माँ! बहुत दिनों से तुम्हारी याद नहीं आ रही थी...
जरा सी सर्दी ने क्या दस्तक दी...
तुम्हारी गर्म गोद और आँचल...
तुम्हारी उँगलियों से क्रोशिये से बुने हुए स्वेटर...
सिलबट्टे की पिसी अमरुद की चटनी...
और
मेरे कानों को मफलर बांधती तुम्हारी झिड़की...
ने याद दिल दी...
तुम्हारी छाँव और तुम्हारे न होने का अहसास! "
'बुन्देली धमाका!'(गर्जना स्वाभिमान और आत्मबल की!) BUNDELI DHAMAKA...' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!
Thursday, October 29, 2015
माँ! मेरा स्वेटर कहाँ है?
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