Wednesday, October 4, 2017

रफ कॉपी सी ज़िन्दगी !!

रफ कॉपी सी गुज़र गई ज़िन्दगी !!
बेतरतीब बेपरवाह और बदरंग कवर सी !
खूब लिखा ..
खूब गोदा गया ..
और फिर रद्दी वाले के हाथों ..
बेशर्मी से बेच दिया गया !

पीछे के पन्नों में लिखते रहे हम ;
अपने अपने ख्वाब और ..
आगे के पन्नों को फाड़ते रहे -कि ..
किसी रोज़ न हो जाएँ ;
बेनक़ाब !

पीछे के पन्नों में ..
कितने दिलों को बेधा हमने;
तीरों से गोद गोद ..
और
ज़िन्दगी के पन्नों पे ..
कोरे रह गए ;
जैसे हों बिलकुल; अबोध !

बहुत से रॉकेट बनाये हमने पन्ने फाड़ के ..
पर कमबख्त :
किसी ने हमें ही फाड़ दिया ...
पहले चढ़ा कर ...
चने के झाड़ पे !

और कुछ ऐसे ही ..
बेसाख्ता ..
लोग मिलते गए ..
मेरे दिल की किताब से !

अपने दस्तखत करते गए ..
कभी दिल बना देते थे तो ..
कभी मिटा देते थे ..
बिलकुल निर्लजः बन !

मैं भी ब्लॉटिंग पेपर या सोख्ता बन ..
जज्ब करता गया ..
उनके जतन और
आखिर में ..
रफ कॉपी के जैसा ..
मेरे वज़ूद का भी हो गया दमन !!

और ..
आज पड़ा हुआ हूँ ..
देश के एक कोनें में ...
बिलकुल रद्दी की टोकरी जैसा  ...
बदबू देता हुआ ..सड़ा गला ..
जिसे देख ..रद्दी वाला भी ..
नाक भों सिकोड़ ...निकल जाता है -
लतियाता हुआ !

आज सोचता हूँ कि ..
काश ;
किसी की 'फेयर कॉपी' का ..
हिस्सा बन पाता तो ..
आज ये हाल ..
न हुआ होता ...
और मैं ..
बेहाल न हुआ होता !

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