Tuesday, July 26, 2016

बहती नदिया!


कल तक सूखी थी ...
तो लोगों ने रौंद कर ...
उसपर बना ली थी ...
पगडंडियां ...
और खोद कर ले गए थे ....                             
उसकी पावनता और बह्मचर्य                       
सुनहरी बालू या रेत के रूप में !

और आज ...
जब बारिशें ..
उसे कर रही हैं सराबोर ..                             
उसकी पहचान से ...
कल कल करती ...
जल तरंगों से ...
तो वही लोग ...
दे रहे हैं उसे ...
उपमा-                                                         
रौद्र रूप की !
कैसी दुनिया है ?

नारी सीधी सादी है तो ...
अबला !
और जरा ...
अपने आप को सम्भाल कर खड़ी क्या हुई ...
उसकी रौद्रता के चर्चे ..?
माँ दुर्गा जैसे होने लगते हैं !!

कल तक नदी थी ...
तो खूब तैरे ..
खूब डुबकियां लगाईं ..
और आज जरा -
वह अपनी लय में ...
क्या आई ;
लोगों को दिखने लगी -
उसमें
रौद्रता या बेहयाई !

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