Saturday, December 16, 2017

जन्मदिवस पर दो शब्द तुमको समर्पित !

"ऐ मेरी ज़िन्दगी की -
शरद की रुपहली धूप!
ग्रीष्म की ठंडी ब्यार!
बसंत के प्लाश की केसरिया सोंधी धूल !
और सावन की कलकल बहती जलधारा !
बस ..सदा ..यूँ ही तुम ..
प्रकृति बन ..
रची बसी रहना ..
मेरी लकीरों में ..
कई कई जन्मों तक और .. 
सम्प्रेषित करती रहना ..
अपना वज़ूद ..
आभा,शक्ति और ..
चिर दायनी लक्ष्मी का हमरूप मंदाकनी बन ..
मेरे कई भवसागरों की अनादि यात्रा में !

और क्या कहूं और लिखूं ?
तुम तो स्वयं एक 'जीवन' हो !
'वृतांत' होता तो लिखता !
'जीवन' तो सिर्फ 'जीवन' है जो 'लिखा' नहीं ..
अपितु
'जिया' जाता है !
मेरी इस यात्रा की .. सहयात्री!!
तुम्हें जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएं !!

(शानू !)

Tuesday, November 14, 2017

बचपन के राजकुमार !

"वो मेरा बचपन था !
वो मेरा इलाका था!
जहां चलता था ...
सिर्फ मेरा हुकुम !
हाँ ! मैं तानाशाह था ...
अपने दौरे बचपन के ..
राजपाट का !

मैं ही नूरचश्म था और
मैं ही ..
चाँद के रथ पे सवार राजकुमार !

जरा सी ..
मौसम ने हवा क्या बदली ..
जरा सी चेहरे पे ..
झाईयां क्या आईं ..
न वो बचपन रहा न मैं ..
सरहदों का सुलतान !

बचपन तो बखूबी याद है !!
बेशरम जवानी ...
न जाने कब गुज़र गई ;
पता ही नहीं चला !

आज जब ..
शीशे में अक्स देखा तो झाईयों के साथ ..
चेहरे में दिखे ..
सैकड़ों नुक्स
और फिर याद आया ..
हक़ीक़तों का पुलिंदा ..
कि ..
बुढ़ापे ने अंगड़ाई ली है !

अब न वो ..
नूरचश्म का खिताब ..
नवाज़ने वाले ..
अपने रहे और ...
न वो दौर ए मोहब्बत !

बस ..
इक हलकी सी याद है ..
अपने बचपन की ..
जब माँ की गोद में ..
रो लेने से ..
पिताजी की ऊँगली पकड़ कर  ..
मुझे जलेबी की दूकान तक ...
ले जाया जाता था !"

Thursday, November 9, 2017

पिता ; कभी ख़त्म नहीं होते !

हक़ीक़त में-
'पिता' कभी ख़त्म नहीं होते !
खामोशी का लबादा ओढ़ ..
जुदा नहीं होते !
बस 'अंतर्ध्यान' हो जाते हैं; वो...
'ईश्वर' के वास्ते ..
और हम ..मान लेते हैं ;
उनका गुज़र जाना !

उनके न दिखने के बावजूद ..
वे अपनी खामोशियों के साथ ..
सदैव चलते रहते हैं ..
अपने बच्चों के इर्द गिर्द !
और बच्चे भी ..
अनुगमन करते रहते हैं ..
उन दिशाओं का ...
जो उनके पिता ने ...
चित्रित और चिन्हित की थीं !

गौर से सुनोगे तो ..
वे सारी कहानियां ..
मूर्त हो ..
पथप्रदर्शित करती दिखाई  देंगीं ..
जो जीवन अमृत सा ..
तुम्हें सुना गए हैं ;
अपने प्यारे पिता  ...
अपने अनुभवों का निचोड़ समझ !

समझ सको तो ..समझ लो !
जान सको तो ..जान लो !
पिता कहीं नहीं जाते !
वट वृक्ष बन ..
अपने बच्चों को ..
सदा सहलाते !
बस ...
रूप बदलने को ...
प्रकृति और मौसम जैसे ...
अदृश्य हो जाते !

(शानू और आशीष !)

वक़्त की अरदास !

मैं वक़्त हूँ !
"मुझे मोतीलाल-जवाहर मिले
फिर इंदिरा मिली !
फ़ीरोज़ भी दिखे !
फिर संजय-राजीव मिले!
मेनका वरुण भी दृष्टव्य हो जाते हैं!
अब राहुल के साथ ... चहलक़दमियों में व्यस्त हूँ ! रॉबर्ट-प्रियंका से भी मुलाक़ात हो चुकी है !
देखो अगर वह शादी कर लेगा तो आगे के लोगों से भी मुलाकतें चलतीं रहेंगी वर्ना क्या है ;
बस वक़्त हूँ ...
निकल जाऊँगा आगे ...
बहुत आगे ..
समय की सुर ताल और लय में !
पता है -
खानाबदोश वक़्त कभी रुकता नहीं !

Sunday, October 22, 2017

बुझे दीयों का धुंआ !

चलो उठा लें ..
वे सब मिटटी के दिए ..
जो अपनी पारी खेल कर ..
घर की देहरियों पर ..पड़े हुए हैं ..
कदमों तले ..
कुचले जाने को ;
दिवाली बाद !

कुछ बुजुर्ग भी ..
अपनी जीवट वाली पारी खेलने के बाद ..
कुछ कुछ ऐसे ही ..
चुके हुए दीयों की माफिक ..
गुज़ार रहे हैं ..
अपनी बची-खुची ..थकी हुई साँसें ..
किसी छत के नीचे ..बरामदे में ..
या घर के पिछवाड़े वाले ..
मरम्मत मांगते कमरे में !

देख लेते हैं वे ..उस टूटे पलंग और ..
जंग लगे कबाड़ में .
'अपना' अक्स और वज़ूद ;
जो उनके बेटों ने ..घर के बाहर ..
निकाल दिया है ..
दिवाली की सफाई में ..
कबाड़ी को ..
बेचने की खातिर !

कैसी ज़िन्दगी है न ??
जो दिवाली की रात .. झिलमिल दिया था !
वह दिवाली बाद ..
बुझा हुआ मिटटी का लोंदा ?

जो ता उम्र पापा या पिताजी रहे वे बुढ़ापे में ..
"ओह्हो डैडी ;आप समझते क्यों नहीं ..
आप अंदर जाईये !"

खैर ..
ये फलसफे की बातें हैं  ..तुम नहीं समझोगे !
जब कभी ..एक ज़माने बाद ..
मोतियाबिंद होगा और डाक्टर के पास ..
जाना पड़ेगा तो ..
मेरी ये बातें याद आएँगी !!

( गर्वित गौरव !)

Saturday, October 21, 2017

और दिवाली निकल गई !!

एक बच्चा!
वो रोता रहा फुलझड़ी के लिए ..
वो सुबकता रहा मिठाई के लिए ...
वो सिसकता रहा नए कपड़ों के लिए ..
और दिवाली निकल गई !!

एक पिता -
वो गिड़गिड़ाता रहा बोनस के लिए ..
वो मनुहारता रहा कुछ दिन और की छुट्टी के लिए ...
वो खरीदते रहा घरवालों के लिए अपनी वेतन में भेंटें ...
और ..
दिवाली निकल गई !

एक पत्नी -
वो सजाती संवारती रही खुद को उनके आने के इन्तिज़ार में ..
वो सींचती रही फूलों की बगिया उनके आने पर फूलों का गज़रा पहनने के इन्तिज़ार में ...
वो देखती रही मुड़ मुड़ कर अपने अक्स को शीशे में ....
और ..
दिवाली निकल गई !

Tuesday, October 17, 2017

शब्दों में बंधी...मेरी शुभकामनाएं !!

आदरणीय स्वजन!

"इस दीपावली ...
इक नन्हा सा "दिया" ..
मेरी तरफ से भी ...
स्वीकार हो !!"

चलो प्रकाशित करें ..
'प्रकाश' से 'अन्धकार' को !
आलोकित करें 'ज्ञान' से .. 'अज्ञान' को !
और प्रज्ज्वलित करें ..
'देशप्रेम' और 'सौहार्द' को !

जहां जहां तक भी ..
स्वयं के 'अक्स' की ...
'रौशनी' जाती हो ...
वहाँ वहाँ तक ...हम साबित करें ...
अपने वज़ूद को !

रच दें ..एक ऐसा 'कथानक' ;
जो मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के ..
'श्री' चरणों जैसा हो !!

अपने कर्तव्य पथ पर ..
डटे रहें !!
ज़िन्दगी से समझौते /सौदे कर ...
न कभी झुकें ..न बिकें !!

लक्ष्य पूरे करें और लक्ष्य पूरे करने में ..
दूसरों को मदद भी करें !!

दूर कहीं ..घर में बैठे ..
पूज्य बुजुर्गों का ..
आशीर्वाद लें और ...
छोटों को अपना बहुमूल्य स्नेह दें !

बंधु !
जिसने इन रिश्तों और
अपने कर्तव्यों को निभाया ..
यकीनन उसने ..
दीपक की 'सार्थकता' को  स्वीकार कर ..
स्वयं को ..
दीपक की भांति ...
परिभाषित किया !

अंत में ..
चलो इस दीपावली ...
किसी की ..
अमावस की काली रातों को ..
निजि दीयों से ..
प्रकाशित कर ..
पूर्णमासी की तरह ..
जीवन तरंगों से ..
प्रकाशित और परिभाषित  करने का ..
छोटा सा जतन ...
और यत्न करें !

"जीवन को वृहद विहंगम और ब्रह्म स्वरूप में आत्मसात करने का निवेदन करता हुआ ..."
पुनः शुभकामनाओं सहित ..
सदैव आपका  ..स्नेहिल
(गौरव खरे !)

Monday, October 16, 2017

रिश्ता ..फोटो फ्रेम से !

कोई पीछे नहीं ...
न कोई आगे !
बस काला सा प्रारब्ध ...
और फीका सा ..भविष्य !

और मैं ..
डूबता पुच्छल तारा सा ..
निरे ब्रह्म्हाण्ड में ..
विचारों के गोते लगाता हुआ !

और ऐसे ही ..एक दिन
खो जाऊँगा ...
गंगा से गंगोत्री तक ..
बेनाम ..बेवक़्त ..बदनाम हो कर ..
अपने खट्टे मीठे ..अनुभवों के साथ !

फिर शायद ...
कभी मेरे बेटे और बेटी लगाएंगे ..
एक दो अगरबत्ती ..
मेरे फोटो फ्रेम पे और ...
टपका देंगे ..
दो बून्द आसुओं की ..
अपने पापा के ..
फोटो फ्रेम के शीशे पे ..
और कहेंगे -
चुप हो जाओ ..
देखो पापा जी मुस्करा रहे हैं !

बस ...
इतना ही जीवन है ..
और बाकी यथार्थ की ...
कटु मृत्यु !

आप अमर हो जाते हैं ..
अपने लाड़लों के ...
आसुओं में या ...
खो जाते हैं ...
यादों के अंधड़ में !!

हताशा ! जय पराजय की ..

"हताश ...
अपनी पराजय से नहीं होता !
हताश ...
उनकी जय से होता हूँ ..
जो मुझसे आगे निकल गए ..
दूसरे रास्तों से !

रास्ते तो एक थे ...
जो सत्य और मेहनत से ..
सफलता की ओर खुलते थे !
फिर वे ...
उन रास्तों से कैसे ...
लक्ष्य तक पहुंचे ..
जो गलत थे ?

ऊपर से उनकी जय जय कार ?

मैं कभी नहीं हार मानता !
क्यूंकि असल में ...
मैं कभी जीता ही नहीं !

बस ...
जीतने वालों के जतन से ...
खुद के जतनों की ...तुलना ..
अवश्य करने लगता हूँ ...
और ...
इसी तुलानत्मक अध्ययन में ..
जीतने वाले हो जाते हैं'-बेनक़ाब !

यदि जीतना ही सर्वोपरि है ..
तो फिर ..
गलत रास्ते ..गलत क्यों ??
और सही ...सत्य क्यों ??

जानते हो ...
जो अपनी मेहनत से ..
जीतता है ...
वह सिर्फ मुस्कराता है !

और गलत तरीके से ..
विजयश्री प्राप्त करने वाला ..
अट्हास से ...
जब मर्दन करता है तो ...
निस्तब्धता ...
उसकी गलत विजय की प्रमाणिकता बन जाती है !!"

Wednesday, October 11, 2017

इस दिवाली !

घर की देहरी पे ..दिए जलाने से ..
क्या फायदे ??
दिलों के दिए जलाओ ..
तो हम जानें !!

दो दियों की बाती ..
मिलाने से क्या फायदे ??
गले लग जाओ ;
तो हम जानें !

प्रभु राम की विजय ..
मनाने से क्या फायदे ??
प्रभु राम जैसा ..
बन कर दिखाओ तो हम जानें !!

(Garvit Gaurav! )


Wednesday, October 4, 2017

रफ कॉपी सी ज़िन्दगी !!

रफ कॉपी सी गुज़र गई ज़िन्दगी !!
बेतरतीब बेपरवाह और बदरंग कवर सी !
खूब लिखा ..
खूब गोदा गया ..
और फिर रद्दी वाले के हाथों ..
बेशर्मी से बेच दिया गया !

पीछे के पन्नों में लिखते रहे हम ;
अपने अपने ख्वाब और ..
आगे के पन्नों को फाड़ते रहे -कि ..
किसी रोज़ न हो जाएँ ;
बेनक़ाब !

पीछे के पन्नों में ..
कितने दिलों को बेधा हमने;
तीरों से गोद गोद ..
और
ज़िन्दगी के पन्नों पे ..
कोरे रह गए ;
जैसे हों बिलकुल; अबोध !

बहुत से रॉकेट बनाये हमने पन्ने फाड़ के ..
पर कमबख्त :
किसी ने हमें ही फाड़ दिया ...
पहले चढ़ा कर ...
चने के झाड़ पे !

और कुछ ऐसे ही ..
बेसाख्ता ..
लोग मिलते गए ..
मेरे दिल की किताब से !

अपने दस्तखत करते गए ..
कभी दिल बना देते थे तो ..
कभी मिटा देते थे ..
बिलकुल निर्लजः बन !

मैं भी ब्लॉटिंग पेपर या सोख्ता बन ..
जज्ब करता गया ..
उनके जतन और
आखिर में ..
रफ कॉपी के जैसा ..
मेरे वज़ूद का भी हो गया दमन !!

और ..
आज पड़ा हुआ हूँ ..
देश के एक कोनें में ...
बिलकुल रद्दी की टोकरी जैसा  ...
बदबू देता हुआ ..सड़ा गला ..
जिसे देख ..रद्दी वाला भी ..
नाक भों सिकोड़ ...निकल जाता है -
लतियाता हुआ !

आज सोचता हूँ कि ..
काश ;
किसी की 'फेयर कॉपी' का ..
हिस्सा बन पाता तो ..
आज ये हाल ..
न हुआ होता ...
और मैं ..
बेहाल न हुआ होता !

Sunday, October 1, 2017

और ऐसे कट गया इक जीवन सफर !!

फासले थे तो रास्ते बने !
रास्ते बने तो होंसले मिले !
होंसले मिले तो पंख उगे !
पंख उगे तो उड़ान भरी !
उड़ान भरी तो आकाश मिला!
आकाश मिला तो लक्ष्य सधा! लक्ष्य सधा तो मंज़िल मिली !
मंज़िल मिली तो ख्याति मिली !
ख्याति मिली तो अहं जगा !
अहं जगा तो फासले बने !
फासले बने तो ..
फिर रास्ते बने !!

और ऐसे कट गया इक जीवन सफर !!

Thursday, September 21, 2017

वो भी क्या उम्र थी ..क्या ज़िद्द थी !

वो भी क्या उम्र थी !
वो भी क्या ज़िद्द थी !

मैं ..
तुम्हें पाना और ..
पा कर रखना चाहता था ! और तुम ;
मुझे पाना और ..
पा कर खोना !

न मैं ; तुम्हें पा पाया और ..
न तुम; मुझे खो पाईं !

बस ..
"पाने खोने में गुज़र गई ज़िन्दगी ;
बिन तेरे !"

Wednesday, September 13, 2017

रातरानी की यादें!

"वक़्त बेवक़्त ..
निकल पड़ती हो तुम;
बिन सोचे कि-
रात को तफरीह नहीं करते !

वरना यह काली रात भी न बेवजह ..
मुँह लग जाती है ;
कमबख्त !

बैठ जाती है ..
यादों का पुलिंदा लिए ..
रात भर बांचने को ..
फ़िज़ूल में !

तुम भी बदली नहीं न ?
मेरी तरह बेशरम ही रहीं !"

Tuesday, September 12, 2017

आहिस्ता ..आहिस्ता !

उम्र बीत रही है; आहिस्ता ..आहिस्ता !
मोहब्बत भी हुई; आहिस्ता .. आहिस्ता !
बेवफाई भी गले लगी; आहिस्ता ..आहिस्ता !

हाथों की लकीरों में समाये लोगों ने-
घूंघट उठाये; आहिस्ता ..आहिस्ता !

अपने बिछड़े; आहिस्ता .. आहिस्ता !

नईं कोंपलें...किलकारी संग आईं; आहिस्ता...आहिस्ता!
कोंपलें ..पौधे ..फिर वृक्ष बने; आहिस्ता ..आहिस्ता !
हम वटवृक्ष बने; आहिस्ता .. आहिस्ता !

वटवृक्ष गिरने लगा; आहिस्ता ...आहिस्ता !

गिरे वटवृक्ष के तले, नई कोंपलें फूटी; आहिस्ता .. आहिस्ता !

और कुछ ऐसे ही ;
ज़िन्दगी कट गई ...
आहिस्ता ..आहिस्ता !

शायद कभी ..भगवान् के भी ..
दीदार हो जाएंगे;
आहिस्ता ..आहिस्ता !

[Garvit Gaurav]

Saturday, September 9, 2017

सफेदपोश दीमक को वर्दी वाले शेर का पत्र !

"ऐ सफेदपोश इंसा !
उड़ जाएगा तू भी ..
राख की तरह
एक दिन ..एक पल में ..
जब वक़्त ..
रुखसती का आएगा !

किस हैसियत से ..
तू इतरा रहा है ..
इस दुनियाँ में ?
जब कि ..
तेरी औकात ..
इतनी भी नहीं कि -
नसीब हो मौत
तिरंगे से लिपट कर !

खद्दर के ..
कुर्ते और पजामे में ..
तू सोचता होगा ..खुद को ..
गरीबों का रहनुमाँ पर
हक़ीक़त में तू ..
वो दीमक है -
जिसका बस चले तो ..
इस देश को भी ..
कुतर जाए !

अक्सर ..
रात के रतजगों में ..
सीमा पर ..
तेरे जैसे गद्दारों को ..
तकते और भूँजते हुए ..
याद आ जाता है ; तू ..
आलिशान मकां के ..
आलिशान सोफे पर ..
लुढ़का हुआ सा और
मन खटास से ..
भर जाता है !

कभी कभी तो ..
मन कहता है कि -
तुझसे कह ही दूँ कि ..
अगर कभी ..
ख़ाक ऐ वतन हो जाऊं तो ..
मेरी मिटटी पर ..
फूल न चढ़ाना !"

"तेरे फूलों से ..
मेरी कुर्बानी ..
व्यर्थ न हो जाए !"

Friday, September 8, 2017

सैनवा के भरत अभिमन्यु !

"चलो युवराज भवन के 
उस मोड़ से ..
फिर से ‪शुरू करें; 
जिन्दगी‬ !
जहाँ हर ‪‎पल‬ हसीन था .. और ..
हम तुम थे ..
इक अजनबी !!"

तुम एक 'अभिमन्यु' थे 
और 
मैं सिर्फ 'भरत' !

तुम अभिमन्यु की ..
गुलाबी लिपस्टिक थे !
और हम ..
भरत के बेंगनी फूल !

चाय की केतली के ..
'खट' की आवाज़ से ..
भाग जाती थी ...
नींद सारी ...और 
ज़िन्दगी दौड़ पड़ती थी .. 'क्रॉस कंट्री' करने ...
सिविल लाइन्स ..बोदा बाग़ ..साहू शॉप से स्टेडियम तक के ..
चौबारों में !

कुछ ऐसी थी ..
अपनी ज़िन्दगी ..
युवराज भवन के ..
बड़े बड़े गलियारों में !

छोटे थे न ..
कभी आंसू पोंछ लेते थे .. 
युवराज भवन की दीवारों में! 
तो कभी कभी ..
खुशियां समेट लेते थे ..
छोटे छोटे ..
तीज त्योहारों में !

कुछ ऐसा था ..
बचपन अपना ..
भरत अभिमन्यु की ..
चौपालों में !

गिलास की चाय में ..
डूब जाता था ..बिस्किट !
और नानखटाई थी ..
आज की ..
पित्ज़ा और बर्गर !

गले की एक डोर से ..
लटकी रहती थी ..
उस संदूक की चाबी ..
जिसके अंदर ..
माँ के हाथों की गुझिया ..
बुझा देती थी ..
घर की यादें और ..
पापा के ..
जल्दी आने के वादे !

गुज़र गया वक़्त ..
फूटबाल मैच की तरह !
और ..
ज़िन्दगी की जद्दोजहद में ..
संघर्ष और जय-विजय के शंखनादों के ...
उत्तरार्ध में ..
रह गईं ..
हमसभी की ..
धुंधली यादें ;
कभी न ..
बिसरने के लिए !

बहुत कुछ है ; दोस्तों ..
ज़िन्दगी में !
या ये कहो ..
सब कुछ है ज़िन्दगी में !

पर एक बात कचोटती है ..
रोज़ ;
हम तुम ..
अब साथ नहीं हैं ; 
ज़िन्दगी में !"

[GAURAV!]🍃🍂🙏🍃🍂

Wednesday, September 6, 2017

बम्बरबैनी ग्रेनाइट लीज के खिलाफ नगर के युवाओं ने निकाली मोटर साइकिल रैली और नगर पंचायत अध्यक्ष का किया घेराव !

लवकुशनगर!
आज करीब एक सैकड़ा युवाओं के जत्थे ने नगर पंचायत कार्यालय में जाकर बावनवेणीं पहाड़ी से लगी हुई पहाड़ियों की ग्रेनाइट उत्खनन लीज के प्रस्ताव पर नगर पंचायत परिषद द्वारा स्वीकृति देने के मुद्दे के खिलाफ सवाल जवाब किये और विरोध में मुर्दाबाद के नारे लगा कर नारेबाजी भी की। परिषद अध्यक्षा के न मौजूद होने पर पूरी भीड़ ने अध्यक्षा कुसमा अनुरागी के निवास की और रुख किया और उनके घर के बाहर जमकर नारेबाजी की। अध्यक्षा ने पहले तो खिड़की बंद की फिर दरवाज़े भी  बंद कर लिए। आम जनता अपनी अध्यक्षा की बाट जोहती रही मगर वे निकल कर नहीं आईं। फिर जनता ने अध्यक्ष प्रतिनिधि रामकिशोर अनुरागी से फोन पर बात की तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वे अतिशीघ्र परिषद की बैठक बुलाएंगे और लीज निरस्त करने की कार्यवाही करेंगे। 

"अपनी जान दे देंगे ;बम्बरबैनी माता की चट्टानों को न बिकने देंगे। " जैसे उद्घोषों के साथ ये युवा पुलिस थाने एवं वन विभाग के कार्यालय भी गए जहां उन्होंने लीज की हुई पहाड़ी पर से हरे भरे वृक्षों को बिना अनुमति काट दिए जाने की शिकायत भी दर्ज करवाई और जांच की मांग की। 
लवकुशनगर में दिनों दिन लीज के खिलाफ आम जनमानस में जागरूकता आ रही है और लवकुशनगर समेत पूरे अनुभाग में विरोध के स्वर आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं !
कुछ वरिष्ठ भाजपाइयों ने माननीय संगठन मंत्री से भी उन भाजपाईयों की शिकायत करने की बात कही है जो पर्यावरण और उत्खनन जैसे गंभीर मुद्दों पर नगर की इच्छा से परहेज़ कर के ग्रेनाइट व्यापारी का साथ दे रहे हैं !
माता बम्बरबैनी आंदोलन को प्रमुख रूप से नेतृत्व प्रदान कर रहे संजू बाबा ने कहा है कि -"नगर की जनता बड़े गौर से अपने चुने हुए नुमाइंदों को देख रही है और उनका ग्रेनाइट व्यापारी से घालमेल छुपा नहीं है। यदि यही हाल रहा तो आगामी विधानसभा एवं नगरीय चुनावों का जनता बहिष्कार भी कर सकती है और उनको सबक भी सीखा सकती है जो -माता सीता और उनके पुत्र लव-कुश के क्रीड़ा स्थल को नस्तनाबूत करने का घ्रणित प्रयास कर रहे हैं।"
"मैं बाहर हूँ। मुझे फोन पर सम्पर्क किया था। लीज को निरस्त करवाने के लिए परिषद की बैठक सहित सभी आवश्यक कार्य किये जाएंगे। "
[रामकिशोर  अनुरागी -अध्यक्ष प्रतिनिधि एवं कांग्रेस नेता !]

Monday, September 4, 2017

मिट्टी के फूलों का अपने वटवृक्ष को संदेश !

आदरणीय गुरुजन!
दो शब्द आपको न्योछावर !

"पिता न होकर भी; पिता !
माँ न होकर भी; माँ !
सूर्य न होकर भी; प्रकाश !
वक़्त न होकर भी ;भविष्य!
ज्योतिषी न होकर भी वर्तमान बांच कर ज़िन्दगी संवार देने वाले पंडित !
आदरणीय श्रद्धेव गुरुजनों को सर रख कर कोटि कोटि प्रणाम !!
'आपके दिए पंखों ने अब विस्तारित हो कर -डैनों का रूप ले लिया है !'
'आपके अंकुरित स्वप्निल ख़्वाबों ने ...
यथार्थ रूपी सफलता का रसपान करना शुरू कर दिया है !'
'सफलताओं के कण कण में माँ पिताजी के साथ आप विराजमान हैं !'
'कोटि कोटि नमन ..
ज़िन्दगी में आने का और ज्ञान रौशनी बन अपने सम्पूर्ण वज़ूद के साथ ...
हम सभी में समा जाने का !'
आपके सदैव -
(मिटटी के फूल !)

Saturday, September 2, 2017

Although I am Slow but at least I am Running!

कश्तियाँ खेते रहो ..
किनारे मिल ही जाएंगे !

मोहबत्तें करते रहो ..
निभाने वाले मिल ही जाएंगे !

सच के साथ चलते रहो ..
झूंठे फिसल ही जाएंगे !

अंधेरों को नकारते रहो ..
उजाले मिल ही जाएंगे !

दर्द सहते रहो ..
हमदर्द मिल ही जाएंगे !

और ..
ख्वाब संजोते रहो ..
एक दिन सच हो ही जाएंगे !

Sunday, August 27, 2017

रोटी और रोज़गार !

"बहुत कोशिशें की ..
रोज़ ; खुद को मार कर ..
फिर ज़िन्दगी ..
एक नए सिरे से ..
शुरू करने की !
मगर रोज़ ..
उगती सुबह की मानिंद ..
बच्चों की भूंख बन ..
उनके ख्वाब बन ..
तुम बार बार ..
आ धमकती हो ..
मेरे मृतप्राय वज़ूद में !
और ; बेशर्मी से -
मैं पुनः जी उठता हूँ ..
तेरे तिलिस्म की आग में  ..
और ..पुनः जुट पड़ता हूँ ..
कुछ कर गुजरने की खातिर ..
जबकि ..
ये पक्का पता है कि -
अगली शाम को ..
फिर मरना है !"
[शानू !]

Thursday, August 24, 2017

गंतव्य @६०

"पहुंचने वाला हूँ ;
मैं भी साठ पर!

गौर करूँगा ...
जीवन में पढ़े ...
हर इक पाठ पर !

कभी ...
सूर्योदय का ..
नमन किया था !
अब सूर्यास्त का ...
गमन करूँगा !!

मुझे पता है ...
यह जीवन चंचल !
सदा मचाता रहता ...
हलचल !
पलपल उसमें होता ... कलकल!
फिर भी मेहनत ...
नहीं होती ..

निष्फल !
[SHANU!]

Tuesday, August 22, 2017

खजुराहो को लेकर एक लेखक के उदगार जो भाषण न बन पाए !

आदरणीय महानुभावों !

जय राम जी की  !
(यह चन्देलवंशीय परंपरा है ;जिसमें हम अपने मेहमानों का स्वागत "जय राम जी से करते हैं !")
आप सभी स्वप्नदृष्टाओं का इस खजुराहो की पावन स्थली पर मैं ह्रदय से स्वागत करता हूँ !

  • मैंने "डॉमेस्टिक टूर ओपेरटर या ट्रेवल एजेंट " को स्वप्नदृष्टा इस लिए कहा है क्यों की - हम उस विधा में कार्यरत हैं ;जहां किसी भी गंतव्य या कार्यक्रम का स्वप्न या ख्वाब हमारा सम्मानित अतिथि देखता है और उसे सजीव और साकार हम करवाते हैं।
  • हमारा काम कम जोखिम भरा नहीं है। हमारा प्रयास और कर्तव्य होता है कि -जब पर्यटक अपने घर लौटे तो भारतीयता से ओतप्रोत संस्कारों ,मधुर स्मृतियों ,ज्ञानार्जन ,एवं मनोरंजन तथा पैसे के वास्तविक सदुपयोग की भावना के साथ लौटे। पग पग या डग डग पर हमें जिम्मेवारी से सम्मानित अतिथियों की ख़ुशी के लिए कार्य करना पड़ता है।
  • आज आप सभी हमारे खजुराहो में पधारे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे -खजुराहो एक "ग्लोबल विलेज" में तब्दील हो गया है और "वसुधैव कुटुंबकम" की परिभाषा को चरितार्थ करते हुए खजुराहो और समूचे मध्य प्रदेश को "पर्यटन से परिवर्तन" जैसी संकल्पित  भावना से आप सभी अपना अनुभव एवं आशीर्वाद बांटने यहां पधारे हैं। हम आभारी हैं ;धन्य हैं और कृतार्थ हैं।

हमें अहसास है की आपको यहां तक आने में कठिनाई आई होगी  ....
सफर थोड़ा थकान वाला रहा होगा  ....
लेकिन जब भावना शुभ हो ;तो ईश्वर भी कुछ चुने हुए दुःसाहसी लोगों को ही जटिल कार्य के लिए चुनता है !
  • भागीरथ मुनि का कार्य जटिल था लेकिन वे माँ गंगा को पृथ्वी पर लाये !
  • राष्ट्रपिता बापू का कार्य भी ही जटिल था लेकिन वे भी लाठी लेकर निकल पड़े।
ऐसे ही -खजुराहो को पर्यटन के मंच पर उचित स्थान दिलवाने के लिए आज इस शुभ घडी में आप सभी का यहाँ इकट्ठा होना भी एक अविस्मरणीय पल है जिसे आने वाला समय साबित करेगा।
मित्रो !
कभी कभी सोचता हूँ कि - आप पूँछ सकते हैं कि -खजुराहो में ऐसा क्या है जो विलक्षण हो ?
मंदिर और उसकी कामुक मूर्तियां ;और क्या ?
हम कैसे अपने पर्यटक को प्रेरित करें -खजुराहो जाने के लिए ?
जहां एक रात तो टूरिस्ट मुश्किल से रुकता है ;आप कहते हो -खजुराहो -Is  a 02 Nights Destination ? कैसे ?
आदरणीय अतिथियों !
खजुराहो असल में एक ज़िन्दगी है।
एक किताब है जो अन्य किताबों से जरा हट कर है।
जब आप खजुराहो की किताब को जानेंगे तभी वो अदृश्य आने वाला संभावित टूरिस्ट भी जान पाएगा की खजुराहो आना ज़िन्दगी में एक बार क्यों जरूरी है?
माना कि -मेरे खजुराहो में -
  • हरी भरी वादियां नहीं हैं  ....
  • ऊँची ऊँची हिमाच्छादित चोटियां नहीं हैं  ....
  • कल कल करते झरने नहीं हैं  ....
और
  • अथाह समुन्दर का नीला पानी भी मेरे खजुराहो में नहीं है  ...
इतनी सब कमियों के बावजूद भी
खजुराहो क्यों -Incredible या अतुलनीय है ?
मित्रो !
खजुराहो !
 एक ऐसा destination जिसमें एक पूरी ज़िन्दगी का फलसफा समाया हुआ है !
Its not only an Honeymoon Destination but a Complete Experience of the Human Behaviours !


  • आपने देखा होगा -

खजुराहो के प्रत्येक मंदिर एक चबूतरे पर या ऊंचाई पर स्थित हैं।

  • ये ऊंचाई प्रदर्शित करती है -मिट्टी से उपजे मानुस की ऊंचाई पर पहुँचने की जिजीविषा की।
  • ये ऊंचाई दिखाती है -मानव के जमीन से शुन्य में विलीन हो जाने के सत्य की।
  • ये ऊंचाई प्रदर्शित करती है -किसी ऐसी शक्ति के अस्तित्व की जो किसी अज्ञात ऊंचाई पर विराजमान है और यह व्यथित मानव मन उस ऊंचाई के साक्षात्कार के लिए चढ़ता जाता है असंख्य सीढ़ियां।

  • आपने यह भी देखा होगा कि -

 हमें मंदिर में पहुँचने के लिए सीढ़ियों को पार करना पड़ता है -
असल में ये सीढ़ियां हमारी ही जीवन यात्रा की -Milestones हैं ;जो वर्णन करतीं हैं हमारी जन्म से लेकर शुन्य में विलीन हो जाने वाली यात्रा वृत्तांत की कहानी का।

  • पहली सीढ़ी में -जन्म है तो दूसरी में बालपन  .....
  • तीसरी और चौथी सीढ़ी में किशोरावस्था के पल हैं तो पांचवी छठवीं में सीढ़ी में युवावस्था के क्षण।युवावस्था कुछ संघर्षमय हो सकती है तो कुछ लम्बी यात्रा है  ....
  • फिर हम सातवीं आठवीं सीढ़ी में हम मानव जन्म के सबसे कठिनतम पड़ाव पर प्रवेश करते हैं जहाँ ग्रहस्थ आश्रम का पड़ाव हमारा इंतज़ार कर रहा होता है।इसी सातवीं और आठवीं सीढ़ी से हम ईश्वर और उसके अस्तित्व तथा आध्यात्म जैसे विषयों  से परिचित होते हैं।

गृहस्थी  ...
गर्भवती स्त्री  ...
गर्भस्थ शिशु  ....
जैसे कठिन शब्दों से हम इन्हीं सीढ़ियों पर परिचित होते हैं।
दरअसल में हमारी इस जीवन यात्रा और सीढ़ियों पर चढ़ने का उद्देश्य और कुछ नहीं  ..... ऊपर मंदिर में..... प्रदीक्षणापथ उपरांत -गर्भ गृह में विराजे साक्षात ईश्वर से दर्शन करना ही तो होता है।
तो हम कह सकते हैं कि -गृहस्थ आश्रम -गर्भवती स्त्री -गर्भस्थ शिशु से शुरू हुई यह यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर वानप्रस्थ और संन्यास की सीढ़ियों को पार करते हुए मंदिर के गर्भ गृह में विराजमान ईश्वर के दर्शन उपरांत सम्पन्न होती है।
माँ के गर्भगृह से जीवन की उत्त्पत्ति होती है तो उसी जीवन से "माँ-पिता" शब्दों की भी उत्पत्ति होती है।
तो हमने माँ के गर्भगृह से जीवन को उत्पन्न किया और मंदिर के गर्भ गृह में ईश्वर को स्थापित।
कहीं न कहीं गर्भगृह से ईश्वर और जीवन के चिंन्ह आपस में उलझे हुए हैं ;जिन्हें इस धरती पर सैकड़ों ऋषि मुनियों ने या वैज्ञानिकों ने खोजने का प्रयास किया और आज भी खोज जारी है।
 परम आदरणीय अतिथियों  !

  • यह है खजुराहो के मंदिरों का यात्रा वृत्तांत।
  • खजुराहो के शिल्पी के हथोड़े और छैनी का मौन सन्देश !
  • कामुक पचीगिरी और प्रेमालाप रत मूर्तियों के पीछे छुपे भाव और रहस्य का ज्ञान !

सिर्फ मैथुनरत मूर्तियों में न तलाशो खजुराहो को
 सिर्फ कामुकता की नज़र से न देखो खजुराहो को  ...
और बहुत कुछ है खजुराहो में  ....
कामुकता सिर्फ जीवन का एक अध्याय है जो हर किसी के जीवन में आता है और धीरे से चला जाता है। इस अध्याय के पीछे  छुपा सन्देश समझना होगा कि -"जीवन की आपाधापी में हम इस अध्याय से भी गुजरते हैं जो हमारी यात्रा का यह महज एक पड़ाव है और लक्ष्य तो गर्भ गृह में बैठे साक्षात ईश्वर से मिलना है। "
खजुराहो का सिर्फ यह सन्देश है कि -
आओ ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करते हुए खजुराहो के मंदिरों में उकेरी गई प्रणयरत मूर्तियों के सन्देश को एकाकार करते हुए जीवन में प्रेम घोलें और उसे लेकर वानप्रस्थ से संन्यास की और प्रस्थान करें।
"खजुराहो कहता है कि -प्रणय तो सभी जीव करते हैं परन्तु उनके और मनुष्य के प्रणय में भाव की प्रासंगिकता महत्वपूर्ण है। वे सिर्फ प्रणय करते हैं और वहीँ हम प्रणय से ईश्वर को तलाशते हैं।
तो मित्रो यह है -"खजुराहो " का प्रणयरत भाव !"

खजुराहो अपनी विविधता एवं सौंदर्यता के लिए विश्व विख्यात है।मैं प्रकाश डालना चाहूंगा उन विषयों पर जो खजुराहो को Domestic Tour Operators के  Business हेतु पसंदीदा Destination बनाते हैं :

  • जहां एक और खजुराहो अपने गर्भ में भरतेीयता की सांस्कृतिक धरोहर ,मध्यकालीन इतिहास और चन्देलों  की वीरता को समेटे हुए है वहीँ  प्राकृतिक सम्पदाओं एवं सौंदर्य भी अछूता नहीं है।
  •  भारत की एकमात्र हीरे की खदान -पन्ना हमसे मात्र 45 kms दूर है। 
  • मैहर की माँ शारदा ,श्री राम मय -चित्रकूट , कालिंजर ,धुबेला जटाशंकर-भीमकुण्ड और ओरछा Destination Khajuraho की Itinerary में Main Attractions हैं। 
  • Eco Tourism और Tiger Safari  के लिए भी Panna National Park के  हम Arrival Point हैं।  
  • Its also -One of the best Lonely Tourism Destination in India . Lonely Destination अर्थात एकांकी पर्यटन !
इस भागम भाग ज़िन्दगी में कभी कभी मनुष्य थक कर बिलकुल अकेला रहना चाहता है जहां कोई उसे बाधित या disturb न करे। रिटायरमेंट के करीब या सेवा से रिटायर्ड अधिकारी कभी कभी थक जाते हैं -अपने चिरपरिचित -"साहिब सलाम या नमस्ते सर से !" उन्हें लगता है कि उतार कर यह अफसरी का लबादा फैंक दें और लुंगी या कुरता पाजामा में दुबारा आ जाएँ उसी पड़ाव पर जहां से शुरू किया था ये सफर। मैं अनेकों ऐसे "Corporate Clienta " या Government Officers से मिला हूँ जिन्हें खजुराहो आकर बिंदास सुकून का अहसास होता है। कुछ तो ऐसे भी लोग यहां आने लगे हैं जो रनेह फाल्स के पास बैठ कर अपनी स्वयं की जीवनी भी यहां लिखते हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि -खजुराहो वर्तमान में बेहतरीन सुरक्षित एकांकी पर्यटन का Destination Develop हो रहा है।
  • उसी प्रकार MICE  या Meetings -Incentives-Conferences और Exhibitions के लिए भी खजुराहो भारत का सर्वाधिक पसंद किये जाने वाल Destination बन कर उभर रहा है। कल्पना कीजिये या कहिये कि यह असम्भव है  कि -ललित -ताज -रेडीसन -रमाडा -क्लार्क्स जैसी विश्व ब्रांडों एवं MP Tourism के बेहतरीन होटल आपको विश्व में कहीं भी तीन स्क्वायर किलोमीटर के रेडियस में किसी destination में मिल जाएँ ? लेकिन खजुराहो में यह संभव है। साथ ही साथ इसी तीन किलोमीटर के रेडियस में अन्य Budgeted Hotels भी आपको मिल रहे हैं। अतः मैं आह्वान करता हूँ कि -खजुराहो को आप सभी ट्रेवल एवं टूरिज्म ट्रेड के पारखी लोग उस नज़र से भी देखें जहां सारा आकाश अपने चाँद और तारों जैसे सर्वसुविधायुक्त होटलों को अपने आँचल में टाँके हुए मात्र तीन किलोमीटर में उप्पलब्ध है। 
  • शादियों के लिए भी खजुराहो एक उभरता हुआ Wedding Destination बन कर उभर रहा है। क्यों न अपने वैवाहिक जीवन के शास्वत बंधन -"खजुराहो से शुरू किये जाएँ -जहां प्रेम और मानव मन की असंख्य गुत्थियां अपनी लाज ,लज्जा,शर्म ओ हया के साथ मंदिरों के पत्थरों पर चस्पा हैं ;अपने निर्मल निष्छल रूप में।

इन सभी कार्यक्रमों के  सफल आयोजन के लिए आपको पूर्णतः Professional & Competent Transport Handling की भी जरूरत होगी और मैं विश्वास के साथ दावा करता हूँ कि -खजुराहो में हमारे Travel Agents अपनी Luxury Fleet के साथ आपके लिए हर पल तैयार हैं। फिर चाहे -Volvo Buses हों या Tempo Traveller की जरूरत हो या Luxury Sedans की  .... खजुराहो आपको निराश नहीं करेगा !इस बात का भी समर्थन करना चाहूंगा कि -मेरे खजुराहो के Drivers भी पूर्णतः सेवाभाव से संकल्पित हो कर अपनी duty करते हैं एवं Complaint की गुंजायश नहीं रहती है।
  • हम जानते हैं कि -एक विदेशी के मन में क्या चल रहा है  .... वो क्या चाहता है और हमें क्या करना चाहिए ; क्यों कि -Yes !We have an Experience to handle the Inbound Traffic since last 05 Decades !
We fully understand the Depthness and the meaning  of the words -Commitment ,Trust & Honesty !


कुछ नए क्षेत्र के अतिथि भी आज कल खजुराहो आना पसंद कर रहे हैं।

  • Architectural Field के Engineering Students ,
  • BEd ,DEd एवं MBA कर रहे छात्र अपने Educational Tour पर। 
  • देश की सेवा कर रहे फौजी भाइयों को या अफसरों को भी खजुराहो बहुत भा रहा है या रूटीन लाइफ से हट कर कुछ पल सुकून के दे रहा है। 

हम इन sectors पर भी ध्यान दे सकते हैं।

शताब्दी एक्सप्रेस जैसी fast Trains ,Bhopal से connectivity , Domestic Flights में इजाफा  और connectivity में सुधार के लिए खजुराहो हाथ जोड़े खड़ा है। हमें पूर्णतः विश्वास है कि -मेरे खजुराहो को न्याय मिलेगा।

अंत में मैं निवेदन करता हूँ कि -
आइए हम संकल्प लें कि हम -Destination Khajuraho को सुरक्षित रूप से आगे आने वालीं भावी पीढ़ियों को उस रूप में सौपेंगे कि वे भी भविष्य में कभी कहेंगे की -"हमारे बुजुर्ग वाकई -स्वप्नदृष्ठा थे।उन्होंने हमें एक सुरक्षित और संरक्षित खजुराहो सौंपा !
मेरे को सुनने के लिए  ...
आभार  ... दिल से।
जय हिन्द !
जय भारत !
भारत माता की जय !


काश मैंने भी ..शौकिया मोहब्बत की होती !

"काश मैंने भी -
शौकिया महोब्बत की होती!
न दिल का मामला होता!
न दुआओं की तक़ल्लुफ़ होती!
न आंसू लुढ़कते!
न दिल धड़कते!
रुसवाईयाँ और खामोशियों ...
बहुत दूर खड़ी होती !
मैं मुस्करा रहा होता और
ज़िन्दगी बड़ी होती !
काश मैंने भी ..
शौकिया मोहब्बत की होती !"
(SHANU!)

Sunday, August 13, 2017

जिस पहाड़ी पर माँ सीता के साथ लव-कुश पले बढ़े उस पहाड़ी को ग्रेनाइट उत्खनन हेतु लीज पर न देने की अपने माननीय प्रधानमंत्री जी से विनती !!

आदरणीय प्रधानमंत्री जी !
सादर चरण स्पर्श !!
स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाएं !!
हे मेरे राष्ट्र पालक !
मन बेहद बोझिल है ! मेरे कस्बे लवकुशनगर जिला छतरपुर ( मध्य प्रदेश ) की २५००० की आबादी के मध्य बसी हुई धार्मिक तीर्थ माता बम्बरबैनी की पहाड़ी के पीछे का हिस्सा ग्रेनाइट उत्खनन के लिए राज्य शासन ने लीज पर दे दिया है !
'इस पहाड़ी पर माता सीता ने रामायण काल में लव और कुश को पाला था जिसके फलस्वरूप इस नगर का नाम -लवकुशनगर पड़ा है ! पूरी पहाड़ी माता सीता एवं हनुमान जी के मंदिरों से अटी  पड़ी है !'
इस हरी भरी पहाड़ी पर हज़ारों प्रजातियों के जीव जंतु निवासरत हैं जिनका कोई खेवनहार नहीं है जो उनकी करुण पुकार शासन तक पहुंचाए !
मैं भी सांसारिक दबावों में एवं  पारिवारिक जिम्मेवारियों से इस मुहीम में अब हताश सा होने लगा हूँ ! हम प्रयासरत हैं कि -'भगवान राम एवं माता सीता से जुड़े हुए स्मृति अवशेष धरोहरों के रूप में जीवंत रहें ! बस इतना सा प्रयास है !'
आखिरी 'आस' आप से ही है कि शायद मेरी विनती पर आपकी नज़र पड़ जाए और आप इस अदभुत पहाड़ी को बचाने के आदेश दे दें !
माननीय !!
लीज की हुई भूमि का खसरा नं .५९३ है एवं वह माता बम्बरबैनी एवं आबादी से सटी हुई है ! पूरा गांव दुखी है मगर सक्षम दबंगों ने हमें मुँह बंद करने की धमकी दी है ! आप राष्ट्र के पिता है ! मैं व्यक्तिगत तौर पर रात दिन दुनियां से आपकी नेकियत पर बहस करता रहता हूँ ! आपके लिए मैंने अपने व्यक्तिगत ब्लॉग -[www .bundelidhamaka .blogspot .in ] पर सैकड़ों लेख और कविताएं लिखी हैं !
बहुत आशा से पत्र सम्प्रेषित कर रहा हूँ कि - 'शायद आपकी नज़र पड़ जाए और आप जांच का आदेश दे दें !'
स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाओं सहित -
आपका -
गौरव खरे
संवाददाता -दैनिक भास्कर
लवकुशनगर जिला छतरपुर (मध्य प्रदेश )
मोबाइल -९८९३८६८७१०
[indiawithgaurav@gmail .com]

Friday, August 11, 2017

शांति की खोज में .. एक आईएएस की आत्महत्या !

शायद इसी लिए फौज में अफसर बनने से पहले 'साइकोलिजिकल टेस्ट' होता है जिसने व्यक्ति के मानव मन चित्त और चिंतन के साथ मनोबल को देखा जाता है ! यह भी देखा जाता है कि -'राष्ट्रसेवा में कालान्तर में यह टूट तो नहीं जाएगा ?"
कुछ ऐसा ही टेस्ट 'आईएएस'  में भी लागू करना चाहिए !
उन्होंने जो किया उससे उन्हें खुदा मिला हो या न मिला हो परन्तु उनके परिवार को अवश्य कभी न भरने वाला जख्म वे दे गए ! एक अभिशप्त पत्नी और पुत्री सदा डबडबाई आँखों से उस माला चढ़ी फोटो को निहारा करेंगे जिसे वे दोनों 'पति और पिता' कह कर ताउम्र पूजेंगे !
मुकेश पांडेय जी चले गए !
जाना सभी को है !
"कोमा फुलस्टॉप के बाद शून्य में तो सभी को विलीन हो जाना है !" जैसे आध्यात्मिक बातों के  साथ ज़िन्दगी जीने में मज़ा है मगर आध्यात्म से मोक्ष और परम् ब्रह्म के ज्ञान की खोज में 'आत्महत्या' बेसिरपैर की बात है !!
खैर ...
"एक अच्छे इंसान का बुरा फैसला !
एक आईएएस का घटिया फैसला !
एक पिता का पितृत्व से परे फैसला और
एक पति का बहुत ही प्रलयकारी फैसला !!
"परेशां तो सभी हैं लेकिन उसका सबब मौत नहीं !!"
नमन उनकी आत्मा को !
ईश्वर साहस दे उस परिवार को जिसे श्री पांडेय बेमौत मार गए !
मुझे विश्वास है कि -उनकी पत्नी इस सदमे से उबर कर साबित करेंगी अपना वज़ूद !

Thursday, August 3, 2017

जुदा जुदा सी उम्र के ..जुदा जुदा से चाँद !

"चाँद की शीतल हवा और ..
ये बहती पुरवाई !
मेरा ढलता कुम्हलाता ...
स्पंदित निर्लजः यौवन और ..
सौगात में -
तुझसे मिली ये तन्हाई !!
उस पर ...
बार बार उचट कर ..
तेरी तरफ जाता मन ;
जैसे तूने हों फिर ...
मेरी जुल्फें ...
अभी अभी ;लहराई !!

कितनी बार ...
मन-मंदिर और मुरादों को ..
बता चुका हूँ कि -
अब मैं 'मुक़म्मल' आदमीं हूँ!
कोई ...
अपने 'वज़ूद' को ...
तलाशती परछाईं नहीं ;
जो हर चूड़ी में ...अपने लिए ...
खनखनाहट और
बिंदी में प्यार ..
तलाशते फिरे !!

लेकिन ;
यह मानव मन भी न ..
बिलकुल बेशर्मी की ..
इन्तिहाँ है!

भूल कर भी ...भूलता नहीं !
और कभी कभी ...
याद कर के भी ...मिलता नहीं !!

जब छलकना हो तो ...
छलकता नहीं और ...
कभी बिछड़ना हो तो...
बिछड़ता नहीं !

लेकिन ;
यही ज़िन्दगी है !
जिसे भूलना है ...वह भूलता नहीं !
जिसे याद करना है ....वह करता नहीं !
जिसे खोना है ....वह पाता है !
और पाने वाला ;खोता !

ज्वार-भाटों की मानिंद ..
उतराता रहता है ..
यह जीवन तिलिस्म !
कभी उन्माद बन ...
तो कभी फसाद बन !!

और यही कुछ पल ..
तन्हाई में ..रुलाते हैं ..
बिन आसुओं के !

आज जाना कि -
इतनी रात गए...इतने बरस गए ..
ऊपर छत पे ...
तुम कैसे आ धमकी ...
होले होले से ..
बिन आवाज़ और ..मैं ;
रोक भी न पाया ...
तेरा वही ..
पुराना बेफिक्र अंदाज़ ??

चल ...
कश्तियों के लौटने का ..
समय हो गया है !
पलकें ...
चप्पू चलाने लगीं हैं और ..
तेरी छत से ..
उठी हवाएं भी अब ..
थक कर ..
मंद पड़ने लगीं हैं !

फिर किसी दिन ..
जब बच्चे सो जाएँ तो ..
उन यादों की मुडेरों पर ..
गुफ्तगूं करने ऊपर ..
जरूर चली आना !
जहां हम दोनों ..
सैकड़ों बार ..टूटते तारों के ..
साक्षी बने थे !!
शुभ रात्रि !!
(GARVIT GAURAV!)

Tuesday, July 18, 2017

स्व.राजेश खन्ना के मृत्यु पूर्व अंतिम शब्द- अब टाइम हो गया ; पैक अप!

स्व.राजेश खन्ना के मृत्यु पूर्व  अंतिम शब्द-
"अब टाइम हो गया ; पैक अप! "
आज ही के दिन सुपरस्टार @ राजेश खन्ना ;
धरती के ऊपर की यात्रा पूरी कर धरती के नीचे की अंतहीन यात्रा पर चले गए थे !
"नमन एक बेहतरीन कलाकार की बेहतरीन अदाकारी को और उनकी मुस्कान को !!"