मेरे कलमकार!
किसको नीचा दिखा रहे हो...
अपना यह सम्मान लौटा कर???
उन विचारों को जो तुम्हारे गर्भ में पनपे और शब्दों के रूप में जन्में?
या उस घिसी कलम और उसकी सियाही को -जिसने ताउम्र चल कर.. वो भी बिना थके या अटके... यह मंज़िल पाई?
या उस DNA को जिसने चिरंतन....
नश्वर हो कर....
पीढ़ी दर पीढ़ी....
विचारों की श्रृंखला को आगे बढ़ाया... और प्रतिफल स्वरुप पुरूस्कार के मंच तक तुमको पहुंचाया?
या उस तिरंगे को...
जिसकी छाया तले....
तुम पुष्पित और पल्लवित हुए?
या उस देश को...
जिसने "तुम्हें" -इक साधारण 'तुम' से -'आप' बनाया?
या इक पार्टी-सत्ता और शक्ति को?
जिसके पास आज देश की कमान है?
ओह रे कलम के धनी...
मेरे कलमकार!
'आप' यह तो बताओ की -
'पार्टी' को नीचा दिखाने के लिए...
'देश' को नीचा दिखा कर... उसकी राज्यमुद्रा से अंकित सम्मान लौटा दोगे?
क्या यह कोई 'सामान' था; जो पसंद नहीं आया तो 'डीलर' को लौटा दिया?
अच्छा रहा की 'आपको' मरणोपरांत यह सम्मान नहीं दिया...
वरना...
अभी तो सरकार पर गुज़र रही है...
उधर... चित्रगुप्त और यमराज पर क्या गुज़रती... जब 'आप' 'समय' को आवेदन देते -की मुझे -'भारत' वापस जाना है ;पुरूस्कार लौटाने!
अरे 'आपने' तो...
अपने विचारों से क्रान्ति लाई है...
देश को नवीन राह दिखाई है...
पर
अब कौन सा मार्ग प्रशस्त करने की- यह अगन जलाई है- मेरे विचारक?
जो देश हित में -
शहीद हो गएँ हैं...
वे भी मन करे तो -
परमवीर चक्र, महावीर चक्र, अशोक चक्र या वीर चक्र लौटा दें?
जरा सोचो... अगर 'आपकी' बनाई 'लीक' पर 'परम्परा' चल निकली...
तो अपमान -किसका होगा?
'देश' का या 'पार्टी' का?
अब हम 'आपको' क्या आईना दिखाएँ -
बस इतना समझ लीजिये -की -
यदि कुछ ज्यादा ही उथल पुथल का मन.... कर रहा हो तो -
गौतम बुद्ध की तरह....
सन्यास की ओर जाएँ...
"लाइब्रेरी और स्टडी रूम"
से मुक्ति पाएं...
जंगल में मंगल मनाएं... और फिर वहीँ नव ऋचाएं सृजित कर...
देश जो सद्द-मार्ग दिखाएँ!
धोखे में न रहना की -
ये मान सम्मान लौटाना
कोई गांधीगिरी है...
दुनिया देख रही है -की
यह विशुद्ध नेतागीरी है ;
जहाँ चापलूसी और षड़यंत्र...
आपस में नए उपन्यास का सृजन कर रहे हैं!
अरे कलम के खेवईयों!
क्यों दे रहे हो उनका साथ...
जिन्हें -
आज़ादी, भारतीयता या
कलम और तलवार पर..
मात्र ५०० सौ शब्दों का हिंदी में निबंध लिखना भी नहीं आता?
जो खुद मंच पर कागज़ को चिंदी में फाड़ कर....
उसकी 'औकात' जगजाहिर कर चुके हैं?
जिन्होंने कभी 'आपकी' कलम को -अपने कुर्ते, शर्ट या सदरी की जेब में जगह तक नहीं दी?
और आप!
नेपथ्य में उनका साथ दे
रहे हैं? क्यों?
याद रखना...
कलम- छोटे कद की... स्याही से आच्छादित... विचारों की वह-
श्रृंखलाबद्ध समायोजन है;
जो संपूर्ण मानवता को
अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है...
अतः "कलम" को राजनैतिक विद्रूपताओं के तले.....
किसी राजनैतिक पार्टी की मरणासन्न-रुग्णावस्था में ;
बुढ़ापे की-
"लाठी या बैसाखी"
न बना देना!
वर्ना...
यही काले अक्षर...
तुम्हें निसंकोच अनावृत कर...
इतिहास में -काली स्याही से
नग्न स्वरुप में...
दर्ज कर देंगे!
(गर्वित गौरव!)
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