Thursday, October 29, 2015

माँ! मेरा स्वेटर कहाँ है?

माँ! बहुत दिनों से तुम्हारी याद नहीं आ रही थी...
जरा सी सर्दी ने क्या दस्तक दी...
तुम्हारी गर्म गोद और आँचल...
तुम्हारी उँगलियों से क्रोशिये से बुने हुए स्वेटर...
सिलबट्टे की पिसी  अमरुद की चटनी...
और
मेरे कानों को मफलर बांधती तुम्हारी झिड़की...
ने याद दिल दी...
तुम्हारी छाँव और तुम्हारे न होने का अहसास! "

No comments:

Post a Comment