Wednesday, November 30, 2016

काल और काले धन से जूंझता इंसा !

आदरणीय पीएम सर !

इस नोटबन्दी के दौर में-
मेरे पास ..
अपने स्वर्गवासी पिता के ..
पुराने सन्दूक से निकले ..
कुछ दस्तावेज और
धरोहरें मिलीं हैं !

कृपया पथप्रदर्शित करें कि-
मैं अपनी यह धरोहरें ...
कहाँ जमा करूँ ?
इस पर कोई बन्दिश तो नहीं है ; न ?

कुछ टूटे हुए चश्में की डंडियाँ  ....
कुछ उधड़े हुए जूतों की निशानियां ...
एक पुराना बेंत ..
बहुत पुरानी ...
सर्दियों में पहनने वाली बंडी और -
कुछ मनीऑर्डर की रसीदें ...
मेरे पिताजी के सन्दूक से-
आज मुझे मिलीं हैं !

कहीं यह काला धन तो नहीं ?

मेरी ...
स्वर्गवासी माँ के हाथों ...
मेरे जन्म से पहले ..
मेरे लिए बुना गया ..
क्रोशिये का स्वेटर और
धूप में ..
मेरी मालिश के लिए ..
पुराने डबल बेड के ..
चादरों को जोड़ कर ..
बनाई गई ..
मेरी दरी ही ..
मेरे गुप्त खजाने की ..
अमानतें हैं !
जिन्हें मैंने ...
किसी भी बैंक में ..
घोषित नहीं किया है !
क्यों कि -
ये मेरी छुपी दौलत हैं ...
जिनमें मेरी यादें और
वादे बसते हैं !

एक बहुत बड़ा खजाना ..
और भी है ;
जिसे हासिल करने के लिए ..
नब्बे के दशक में -
मैंने अपना -
मन वचन और कर्म तक ...
गिरवी रख दिए थे !

आज भी ..
कुछ फ़टी हुई ..
आंसुओं की सोख्ता बनी  चिट्ठियां ...
कुछ कसमें ...
कुछ वादे और
कुछ रुस्वाइयाँ ...
बड़े जतन से ..
सम्भाल कर रखे हुए हूँ ..
अपने ह्रदय की ..
अतल गहराईयों में !

समझ नहीं आता कि -
कहाँ जमा करूँ ...
अपनी यह बेशुमार दौलत ??

रोज़गार निर्माण के कुछ पन्ने  ...
कुछ प्रवेश पत्र ...
कुछ प्रमाणपत्र और ...
कक्षा पहली से एलएलबी और
एमबीए तक की मार्कशीटें भी अक्सर ...
चिढ़ाती रहतीं हैं मुझे कि -
मैं बहुत अमीर हूँ !

पीएम सर जी ;
बस अमूमन ..
इतनी सी ही दौलत है ..
एक आम हिंदुस्तानी के -
बैंक खाते में !

कुछ मोहबतें ...
कुछ जुदाईयां ..
कुछ वफ़ाएं ..
कुछ बेरोज़गारियां ...
कुछ दर्द और कुछ रिश्ते !
अब कोई इसे -
काला धन बोले या सफेद ..
हमारे लिए यह है ;
बस ...
मन का भेद !

खुशियों की तलाश में ..
दौड़ते ..
ज़िन्दगी से रोज़ समझौता करते ...
एक आम हिंदुस्तानी से ..
क्या बटोर लेंगे ;आप ?

हाँ यदि ...
काला / सफेद का अंतर ...
स्प्ष्ट करने का ...
मन करे तो -
जो संसद में ...
इस मंथन में ...
अन्तर्नाद कर रहे हैं ...
उनकी सूची बना कर ...
प्रत्येक से ...
इतना ज़रूर पूंछियेगा कि-
२५ से ३० वर्षीय ..
राजनैतिक जीवन का ...
लेखा जोखा दें ...
जिसमें वे -
हज़ारपति से अरबपति ..
बनें हैं !

आपके इतना पूंछते ही -
वे गर्भ गृह में आकर ..
शोरगुल करके ..
सदन का बहिर्गमन ..
कर देंगे!
वह भी ..
अनिश्चितकाल के लिए !

बस ...
आप अपनी जीवटता से ..
बहिर्गमन मत करियेगा !

यकीन मानिये ..
देश आपके साथ है !

जब भागीरथ ..
नमामि गंगे को ..
पृथ्वी पर लाने के लिए ..
तप कर के ..
शिव की तपस्या ...
कर रहे थे तो -
भागीरथ के समतुल्य ..
ऋषियों ने ;
उन्हें भी -
वैसा ही कहा था ...
जैसा ये लोग ..
आपको कह रहे हैं !

नमन !

(गर्वित गौरव !)

Tuesday, November 22, 2016

नोटबन्दी पर राजनैतिक नक्सलवाद की मंडराती छाया !

कुछ ऐसी रफ्तार ..
हो गई है ज़िन्दगी की ..
कि न कुछ भाता है ..
और न सुहाता!

देश को -
दीमक की तरह ..
खाने वालों की सोचूं ?
उनका विरोध करूँ ?
या
अपने बच्चों ..
अपने परिवार का ..
ध्यान रखूं ?

देश की उथलपुथल ..
आहत करती है ;
एक आम भारतीय की ज़िन्दगी और
उसके सफरनामे को !

रंग भरते भारतीय को ..
बेरंग करने की ..
कुचेष्ठा करते रहते हैं ..
न जाने कितने ..
जयचंद और ब्रूटस !

किस से लड़ूं ?
किसको जवाब दूँ ?
और कैसे रोकूँ ..
अपने उद्देलित मन को ?
जो उकताहट और
अकुलाहट से ..
सोचता रहता है -
चंद्रशेखर आज़ाद बनने की!
और इन ..
देश विरोधी नामुरादों को ..
बस एक ही गोली से ...
काम तमाम करने की ..
जद्दोजहद में ...
बीत जाती है -
ज़िन्दगी की सुबह से शाम !

कब होगा मेरा भारत
इन घटिया शक्तियों से मुक्त ?
विरोध ,खिलाफत और बगावत में ..
धीरे धीरे ..
घिसट रही है -
बेचारी ज़िन्दगी !

बहुत दूर छोड़ आये ;
हम सफरनामा ...
प्यार और व्यापार का !

बस कुछ समझौतों से
गुज़र बसर चल रही है ...और
अब तो मन्दिरों के ..
देहरी पर भी ..
इन जल्लादों के ..
खात्मे की मुरादें ..
मांगी जाने लगीं हैं !

ख़ुशी इस की है कि -
इन मक्कारों के सीने में ..
ऐसी जलन मची है ..
जिसका इलाज ..
लाइलाज है !

 भ्रष्टाचारी ;
तड़पते ही रहेंगे !
ऐसी कमर तोड़ी है  ..
कि एक झटके में ..
झटक गए हैं और
मोदी की ५६ इंच छाती की
बात करने वालों की ...
खुद की कमर ..
छह इंच कम हो गई है !

तुमसे ...
कहने का मन करता है कि -
पांच सालों के लिए ..
तुमको हमने -
"छप्पन चौरंगी लेन"
से उतार कर ...
"डस्टबिन" में फेंका है ...
तो वहीँ पड़े रहो और
अपने गुज़रे ज़माने की ..
स्मृतियों की लिहाफ ओढ़े ..
समय गुज़ारो !

तुम्हारी हर कारगुज़ारियां .. 
देश प्रेम और राजधर्म ..
न हो कर ...
"राजनैतिक नक्सलवाद"
की श्रेणी में आतीं हैं और
यह देश तुम्हें ...
तुम्हारे नग्न स्वरुप में ..
देख रहा है; चुपचाप !

हम सन्तोष में हैं कि -
यह देश....
जितना अधिक ...
तुम्हें देख लेगा ...
उतना तुम्हें समझ लेगा ...
जिससे कभी ...
भविष्य में तुम्हारे प्रति ..
आसक्त न हो !

Friday, November 18, 2016

नोटबन्दी -राहुल और मोदी का द्वंद !

काश! राहुल; नितीश जैसे परिपक्कव होते और कभी कभी उचित बात पर मोदी जी का साथ भी दे लेते ; तो शायद लुप्तप्राय कांग्रेस बच जाती !
मोदी की हर बात में चापलूसी करना यदि गलत है तो फिर राहुल या विपक्ष को समर्थन देना भी तो अंधभक्ति को बढावा देना है !
वास्तविकता में कोई भी जन्मजात भाजपाई नहीं है और दस वर्षों पहले -मोदी -किसी भी प्रकार से देश की पहचान भी नहीं थे लेकिन -समय के प्रवाह में - सत्तारूढ़ कांग्रेस भारतीय मूल्यों और स्नेहपटल से दूर होती गई और सर्वश्रेष्ठ अपवाद के रूप में भाजपा का अभ्योदय होता गया और शिक्षित सवर्ण मगर बेरोज़गार उससे जुड़ता गया !
बेरोज़गारी ,आरक्षण ,भारतीयता और हिंदूवादी भावनाओं से ग्रसित जन उससे जुड़ते गए और कुछ इसके विरोधी भी होते गए !
प्रदेश स्तरीय राजनीति में ; मैं -भाजपा में कोई अतुलनीय कद नहीं पाता हूँ लेकिन उपलब्ध परिस्तिथियों में- जबकि कांग्रेस में किसी से लड़ने की क्षमता भी नहीं दिखती तो भाजपा ही उचित प्रतीत होती है !
यह भी मध्यप्रदेश का सौभाग्य है कि -
छोटी पार्टियों की राजनीति से हमारा प्रदेश अभी बचा हुआ है और सपा बसपा और मार्क्सवादी आदर्शवाद से अनछुआ हैं !
कतिपय आस्थाएं हो सकती हैं कि -यदा कदा विचरण करतीं हों लेकिन उनके शासन करने के मनसूबे अभी निकट भविष्य में फलीभूत होते नहीं दिखते !
गलतियां सभी में हैं !
नँगे सभी हैं !
दूध का धुला कोई भी नहीं !
ये भी नहीं और वे भी नहीं थे !
बस जिसकी गाड़ी चल निकली तो उसकी बातें भी चल निकलती हैं !
व्यक्तिगत तौर पर ;मैं किसी पार्टी का सदस्य नहीं परंतु भारतीयता के विषय पर उपलब्ध पार्टियों में मुझे भाजपा सवश्रेष्ठ लगती है !


"इंदौर से भोपाल जाना हो और
रात गहरा रही हो तो
जो भी संसाधन मिले
उससे लक्ष्य तक पहुंचना
उपयुक्त होता है ! "

कुछ ऐसा ही हाल -देश का भी -दो साल पहले था ; जब कांग्रेस को उतार कर भाजपा सत्तासीन हुई थी !

खैर ;सर जी!बहुत लम्बी दिल की बात हो गई !   आगे भी होती रहेगी !

अपनी अपनी सोच और अपने अपने तर्क !
कभी समझ का फर्क तो कभी बेडा गर्क !
सादर नमन सहित -
आपका सदैव -
गौरव !

Saturday, November 12, 2016

अनाम योगी कर रहा अपना काम !

मुझे नहीं पता ..
तुम कौन हो ?
बस इतना पता है कि -
किसी अनाम शक्ति ने ..
तुम्हें हिंदुस्तान के ...
भले के लिए भेजा है !

कभी लगता है कि -
तुम सरदार पटेल का
पुनर्जन्म हो ..
तो कभी लगता है कि -
कोई मायावी हो ..
जो न उत्तेजित होता है ..
न विचलित ...
न लांछित और ..
न शापित !

इतनी सारी ..
गलतफहमियों के बीच ..
इतनी सारी ..
बद्दुआओं के बीच ..
लक्ष्य को प्राप्त करना ..
कोई तुमसे सीखे !

साधारण !
नागा साधु !
न आगे कोई न पीछे !
निर्द्वन्द !
निष्कपट !
निर्भीक !
निर्लिप्त और निर्विकार !
ऐसे न जाने कितने ..
तमगे लगाने का ..
मन करता है पर ..
सोचता हूँ कि -
कोई इसे "अति" न कह दे !

खैर !
यदि महाकाल और मतंगेश्वर का आशिर्वाद रहा तो -
ऐसे ही ..
तुम्हारे लिए ...
लिखता जाऊँगा और ...
देखना एक दिन -
तुमसे जरूर भेंट होगी !

Friday, November 11, 2016

नोट सी मोहब्बत !

अब नोटों पर दिल बना कर ..
नाम लिखना ;
छोड़ दे ग़ालिब !

पता नहीं ..
मोहब्बत भी कमबख्त ..
एक हज़ारी नोट ..
की मानिंद निकले !

दिनभर साथ थी ..
रात बीती तो -
मुकर गयी !"

Monday, November 7, 2016

आखिरी रात पिता के साथ @ ७/११/१९९५

प्यारे पापा !
पता न था कि -
२१ साल पहले कि..
यह रात ;
आपके आगोश में ..
आपके साथ ...
मेरी इस ज़िन्दगी की ...
आखिरी रात थी !

अगर पता होता तो ;
ज्यादा कुछ नहीं तो ;
उस रात को ..
पूरी शिद्दत से ..
जीता और जागता ..
हर एक पल ..
आपके साथ ..
ताउम्र के लिए ..
यादें ....
बन जाने से पहले !

मेरे प्यारे पापा !
कहाँ हो आप ?
मुझे पता है ;
जहाँ हो आप !
पर ..
क्या करूँ ?
कैसे लूँ ; उस दुरी को नाप ?
जहाँ छुपे हो ; मेरे आप !

मेरे भी बाल अब ..
पकने लगे हैं ;
आँखों में भी ...
कुछ गड्ढे ..
उभरने लगे हैं ;
आपसे मिली ...
बीपी की बीमारी भी ...
धड़कने लगी है और -
बच्चे भी बड़े होने लगे हैं !
लेकिन
इतना सब होने पर भी ..
लगता है कि -
कहीं से ..
आप दिख जाओ और ...
मैं फिर से ..
छोटा सा ..
आपका दुलारा शानू बन ...
सीने से ....
चिपक जाऊं !

लेकिन अब ..
न आप हो ..
न आपकी परछाईं !
बस अगर कुछ है तो -
यादें और ..
ज़िन्दगी की वे अनमोल बातें जो कभी थीं ;
आपने बताईं !

सच !!
आज की रात ...
बड़ी मुश्किल से ...
फिर कट रही है ;
बिन आपके !!
पिछले बीस बरसों से ...
हमेशा की तरह !!

कोशिश करना कि ..
चल चित्रों की भांति ..
स्वप्नों में आकर ...
मुझे दुलार कर के ...
अंतर्ध्यान हो जाने को
मिल जाए !
फिर भगवान् की मर्ज़ी !!


राजनैतिक प्रदूषण !

जरा सी धूल क्या उडी सड़कों ...
सारी दिल्ली में -
जीना हराम हो गया !

उनसे भी ..
एक दफे पूंछ लेते ..
इलाज़ प्रदूषण का ..
जो पचास बरसों तक
झोंकते रहे धूल ....
हिंदुस्तानियों की नज़रों में ;
राज करके तख्तेताऊस पर !"

Tuesday, November 1, 2016

दीपावली!अकेला इंसा और सुलगते अरमा !

चकाचौंध करती रौशनी ..
धोके से फूटते पटाखे ..
जख़मीं होते इंसा ..
हंसता बुज़दिल !
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
महँगी मिठाईयां और पटाखे ..
बिगड़ता महीने का बजट ..
चढ़ती उधारी ..
दिखावटी श्रृंगार ..
बारूदी वहशी गन्ध और
शोशेबाज़ी !
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
भाइयों का ..
घर में जमा होना !
"दिवाली में दीवारें" खींच बंटवारे पर विस्तृत चर्चा ...
माँ पापा के स्वास्थ्य पर- परिचर्चा कि -"बढ़ती उम्र में कितना और चल जाएंगे ?"
और
लौटने के "कन्फर्म टिकट " की जदोजहद !
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
दिवाली बाद-
फिर सूना आकाश ..
बारूदी राकेट की जगह ..
उड़ते असली हवाईजहाज़ ..
टूटते तारे ..
गाँव में अकेली पगडंडियों पर
बुजुर्ग माँ-बाप ..
उठतीं मिठाई की दुकानें ..
धुलती कढ़ाइयों - खोमचे ..
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !
फिर दिवाली की जगह ..
पटरियों पर दौड़ती ..
हक़ीक़त को लौटती ..
दिखावटी मगर दिलकश ज़िन्दगी ...
अकेला इंसा और सुलगते अरमा !