Sunday, July 31, 2016

पिता की ख्वाइशों की भट्टी !

ख्वाइशों को ..
टांग दिया है -खूंटे से ..
कुछ दिन और ...
सुलगते रहने के लिए ...
भले ही ...
मध्यम आंच में ..
क्योंकि अगर
उन्हें "दफन" कर दूंगा तो ..
मेरे मुरझाने का असर ..
मेरी नन्हीं ...
कोंपलों पर पड़ेगा !

अब वो समझने लगे हैं -
अपने पिता के
झुके हुए कन्धों का मर्म !

ख्वाइशें !
मरनी नहीं चाहिए!
क्योंकि -वे ही हैं ...
जो भविष्य के सूरज की लालिमा बनती हैं !

पिता के ख्वाब ..
बनते हैं ...
बच्चों का ईंधन ..
और कुछ कर गुजरने की ..
आग को ....
जलाये रहते हैं ...
दो पीढ़ियों तक !

देखना एक दिन ...
ये मेरे दिवास्वप्न ही ..
नींव के पत्थर बनेगे ..
और मेरे ख्वाब ...
हक़ीक़त बन ..
साबित करेंगे कि-
"उन्होंने वो कर दिखाया ...
जो पिता ने सुझाया !"

ख्वाहिशें!

बिन थके बेधड़क हर रोज़ चली आती हैं..
ख्वाहिशें इतवार को भी..
आराम नहीं करतीं..!!
बीत गए वो पल जब कोई इतवार की रात कहता था -"बेटा अब सो जाओ कल सुबह जल्दी स्कूल जाना है !"

Friday, July 29, 2016

मैं और मेरे अंदर का सांप !

"बदस्तूर जारी है -
ज़िन्दगी से ....
रोज़ रोज़ की ...
नोंकझोंक और जंग !

साबित करती है वह ;
हर सुबह ....
मेरा निकम्मापन ....
और पिछले चालीस बरस का ...
रिपोर्ट कार्ड ...
हाज़िर कर देती है ...
रोज़ नाश्ते की टेबल पर ...
और ढकेल देती है मुझे ...
बहुत नीचे ...
अनंत गहराईयों में ...
फिर ऊपर न आने के लिए !

मैं भी ...
पूंछ कटे सांप की तरह ...
बेशर्मी से ...
बिलबिलाता हुआ ...
निकल आता हूँ ....
ज़मीन की खंदकों से बाहर ..
दो दो हाँथ करने को ...
उन पत्थरदिलों से ...
जो उकता रहे हैं ...
मेरी नाकामी की ...
खबर सुनने को !"

Tuesday, July 26, 2016

बहती नदिया!


कल तक सूखी थी ...
तो लोगों ने रौंद कर ...
उसपर बना ली थी ...
पगडंडियां ...
और खोद कर ले गए थे ....                             
उसकी पावनता और बह्मचर्य                       
सुनहरी बालू या रेत के रूप में !

और आज ...
जब बारिशें ..
उसे कर रही हैं सराबोर ..                             
उसकी पहचान से ...
कल कल करती ...
जल तरंगों से ...
तो वही लोग ...
दे रहे हैं उसे ...
उपमा-                                                         
रौद्र रूप की !
कैसी दुनिया है ?

नारी सीधी सादी है तो ...
अबला !
और जरा ...
अपने आप को सम्भाल कर खड़ी क्या हुई ...
उसकी रौद्रता के चर्चे ..?
माँ दुर्गा जैसे होने लगते हैं !!

कल तक नदी थी ...
तो खूब तैरे ..
खूब डुबकियां लगाईं ..
और आज जरा -
वह अपनी लय में ...
क्या आई ;
लोगों को दिखने लगी -
उसमें
रौद्रता या बेहयाई !

Monday, July 25, 2016

बारिश के तटबन्ध में छुपा राज़ !

बारिशें !!!
बरस कर चलीं गईं !
और
पीछे छोड़ गईं ...
कुछ खिलते ख्वाब ...
कुछ सुलगते अरमान और
उड़ने को ...
खुला नीला आकाश !

बारिशें ...
अक्सर कुछ टीस भी ...
छोड़ जाया करती है !

कुछ उखड़ी साँसें ..
कुछ अनकही बातें ...
कुछ यादों की कतरनें ...
तो
कुछ सिकुड़े सलवटों से भरे बिस्तर और उसकी ...
किनारियों पर ....
सोख्ता बने तकिये पर ...
आंसू की चन्द बूँदें !

अक्सर बारिशें ....
अपने पीछे छोड़ जातीं हैं ...
घर की दीवारों से ...
कुछ टपकती हुई बूंदें ...
और
कुछ पिताजी के द्वारा .....
बनवाई गई ...
गाँव के घर की छत से ...
टपकता पानी !

कुछ सीलन सीलन सी ...
अज़ीब सी बदबू ...
सच !
बारिश के बाद ...
अक्सर घबराहट सी ...
हो जाती है ....
पुराने पुरखों के ज़माने के ....
खस्ताहाल मकान देख कर!

सच कभी कभी ...
बारिश बाद के खर्चे भी न ...
परेशान कर देते हैं ...
और मज़बूर कर देते हैं ...
सोचने को ...
कि इन चाहरदीवारियों को  बनवाने वाले भी न ....
कितने जुनूनी थे ?
कितना प्यार करते थे ...
हमसे न ?
जो इन गावों में भी ...
छोटा मोटा घोंसला तो बना ही गए ....
हमारी खातिर और
जिसे हम आज नहीं तो कल  बेंच ही देंगे ....
अपने बेटे को ....
कोटा में कोचिंग ...
कराते वक़्त !

बारिश कुछ नहीं ...
बस स्पंदन है .....
ज़िन्दगी का !

जहां प्यास थी ..
वहाँ तृप्ति है !

जहाँ बंज़र जमीन थी ...
वहाँ बहार है !
और
जहां अतिवृष्टि हो गई ...
वहाँ अब दलदल है !

इंसानी रिश्तों में भी ...
जब बारिश आती है तो
बहुत कुछ .....
अज़ीब अज़ीब सा होता है !

फिर हम ....
इंसानों के लिए तो ..
बारिश का मतलब ....
सिर्फ "पानी" नहीं होता बल्कि ...
मोहब्बत की बारिश ....
सम्पन्नता की बारिश ...
सुकून की बारिश या
दुआओं की बारिश
की भी ....
अपनी अपनी ...
अहमियत और
जिहीनियत है !

जिसने इन बारिशों के .....
तटबन्धों और अल्फ़ाज़ों को .. ..
पढा और समझा .....
वह तो ....
खुश है और
वहीँ कुछ लोग ....
बारिश के दलदल में फंस कर ....
ईश्वर को दोषी मानते रहते हैं !

Wednesday, July 20, 2016

काश नागा होता !

काश फक्कड़ होता !
अपने में मस्त ..
न कुछ लेना ..
न कुछ देना ..
न दुःख से दोस्ती और -
न सुख की चाह !

बस हंसना हंसाना और
आगे बढ़ जाना !
जहाँ गुज़रे रात ..
वहीँ रम जाना !

काश नागा होता !
न तन को कपड़े ..
न मन के पचड़े !

जब कुछ ढंकना ही नहीं तो फिर
ओढ़ना क्या और पहनना क्या ?

यदि सौंदर्य ढंकने में या
पर्दे में है ....
तो फिर ...
सिर्फ अंतःवस्त्रों तक ही
सीमित क्यों ???

क्या कोई जब "तन" का नागा होगा तभी असली नागा होगा ?
"मन" का भी तो -"इंसा"
नागा हो सकता है ???

मन का नागा !!!
जहां ...
न कोई रिश्ता हो न कोई प्यार ...
बस ...
परित्याग ज़िन्दगी की कामनाओं का !
जैन मुनि जैसा ...पर
बिना शरीर को कष्ट दिए !

इस ज़िन्दगी की ...
भागमभाग से तो ...
बेहतर होती वो ज़िन्दगी !
फक्कड़ साधू की या ....
नागा बाबा की !

बस घूमता रहता ...
ता उम्र ...
बेखटके बेरोकटोक बेवजह  .....
बेशर्मीं से ....
और जला दिया जाता ....
कहीं किसी रोज़ ....
श्मशान में किसी ....
घाट किनारे ...
बिना परिचय या बिना गोत्र
के और उड़ जाता ....
मैं भी उन्मुक्त ब्र्म्हांड के ....
सुदूर उपवन में ....
बिना तेरहवीं भोज के !

काश !मेरे अंदर भी ...
होती इतनी दिलेरी ...
जो तोड़ के फेंक देता ...
ये तिलस्मी संसार की  -
जिम्मेदारियां और ...
बन सकता -
वह प्रकृति का अनावृत रूप ...
जहां ...
आता हर कोई नागा और फक्कड़ है ...
और जब जाता है तो ...
हम स्वयं ...
काट देते हैं उसकी ...
सारी सरफूंदें या ताबीज़ गंडासे ...
और मोह के धागे और ...
विदा करते हैं उसे ...
नागा !

जिसने इस "नागा सत्य" को समझ लिया उसने जीवन का मर्म समझ लिया !

Tuesday, July 19, 2016

प्यार के फलसफे !

काश !
प्यार केफलसफे भी पढ़े होते किसी गुरु से ...
कम से कम ...
मोहब्बत के पेपर में ...
पास तो हो गया होता ?

बहुत मन लगा कर ...
की थी ;
प्यार की पढ़ाई !
पर परीक्षा में ....
कुछ ऐसा पेपर आया कि ..
अनसुलझी कॉपी ...
छोड़ कर ही ....
भाग आया मैं !

वफाओं के ...
कस्मे वादों के ...
मर्यादा के सारे पाठ कंठस्थ किये थे याद ...
पर बेवफाई के हिस्से से ...
कुछ ऐसे प्रश्न ....
मिले कि -
आज तक भटक रहा हूँ ;
उनका उत्तर तलाशने में

Monday, July 18, 2016

तू बड़ा बेशर्म है रे .  ..

तू बड़ा बेशर्म है रे .  ..
इतना तोडा ...
मरोड़ा लेकिन ...
हर बार ..
सांप की तरह ...
फन उठा कर ..
आ जाता है ..
रेगिस्तान के इस पार ....
अपनी औकात दिखाने !

तेरा वह हाल है ...
जैसा . ...
उस कमज़ोर ,
मरघुल्ले कुत्ते का होता है ...
जो . ...
जानता तो है कि ....
वह कुछ ....
उखाड़ नहीं सकता ....
लेकिन -
वह भोंकना .. 
बंद नहीं करता .. 
क्यों की
यही उसकी फितरत है
या
प्रवृत्ति है !

भोंकना और सिर्फ भोंकना ...
क्योंकि वह जानता है कि ....
काटना ...
उसकी औकात नहीं...
तो क्यों न ...
भोंककर ही ....
अपना जहर उगला जाए

हम भी जानते हैं कि ..
हमारे एक निर्णय से ...
तेरा बंटाधार .....
हो जाएगा !

लेकिन . 
हरबार ...
हम द्रवित हो जाते हैं ...
तेरी हालत ..
देख कर ...
पर अब लगता है कि ...
तेरा वह समय आ रहा है ..
जब तू फिर से ....
बंटेगा ..
और हमारी ...
किसी "यूनियन टेरिटरी" जैसा  रह जाएगा ...
तेरा विस्तार !

तू दया का ....
पात्र भी है !
न खाने को खाना ..
न ओढ़ने को कपड़े ...
पर
न जाने कहाँ से ..
उगलने को जहर ....
तू ले आता है ...
और हम ...
परेशान हो जाते हैं ...
तेरी बेशर्मी पर !

हमारे यहां "प" से पवित्र ,पावन , और प्रेम का उच्चारण होता है ..
वहीँ तू -
अपने नाम में " पाक " लगा कर .....
बदनाम कर रहा है ...
"प" शब्द की " ...
पाकीजगी " को !

चल तुझे ...
मुबारक ...
तेरी बेशर्मियां ...
और मैं शर्मिन्दा हूँ ...
तुझे बार बार ..
माफ़ करके !!

Saturday, July 16, 2016

जीत चाँद की!

चाँद और चकोर !

देखना ! आखिर में ...
जीत चाँद की ही होगी !

अपनी मध्यम रौशनी की बदौलत !
चाँद की चांदनी ....
अँधेरे में ...
रोशन करेगी ...
उन ख़्वाबों को मुकदस जमीं ...
जो सुलगते रहते हैं ;
अक्सर दिन की तीखी रौशनी में ...
और
डूब जाते हैं ..
शाम ढलते ढलते !

ज़िन्दगी की -
सुलगती रातें ...
तपती दोपहरियां और
ढलती शामों ..
में ही तो ;
सिमट जाती है ..
इक इंसा की ..
पूरी कहानी !

कैसी है न
ज़िन्दगी की ...
अबूझ अनसुलझी ...
समय की घडी ?
बिलकुल उलटी चलती है !

जीवन साथी के साथ ...
पहले महकती रातें !

फिर परिवार बढ़ने पर ...
पसीने से लथपथ ..
दुःसाध्य दोपहरें !

और सांझ में ...
थकी हारी ...
ज़िन्दगी की ढलती ....
गौधूलि बेला की ....
गुमनाम शामें !

फिर -
आखिर में -
जीवनसाथी के ...
बिछुड़ने पर ..
अकेली ...
निशब्द ...
कराहती रातें !

इक चाँद ही तो है जो ...
अक्सर झुठला दिया जाता है ...
रौशनी की चर्चाएं होने पर ...
और ...
सुरज ले जाता है ..
बाज़ी ...
प्रकाश की !

पर ..
जब ज़िन्दगी का पहिया ....
टूटता है ...
और चलती गाडी ...
अपनी ही औलादें ....
कबाड़ में टिकाती हैं ...
और
"दिशा अथवा निस्तार" ...
जाने को ....
जब मोतियाबिंद से ....
आँखें जवाब देने लगती हैं .. और ...
औलादों की टौर्चों में ...
सेल नहीं होते हैं .....
तब
चाँद ही ...
सहारा बनता हैं ..
प्रकाश पुंज का और
देता है ...
जीवन को रौशनी और सहारा !

देखना ...
आखिर में ...
सीधासादा चाँद ही काम आएगा !
और फिर भी ...
ज़िन्दगी ....
गाती रहती है ..
सूरज की तारीफों के पुल ..
सदैव ..
दोगली बन के !

Friday, July 15, 2016

इस ज़िन्दगी में !

कमबख्त ....
कोई तो होता ....
जो हम पर मरता ;
इस ज़िन्दगी में !

ताउम्र ...
हम ही मरते रहे ..
इस  ज़िन्दगी में !

फिर यारो !
मरता कौन है ...
और जीता कौन है ;
मोहब्बत भरी ..
इस ज़िन्दगी में ??

मरना ...
इक बहाना है ....
इस ज़िन्दगी में !
काश कोई समझता
इस ज़िन्दगी में !!"

Saturday, July 9, 2016

बारिश का मजमून!

भीगते सभी हैं ; बारिश में !
बस बारिश का मजमून बदल जाता है !

कोई बादलों की बूँदों से .. 
तरबतर होता है ...
तो कोई ....
आँख से टपकी बूँदों से !

आँखों से टपकती बूंदें ...
भी भिगोती हैं ...
कभी दिल को ...
तो कभी दिमाग को ..
अक्सर बारिश में !

चाहे तन भीगे या मन ...
चोला ...
बदलना ही पड़ता है !

तन भीगने पर ...
कपड़े और ...
मन भीगने पर ...
मीत ...
बदलने ही पड़ते हैं !

जो ज़िन्दगी की बारिशों में ...
भीगने पर ....
बदल लेते हैं ....
तन के कपड़े ..
या मन के मीत ..
वो सुकून भरी वादियों में ...
गुज़ारते हैं .  
ज़िन्दगी !

और वहीँ कुछ ....
मेरी तरह .....
बीहड़ों में ...
भटकते रहते हैं ....
ता उम्र ....
अपने भीगे ...
अंतर्मन के साथ !

Thursday, July 7, 2016

भारत की ईद !

ईद के जश्न पर चंद पंक्तियाँ  अपने हिन्दू मुस्लिम मित्रों को और उनकी दोस्ती को समर्पित !

आज पेशानी पर ...
बल नहीं है !
कढ़ाई किये हुए ....
कुर्ते पायजामे पर ...
शिकन नहीं है !
महंगी इत्र की शीशी ...
लगाने का ...
टशन नहीं है !...
और आज दूकान ....
बंद होने का ....
वहम नहीं है !

"आज ईद है ...
आज माबदौलत को ...
कोई भी शिकवा सहन नहीं है !"

आज मुस्कराहट ऐसी कि ...
मोहब्बत भी फीकी पड़ जाए ...
आज ज़र्रानवाज़ी ऐसी कि ...
कुदरत भी शर्मा जाए और
आज ज़िंदादिली ऐसी कि ...
डूबती नब्ज़ भी ...
कुछ पल थम कर ....
ईद मुबारक कह कर ....
गले लग जाए !

"आज ईद है ...
आज माबदौलत को ...
कोई भी शिकवा सहन नहीं है !"

सीमा पार !(पाकिस्तान!) :
उनकी ईद से ज्यादा ...
रौनक है मेरी ईद में !
उनकी ईद से ज्यादा .....
मोह्ब्बत मेरी ईद में !

अगर कभी ....
शक ओ गुमान हो ....
अपनी कैफियत पर ...
तो हिन्दुस्तान के ...
किसी भी शहर ,गली ,कूचे ...
और मोहल्ले में....
गिन लेना ...
गले मिल कर ...
ईद मुबारक देने वाले ...
एक तिहाई हिन्दू होंगे !

ज्यादा कुछ नहीं कहता ...
बस देख लो ...
आज ईद के दिन ...
लाखों हिन्दुस्तानियों के घर ...
एक टाइम का ...
खाना नहीं बना है ...
क्योंकि ...
"भाईजान के घर ...
आज दावत पर ...
तशरीफ़ फरमाना है !"

बरखुरदार !-
"आज ईद है ...
आज माबदौलत को ....
कोई भी शिकवा सहन नहीं है !"
(गौरव !)

Wednesday, July 6, 2016

सूखी हुई ज़िन्दगी!

सूखी हुई ज़िन्दगी भी ..
कितने अर्थ देती है !

जब सारी उम्मीदों के दरवाज़े 
बंद हों तो या ...
किसी भी दरवाज़े के ...
खुलने की आस न हो ..
तो ..
सूखापन और भी अच्छा ...
लगने लगता है और ...
इसी को हम ...
अपने दुःख के अनुरूप ..
नामकरण करते हैं !

असल में सूखे रास्तों से ..
चल कर ही ज़िन्दगी ...
नम और गीली होती है !

जुदाई ...
बेवफाई ...और
रुस्वाई ...के बाद ही ....
शहनाई की बारी आती है !

देशप्रेम ..बलिदान ...
शहीद ..ईमानदारी -
कर्तव्यपरायणता और ..भारतीयता जैसे
तपो गुण ....
सूखी बाँझ धरती से ही ....
अंकुरित होते हैं !

सूखी धरती से ही पानी  निकलता है ...
बशर्ते प्रयास गहरा हो !

सूखे मन से ही ...
प्रेम उपजता है ...
बशर्ते प्रेम गहरा हो ...

और....

सूखी हुई तरूणाईयों से ही ...
देश और समाज के प्रति ....
वफादारियां निकलती हैं !
बशर्ते -
डीएनए प्रदूषित न हो !

दरअसल ...
सूखी चीज़ें ...
अक्सर साफ़ सुथरी ..
पाक पवित्र और ...
शालीन होती हैं !

कुछ कुछ ...
मरुस्थलों या रेगिस्तानों की मानिंद !

जो जैसे हैं ...
वे वैसे ही रहते हैं !
निर्जल ,निर्जन ,निर्लिप्त
और निस्वार्थ !

कुछ ऐसे ही ...
इंसानों की भी खोज ..
की जानी चाहिए ...
जो सूखे सूखे हों ..
रूखी सूखी खाते हों ...
और नमी या आद्र्रता से ..
वंचित हों ...
और देख लेना ..
जिस दिन ऐसी प्रजातियां खोज लोगे ...
और उन्हें देश का राजपाट सौंप दोगे ...
देश की समस्याएं ...
विलीन हो जाएँगी !

हाँ !
सूखी हुई पत्तियों में आग ज़रूर ...
सम्भल कर लगानी चाहिए क्यूंकि ...
सूखे तन ..
सूखे मन ..और
सूखे वन ..
जल्दी धधक उठते हैं ...
क्यूंकि
वे अनछुए ..
निरासक्त ...
निर्लिप्त और निश्छल ...
होते हैं ....
बिलकुल पेड़ों की ...
पत्तियों की भांति ...
कि जहाँ से हवा आई ...
उसकी उलटी दिशा ..
बह चले ...
फिर चाहे ...
किसी के घर आग लगे ...
या किसी के घर हाँथ सिंके !