कोई पीछे नहीं ...
न कोई आगे !
बस काला सा प्रारब्ध ...
और फीका सा ..भविष्य !
और मैं ..
डूबता पुच्छल तारा सा ..
निरे ब्रह्म्हाण्ड में ..
विचारों के गोते लगाता हुआ !
और ऐसे ही ..एक दिन
खो जाऊँगा ...
गंगा से गंगोत्री तक ..
बेनाम ..बेवक़्त ..बदनाम हो कर ..
अपने खट्टे मीठे ..अनुभवों के साथ !
फिर शायद ...
कभी मेरे बेटे और बेटी लगाएंगे ..
एक दो अगरबत्ती ..
मेरे फोटो फ्रेम पे और ...
टपका देंगे ..
दो बून्द आसुओं की ..
अपने पापा के ..
फोटो फ्रेम के शीशे पे ..
और कहेंगे -
चुप हो जाओ ..
देखो पापा जी मुस्करा रहे हैं !
बस ...
इतना ही जीवन है ..
और बाकी यथार्थ की ...
कटु मृत्यु !
आप अमर हो जाते हैं ..
अपने लाड़लों के ...
आसुओं में या ...
खो जाते हैं ...
यादों के अंधड़ में !!
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