बिहार समर!
वक़्त की तस्दीक़!
"मैं देख रहा हूँ ;तुझे पराजित होते...
पर तुझे जिताना भी नहीं है...
देख रहा हूँ ;तुझे डूबते हुए... पर तुझे बचाना भी नहीं है...
देख रहा हूँ ;तुझे गिरते हुए... पर तुझे उठाना भी नहीं है...
अगर इस बार... तू जीत गया तो...
तो उठ जाएगा भरोसा ज़िन्दगी का-"वक़्त की शह से! "
"इस कारण! हे राजन!
भांप ले अपनी परछाईं...
आने वाली तन्हाई...
और
क्षितिज से भोर की उठने वाली शहनाई...
अब -
सिर्फ सत्ता से जुदाई! "
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