"हताश ...
अपनी पराजय से नहीं होता !
हताश ...
उनकी जय से होता हूँ ..
जो मुझसे आगे निकल गए ..
दूसरे रास्तों से !
रास्ते तो एक थे ...
जो सत्य और मेहनत से ..
सफलता की ओर खुलते थे !
फिर वे ...
उन रास्तों से कैसे ...
लक्ष्य तक पहुंचे ..
जो गलत थे ?
ऊपर से उनकी जय जय कार ?
मैं कभी नहीं हार मानता !
क्यूंकि असल में ...
मैं कभी जीता ही नहीं !
बस ...
जीतने वालों के जतन से ...
खुद के जतनों की ...तुलना ..
अवश्य करने लगता हूँ ...
और ...
इसी तुलानत्मक अध्ययन में ..
जीतने वाले हो जाते हैं'-बेनक़ाब !
यदि जीतना ही सर्वोपरि है ..
तो फिर ..
गलत रास्ते ..गलत क्यों ??
और सही ...सत्य क्यों ??
जानते हो ...
जो अपनी मेहनत से ..
जीतता है ...
वह सिर्फ मुस्कराता है !
और गलत तरीके से ..
विजयश्री प्राप्त करने वाला ..
अट्हास से ...
जब मर्दन करता है तो ...
निस्तब्धता ...
उसकी गलत विजय की प्रमाणिकता बन जाती है !!"
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