Wednesday, July 20, 2016

काश नागा होता !

काश फक्कड़ होता !
अपने में मस्त ..
न कुछ लेना ..
न कुछ देना ..
न दुःख से दोस्ती और -
न सुख की चाह !

बस हंसना हंसाना और
आगे बढ़ जाना !
जहाँ गुज़रे रात ..
वहीँ रम जाना !

काश नागा होता !
न तन को कपड़े ..
न मन के पचड़े !

जब कुछ ढंकना ही नहीं तो फिर
ओढ़ना क्या और पहनना क्या ?

यदि सौंदर्य ढंकने में या
पर्दे में है ....
तो फिर ...
सिर्फ अंतःवस्त्रों तक ही
सीमित क्यों ???

क्या कोई जब "तन" का नागा होगा तभी असली नागा होगा ?
"मन" का भी तो -"इंसा"
नागा हो सकता है ???

मन का नागा !!!
जहां ...
न कोई रिश्ता हो न कोई प्यार ...
बस ...
परित्याग ज़िन्दगी की कामनाओं का !
जैन मुनि जैसा ...पर
बिना शरीर को कष्ट दिए !

इस ज़िन्दगी की ...
भागमभाग से तो ...
बेहतर होती वो ज़िन्दगी !
फक्कड़ साधू की या ....
नागा बाबा की !

बस घूमता रहता ...
ता उम्र ...
बेखटके बेरोकटोक बेवजह  .....
बेशर्मीं से ....
और जला दिया जाता ....
कहीं किसी रोज़ ....
श्मशान में किसी ....
घाट किनारे ...
बिना परिचय या बिना गोत्र
के और उड़ जाता ....
मैं भी उन्मुक्त ब्र्म्हांड के ....
सुदूर उपवन में ....
बिना तेरहवीं भोज के !

काश !मेरे अंदर भी ...
होती इतनी दिलेरी ...
जो तोड़ के फेंक देता ...
ये तिलस्मी संसार की  -
जिम्मेदारियां और ...
बन सकता -
वह प्रकृति का अनावृत रूप ...
जहां ...
आता हर कोई नागा और फक्कड़ है ...
और जब जाता है तो ...
हम स्वयं ...
काट देते हैं उसकी ...
सारी सरफूंदें या ताबीज़ गंडासे ...
और मोह के धागे और ...
विदा करते हैं उसे ...
नागा !

जिसने इस "नागा सत्य" को समझ लिया उसने जीवन का मर्म समझ लिया !

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