ा! 
बस-इतनी गर्मी दे की -ज़िन्दगी में -
मोहब्बत सुलगती रहे और..
इतनी ठंडक दे ; की
"ख्वाब" ठिठुर कर भी...
अमीन बोलते रहें!
(गौरव!)

No comments:

Post a Comment