Wednesday, July 6, 2016

सूखी हुई ज़िन्दगी!

सूखी हुई ज़िन्दगी भी ..
कितने अर्थ देती है !

जब सारी उम्मीदों के दरवाज़े 
बंद हों तो या ...
किसी भी दरवाज़े के ...
खुलने की आस न हो ..
तो ..
सूखापन और भी अच्छा ...
लगने लगता है और ...
इसी को हम ...
अपने दुःख के अनुरूप ..
नामकरण करते हैं !

असल में सूखे रास्तों से ..
चल कर ही ज़िन्दगी ...
नम और गीली होती है !

जुदाई ...
बेवफाई ...और
रुस्वाई ...के बाद ही ....
शहनाई की बारी आती है !

देशप्रेम ..बलिदान ...
शहीद ..ईमानदारी -
कर्तव्यपरायणता और ..भारतीयता जैसे
तपो गुण ....
सूखी बाँझ धरती से ही ....
अंकुरित होते हैं !

सूखी धरती से ही पानी  निकलता है ...
बशर्ते प्रयास गहरा हो !

सूखे मन से ही ...
प्रेम उपजता है ...
बशर्ते प्रेम गहरा हो ...

और....

सूखी हुई तरूणाईयों से ही ...
देश और समाज के प्रति ....
वफादारियां निकलती हैं !
बशर्ते -
डीएनए प्रदूषित न हो !

दरअसल ...
सूखी चीज़ें ...
अक्सर साफ़ सुथरी ..
पाक पवित्र और ...
शालीन होती हैं !

कुछ कुछ ...
मरुस्थलों या रेगिस्तानों की मानिंद !

जो जैसे हैं ...
वे वैसे ही रहते हैं !
निर्जल ,निर्जन ,निर्लिप्त
और निस्वार्थ !

कुछ ऐसे ही ...
इंसानों की भी खोज ..
की जानी चाहिए ...
जो सूखे सूखे हों ..
रूखी सूखी खाते हों ...
और नमी या आद्र्रता से ..
वंचित हों ...
और देख लेना ..
जिस दिन ऐसी प्रजातियां खोज लोगे ...
और उन्हें देश का राजपाट सौंप दोगे ...
देश की समस्याएं ...
विलीन हो जाएँगी !

हाँ !
सूखी हुई पत्तियों में आग ज़रूर ...
सम्भल कर लगानी चाहिए क्यूंकि ...
सूखे तन ..
सूखे मन ..और
सूखे वन ..
जल्दी धधक उठते हैं ...
क्यूंकि
वे अनछुए ..
निरासक्त ...
निर्लिप्त और निश्छल ...
होते हैं ....
बिलकुल पेड़ों की ...
पत्तियों की भांति ...
कि जहाँ से हवा आई ...
उसकी उलटी दिशा ..
बह चले ...
फिर चाहे ...
किसी के घर आग लगे ...
या किसी के घर हाँथ सिंके !

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