Thursday, September 29, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक्स !बदली बदली सी भारतीय सुबह !

आज की सुबह ..
कुछ बदली बदली सी है !
क्या १५ अगस्त है ?
या २६ जनवरी ?
चाहे जो कुछ हो ..
लेकिन मेरी फितरत ..
और रंगत ..
कुछ बदली बदली सी है !

बहुत दिनों बाद ...
स्वाभिमान ..
सर चढ़ कर बोल रहा है !
देशप्रेम ;आज गदगद है !
और
पंछियों के पंखों की भी फड़फड़ाहट ....
कुछ कुछ ...
"वन्दे मातरम !"
सी धुन निकाल रही है !

आज "उरी" की ..
नव विधवाओं के ...
सूखे नंगे बिना चूड़ियों के हाथों ने ...
सुबह का खाना ...
जल्दी बना लिया है !

पितरों के अंतिम दिन ..
विदा ले रहे पूर्वजों से ...
"दिया और बाती" जलाये ...
ये सूनी मांगें ...
रुंधे गले से कह रही हैं की -
"हमने बदला ले लिया है ;
और आपकी शहादत ..
बेकार नहीं जाने पाई !"

बच्चे भी ...
सोच रहे हैं कि -
"पापा के जाने के ...
बहुत दिनों बाद ...
आज ;
माँ थोड़ा सम्भली है !"

सच !
आज फ़िज़ा ..
कुछ बदली बदली सी है !
तिरंगा कुछ ज्यादा ही ..
गर्वोक्तियों से अल्हादित हो ..
लहरा रहा है !

सच !
मेरा देश बदल रहा है !

Monday, September 26, 2016

देवानंद !तुझे जीवन की डोर से बाँध लिया है ...

प्यार की बात हो ...
आँखें मूंद कर ...
कुछ बीते लम्हें याद करूँ तो ...
सर्दियों में ...
गले में मफलर और कभी
स्कार्फ लपेटूं तो ...
हँसते हंसते ...
दर्द सहने की बात हो तो ...और
पापा के ज़माने के ..
उनके प्रिय फनकार की बात हो तो ...
सिर्फ एक अक्स ...
आँखों और दिल में बसता है ...
और वे हैं -
देव साहिब या देवानंद जी !
जिनका आज जन्म दिवस है !

क्या लिखूं क्या कहूँ ..
देवानंद के बारे में !

मुद्दतें गुज़र गईं ..
मोहबत्तें गुज़र गईं ..
मुसाफिर गुज़र गए ...
हम गुज़र गए और
बखुर्दार तुम भी ....
गुज़र गए लेकिन
ज़िंदा हैं आज भी
तुम्हारे अभिनीत नग्में ...
तुम्हारी अदाएं और
यादें !

आपके हैप्पी बर्थडे पर -
अश्रुपूरित श्रद्धान्जलि !

Monday, September 19, 2016

कुछ ऐसी न्यूज़ हैडलाइन चाहते हैं ;हम !नमस्कार !आज तड़के लगभग तीन बजे भारतीय बॉम्बर्स ने पाकिस्तानी सीमा में घुस कर लश्कर के ट्रेनिंग कैम्पस पर जबरदस्त बमबारी की !

कुछ ऐसी न्यूज़ हैडलाइन चाहते हैं ;हम !
नमस्कार !आज तड़के लगभग तीन बजे भारतीय बॉम्बर्स ने पाकिस्तानी सीमा में घुस कर लश्कर के ट्रेनिंग कैम्पस पर जबरदस्त बमबारी की !
फिदायीन की लाशें चारों तरफ पड़ी हुई हैं !
नवाजशरीफ ने इस हमले को शर्मनाक बताया है !
प्रधानमन्त्री मोदी ने इसे जंगली पागल नरभक्षी को मारगिराना बताया !

Thursday, September 15, 2016

तेरह दिन का साध्य और आज का असाध्य मानव !


अपनों के जाने के बाद के -
वे तेरह दिन ..
बमुश्किल कटते हैं ;
तेरहवीं तक ..
बिन प्याज और ...
छोंक बघार के ...
जुबां छटपटाने लगती है -
जैसे ;जल बिन मछली !

सिर्फ तेरहवीं तक ही नहीं ...
बल्कि अब तो ...
वे साल भी ..
बमुश्किल काटने और
झेलने पड़ते हैं ...
कुछ औलादों को ;
जब उनके पालनहार रिटायर हो जाते हैं !

अरे पुराने ज़माने के ...
खाये पिए आदमीं हैं ;
न दमा न खांसी न खुन्नस ..
बीपी और शुगर से भी -
बहुत दूर ..
लम्बा जीवन जीते हैं और ..
रिटायरमेंट के बाद ..
भगवान् के भजन में -
मगन रहते हैं !

अब ऊपर वाले का
बुलावा जरा देर से आये ;
तो वे बिचारे ...
क्या करें ??

फिर भगवान् भी न ...
जाने क्यों ...
गाड़ी के दो पहियों में से ..
किसी एक को ;
ले लेता है और -
बिचारा दूसरा ...
अकेला अधजली लाश सा ...
बीहड़ों में ...
सूखे ,जर्जर ,बंजर ,
बियाबान सी ज़िन्दगी ..
गुज़ारता है ...
और कुछ अपने ही लोग ..
उसके -ढलने ...
गिरने और रुखसती का ...
इन्तिज़ार करते हैं !

पढ़ने में जरूर बुरा
लगेगा लेकिन -
इस नई पीढ़ी में ...
लोग ;
माँ बाप से ज्यादा ...
अपनी कार और मोबाइल से;
प्यार करते हैं !

शायद मेरी पीढ़ी ..
वो अंतिम पीढ़ी थी ...
जो अपने माँ पापा से ..
तहेदिल से जुडी थी !

वर्ना आज ....
तेरहवीं और चालीसवें तक के
दुःख भरे दिन ...
बड़ी मुश्किल से कटते हैं !

Tuesday, September 13, 2016

हिंदी ! बिन तेरे .. मैं कुछ भी नहीं !

उस हिंदी को सादर नमन ..
जो अपने -
शब्दों के आँचल से ..
ढाँपे रहती है ;
मेरा अंतर्मन !
मेरा आत्मबल और
मेरी प्रासंगिकता !

हिंदी ! बिन तेरे ..
मैं कुछ भी नहीं !

माँ और पिता के -
जाने के बाद ..
बस एक "तू" ही है ..
जो सुख दुःख ,आशा निराश ,
सफलता असफलता और
प्रेम और नफरतों के ...
समंदर में गोते लगाते ...
मन और चेतना को
अपने शब्दों के गर्भ में
छुपे अर्थों से
सम्बल देती है और
ज़िन्दगी
गतिमान और चलायमान
बनाये रखती है !

Saturday, September 10, 2016

राष्ट्रवाद एक जीवनशैली !

डीडी न्यूज़ में एडिटर मेरे सीनियर परम् आदरणीय अग्रज श्री प्रकाश पन्त द्वारा अपने फेसबुक पेज पर प्रकाशित / लिखित कथन एवम विचारों के परिप्रेक्ष्य में ;मेरे "राष्ट्रवाद" पर विचार !
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From the pen of Shri Pant!
"जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर से एन डी टी वी पर छात्र संघ चुनाव की खबर देखकर आंखें खुल गई। छात्रों के बीच बहस आयोजित की गई थी। ए बी वी पी को छोड़कर सभी लेफ्ट , समाजवादी, दलित मुस्लिम गठजोड़ वाले संगठन के नेता खड़े थे- रोहित वेमुला से लेकर किसानों क हालत पर जोश भरे आख्यान दे रहे थे, जैसे ही ए बी वी पी की प्रतिनिधि ने राष्ट्रवाद की बात की,  तो एंकर लगभग भड़क सी गई और माइक लेकर चारों और दौड़ने लगी, बताइए राष्ट्रवाद कोइ मुद्दा है? सर किसी के पास जाकर पूछने लगी और फिर लगभग उपहास के लहजे में नतीज़ा घोषित कर दिया राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं -- अब समझ नहीं आया कि राष्ट्रवाद से इतनी कोफ्त क्यों?"
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At last ...My Views!
राष्ट्रवाद एक जीवनशैली !
मान लिया कि राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं। वह मुद्दा हो भी नहीं सकता। राष्ट्रवाद एक जीवन शैली है जिसे इस पुरे देश ने अंगीकृत किया हुआ है।
"हिंदुस्तान में रहना होगा वन्देमातरम कहना होगा" ; जैसे नारों के मर्म में यदि यदि राष्ट्रवाद ढूंढोगे तो राष्ट्रवादियों को अवश्य मिल जाएगा परंतु अन्य को उसमें - फांसीवाद ,संघवाद ,अराजकता और भी न जाने कौन कौन  से वाद नज़र आ जाएंगे।
ठीक है आप -"हिंदुस्तान में रहना होगा वन्दे मातरम कहना होगा !" ; मत कहिये परंतु -भारत वर्ष की जय हो ! तो बोल देंगे ? के इसमें भी आपकी इज़्ज़त घटती है और -राष्ट्रवाद की बू आती है?
एनडीटीवी का फुल फॉर्म जहाँ -" New Delhi "शब्द से शुरू होता है वहीँ
एनएसयूआई का फुल फॉर्म -"नेशनल" शब्द से शुरू होता है।
एबीवीपी का फुल फॉर्म भी -"अखिल भारतीय" शब्द से शुरू होता है।
तो NDTV को हम -New Delhi ही माने वहीँ अन्य छात्र संगठनों को हम "राष्ट्रवाद" से प्रेरित ही मान के चलें।
वास्तविकता यह है कि -"राष्ट्रवाद" के दम पर  भाजपा केंद्र की सत्ता पर है एवम राज्यों में भी बढ़ती जा रही है। वहीँ अन्य पार्टियां "राष्ट्रवादी" होते हुए भी इस मुद्दे से दूरी इसलिए बनाये हुए हैं क्योंकि अब यह मुद्दा -भाजपा का ब्रांडेड मुद्दा हो गया है।
न चाहते हुए भी बहुत से लोगों को सिर्फ भाजपा की मुखालफत करने के लिए -राष्ट्रवाद की खिलाफत करनी पड़ती है।
दिक्कत यह है कि -कोई भी खुल कर राष्ट्रवाद के विरोध में इसलिए नहीं बोल सकता क्यों की -यह उतना ही कठिन काम है जितना कि -सूरज को आँखें दिखाना या माँ -पिता से -"आप की जगह तुम का सम्बोधन करना। "
समाजवादी से दलित और रोहित वेमुला सभी मुद्दे हैं परंतु जब "राष्ट्रवाद की बात चल निकलती है तो यह सभी थोड़े कमजोर और फीके पड़ जाते हैं।
डार्विनवाद के सिद्धांत के अनुसार -"अंत में केवल वहीँ पार्टी रह जायगी जो संघर्ष करेगी और समय के साथ अपने आप को बदलेगी। "
अब फतवे या आरक्षण की आग वाले युवा भी सुशिक्षित हो रहे हैं और वे अब तुलनात्मक अध्ययन करके ही कोई निर्णय लेते हैं।
फिर चाहे भाजपा का राष्ट्रवाद हो या कांग्रेस का राष्ट्रवाद हो या समाजवाद का राष्ट्रवाद  ..... आखिर में सारे वाद १५ अगस्त को लाल किले में खड़े हो कर -"जन मन गन अधिनायक जय हो  .... " तो गाते ही हैं न ? वह भी सावधान की मुद्रा में ?
ऐसे बहुत से चैनल आएंगे और चले जाएंगे  .... बहुत से एंकर चकरघिन्नी सा घूमेंगे लेकिन उससे हमारी -भारतीयता को असर नहीं पड़ता है।
इन सबके लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि -एक ऐसी पार्टी सत्तासीन हो गई है जिससे अब इनका दिल्ली जाना और अपनी शर्तों पर जीना थोड़ा सा विकट हो गया है और कुछ नहीं।
आज भी हम जेएनयू में  बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं क्योंकि -वाकई वह देश का सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में से एक है और ईश्वर करे वह बना रहे।
(गौरव !)

Friday, September 9, 2016

ज़िन्दगी के ख़्वाबों की तुरपाई !

बहुत लम्बी दूरी का सफर ;
हो गया तय ...
अधूरी ख्वाइशों के साथ !

खुशियों को बांटना ही तो चाहता था -मैं ;
कुछ लेना तो नहीं ?
और वह "ख़ुशी" भी ..
मयस्सर न हुई !

ज़िन्दगी की -
जिम्मेवारियों की ...
तुरपाई और रफू ....
करते करते ;
जीवन की दुपहरी ढल ...
अब सांझ की बेला -
उतर आई और
ख्वाब अभी तक ..
दे रहे हैं दस्तक !
लेकिन किस्मत ...
जरा भी न -
लजाई !

कभी कभी ...
सोचता हूँ कि -
शराबी होता तो ...
कितना अच्छा होता !

किसी कोनें में -
पड़ा होता ;
सुकून के साथ ...
बेपरवाह ,लापरवाह ...
बिना कोई जवाबदारियों के !

हर सुबह -
मिलती कुछ नफ़रतें ..
कुछ ताने और गालियां ..
लेकिन न मिलती -
अपेक्षाओं की वो गठरी ..
जिसे उठा कर ..
ढोते ढोते ..
लगभग गठरी ही -
बन गया हूँ ;मैं !

रोज़ सुबह निकल जाता ..
किसी अपने की जेब से ..
कुछ नोट ...
निकाल कर ;
और शाम को -
चहलकदमीं करते हुए ..
लड़खड़ाते कदमों से ..
घुसता घर में -निर्लझता से !

कम से कम ..
मेरे उन लौटते थके कदमों में ....
ज़िन्दगी की दौड़ के
हारे हुए इंसा की -
लड़खड़ाती निराशा
तो न होती ?

रोज़ करते हैं -
मुझसे नमस्कार ..
वो शराबी -
सलीकेदार इंसानी लिफ़ाफ़े !

बीती हुई रात में -
किये गए तमाशे और ...
शराबखोरी से ...
बिलकुल बेअसर !

सफाई पसन्द और
इतने इज़्ज़तदार कि - कोई ...
कह ही नहीं सकता कि ..
"बाबूमोशाय" ...
रात भर गटर में ..
पड़े रहे हैं !

वहीँ ..
दूसरी तरफ मैं ;
इंसानी रिश्तों नातों के -
हुजुमों से डरता हुआ ...
ज़िन्दगी के मकड़जालों को हटाते हुए ..
निकल पड़ता हूँ ..
अपने पूर्ण होशोहवाश में ..
बिना दारु और गुटका गटके ..
इस उमंग से कि -
'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा" ;
चलो !
कर्तव्यों को ...
ख़्वाबों के पंख पहना कर ..
उड़ने की कोशिश करें !

शायद ...
ख्वाब और ख्वाइशें ..
सफलता के बादलों पे ...
सवार हो आ जाएँ ...
मेरी हाँथ की रेखाओं में ...
और
ज़िन्दगी की सांझ बेला में ..
जब मैं निहारूँ ...
अपने तुरपाई किये -
ख़्वाबों को ...
तो सन्तोष भरी "मधुमिता"
मुझे अपनी बाहों में ले ले !

Wednesday, September 7, 2016

"प्रेम और प्रयास" पर भगवान् शोध कर रहे हैं !

लहरों का ...
किनारे के पत्थरों से टकराना
और फिर लौट जाना !

यादों का ...
दिल ओ दिमाग से टकराना
और फिर ...
अनंत गहराई में खो जाना !

आंसुओं का ...
आँख में आना ...
और फिर .. लुढ़क कर ...
हवा में टपक जाना !

अगर ...
खोना या मिटना ही ...
ज़िन्दगी की सच्चाई है तो  -
फिर पाना क्या है ?

खोना -क़ुर्बानी है तो -
पाना मेहनत ?
खोना -समझौता है तो -
फिर पाना भाग्य ?
खोना -दुःख तो ...
पाना सुख ?

क्या है -खोना और पाना ?
जो प्रयास करता है ...
वो भी खोता है और ...
जो नहीं करता ..
वो भी खोता है !
एक बात और -
जो कुछ नहीं करता ...
वो कभी कभी ...अपने ख्वाब ...
यूँ ही हथिया लेता है !
ऐसा क्यों होता है ???

कहाँ है वह निष्पक्षता ?
जिसके लिए भगवान् की रचना की गई ?

सूखे पेड़ ...
गिरते नहीं हैं और ...
हरे पेड़ सूख कर ...
फर्नीचर बन ....
किसी डॉइंग रूम की
शोभा बन जाते हैं ?

अच्छे लोग ...
जल्दी चले जाते हैं और ...
बुरे लोग ...
बहुत लम्बा जीते हैं ?

अच्छे लोग ...
मास्टरजी बन जाते हैं और ..
बुरे लोग नेताजी ?

कहाँ है -वह थर्मामीटर जो ...
नापता है -
किसी इंसा के जीवन मूल्य ?
और कौन है वो -
जो करता है ....दस्तखत ...
इंसान के ...
रिपोर्ट कार्ड पर ???

क्या ?
समझौता !खोना !धीरज!
कोई बात नहीं; फिर मिलेंगे!मुझे भूल जाना!
अपना ख्याल रखना!
और तुम्हें मेरी कसम रोना मत!
इस जन्म नहीं तो ...
अगले जन्म मिलेंगे!
कोई बात नहीं !
जैसे "जुमलों" का नाम  ही ज़िन्दगी है ??
और यही -निचोड़ है -
जीवन मूल्यों का ???

क्या यही -
चिरपरिचित स्पंदन है -
ईश्वर की आस्था और विश्वास का ???

लहरों के -
चट्टानों पर उकेरे गए ...
निशाँ ही ...
प्रतिफल हैं -
प्रेम और विश्वास के???

कब तक ...
चलती रहेगी ...
ऐसी मशक्कत ?
जहाँ सत्य को हमेशा "हताशा" ही मिलेगी ?

अब ये न कहना कि -
"खंडहर में -
"दिए की बाती" की "लौ" है -
बहुत "मद्धिम" ;
उसी से काम चलाओ दोस्त!
" प्रेम और प्रयास " पर भगवान् अभी -
"पीएचडी या शोध" कर रहे  है !

Monday, September 5, 2016

दरख्वास्त ऐ ज़िन्दगी !

ऐ ज़िन्दगी !
तेरी पकाई रोटी ...
बहुत सोंधी सोंधी ...
चूल्हे से निकली ...बिलकुल ...
माँ के हाथों जैसी 
फूली फूली !
और मैं भी ..
उसे खाकर ऐसे तृप्त..
जैसे प्यारे पापा का गाना और 
उनकी गोद में झूलती मेरी नींद !

बस तू -कभी कभी ...
सब्ज़ी में -
मिर्ची ज्यादा कर देती है ;
और मैं "सी - सी"
करने लगता हूँ !

प्लीज !
थोड़ा तीखापन कम कर दे ..
ऐ साथ साथ चलने वाली ..
मेरी राहगुज़र !

खट्टा मीठा तो -
अच्छा लगता है पर ;
देख इस "दौर ऐ मन्ज़िल" में
मेरे रायते में ...लाल मिर्च ;
कुछ ज्यादा ही ...
हो गई है !

ऐ ज़िन्दगी !
कम से कम राहत भरा ..
पानी ही पिला दे !
कुछ सुकून तो मिल ही जाएगा !

"पत्रकारिता !नहीं डगर .. पनघट की !"

पत्रकारिता विशुद्ध रहे तो बेहतर है वर्ना ऐसी पत्रकारिता नकारात्मकता की श्रेणी में ही गिनी जायेगी जहां व्यक्तिविशेष -पत्रकारिता का लबादा पहन कर अपनी सरज़मीं या जनसम्पर्क बढाने हेतु इस मार्ग पर चलते हैं !

कलम या पत्रकार का दायित्व जहाँ न्याय अन्याय को प्रत्यक्ष कर सत्य का नैसर्गिक मार्ग प्रशस्त करना है वहीँ यदि वह अधिकारियों के बगल में खड़ा हो फोटो सेशन करवाने लगेगा तो फिर उन्हीं के खिलाफ कभी समाचार छापने की स्तिथि में -क्या गारन्टी है कि उसकी कलम लड़खड़ाएगी नहीं ?

सनद रहे कि -पत्रकारिता की श्रेणी में वे लोग भी पलायन कर रहे हैं जिन्होनें अन्य व्यवसायों में काम करते हुए  महसूस किया कि -"यार यह चोला पहन कर तो कुर्सी और सम्मान दोनों मिलता है और बिज़नस भी द्रुत गति से चलता रहता है..तो क्यों न इस लबादे को धारण किया जाए और ज़िन्दगी में इस "फील्ड" का भी मज़ा लिया जाए !"

और इस तरह से अन्य
क्षेत्रों के परिंदे भी पतंग उड़ाने इस मैदान में उतर रहे हैं !

अब चूँकि यह भाईलोग विशुद्ध पत्रकार नहीं हैं तो यह मित्र गण "पत्रकारिता" को जरिया बना कर अपने क्षद्म आभा मण्डल का निर्माण करते हैं और फोटोसेशन करवा कर उसे सोशल मीडिया पर चस्पा कर साबित करते हैं कि - "यह सबसे बड़े धुरन्धर धनुर्धर हैं ; और अंततः हमें आपको इन्हें इनके ही ओजस्वी रूप और शैली में स्वीकार करना पड़ता है!
नए लोगों का इस क्षेत्र में स्वागत है एवम यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार भी है !बस दिक्कत तभी होती है जब अति महत्वाकांछायें करवटें बदलतीं हैं और "प्रेस और मीडिया" का स्टीकर लगा कर अधिकारियों के बीच पैठ बना कर लोग लाभ की अपेक्षा करने लगते हैं !

जरूरत है कि -ऐसी प्रजातियों की आमद इस क्षेत्र में रोकी जाए अथवा कुछ दिन इन्हें भी "तपाया" जाए जिससे जब यह निखर कर अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त करें तो इन्हें अहसास हो की -"यह डगर पनघट की नहीं थी और पेन से लिखना इतना आसान भी नहीं होता है !"

वैसे भी जबसे मोबाइल और कंप्यूटर और उसके कीबोर्ड का ज़माना आया है ...
यथार्थ में -अब कलम के वे जुझारू पत्रकार बहुत ही कम रह गए हैं -
जो अपनी विलोपित होती प्रजाति का झंडा ऊपर किये हुए चल रहे हों !
फिर अब कलम से लिखता भी कौन है ?
वह तो अब सिर्फ दस्तखत करने के लिए ही ...
ज़िंदा रह अपनी अंतिम साँसे गिन रही है !
जबसे "डिजिटल सिग्नेचर" के बारे में -"कलम" ने सुना है ...वह बिचारी और भी मायूस हो गई है की भविष्य में उसका हश्र भी -"टेपरिकॉर्डर और कैसिट जैसा होने वाला है !"
यह तो प्राकृतिक सिद्धांत है कि -समय के साथ साथ सब कुछ बदलता है !
चलो धीरज धरें इन शब्दों के साथ कि -
पलायन कर पत्रकारिता रूपी
टापू पर घूमने आये यह बंधु एक दिन वापस अपने किसी अन्य नए घर ( फील्ड ) लौट जाएंगे और पत्रकारिता अपने प्रतीकों के साथ निर्बाध गति से चलायमान रहेगी !
"सत्य हताश है ;पराजित नहीं !"
[लेखक के विचार अपने हैं एवम यदि किसी को शब्दों और उसके मायनों से दुःख पहुंचे ;तो "कर" बद्ध खेद एवम क्षम्यता प्रदान करें !]

Thursday, September 1, 2016

ज़िन्दगी की फरमाइशें ; बेहिसाब !

अब न ख्वाइशें रह गईं हैं ;
न ख्वाब ...
बस बच्चों की फरमाइशें ..
रह गईं हैं ;
बेहिसाब !

पर मेरा जीवट भी है-
लाजवाब ....
फरमाइशों को ...
पूरा करते करते ...
जलता जा रहा है ....
मेरी ज़िन्दगी का ..
मेहताब !

ज़िन्दगी के बूचड़खाने में ...
रोज़ बनता है ..
मेरा कवाब !

मैं भी झोंक देता हूँ ..
अपने लहू का ..
आखिरी कतरा तक ..
इस इल्तिज़ा से ...
कि कुछ ऐसा ...
जायका ज़िन्दगी का ..
दे जाऊं ...
अपने बच्चों को ...
कि कभी वे भी ...
जब टूटते तारों को
निहारें तो ...
बरबस होंठ ..
बुदबुदा उठें कि -
"उनके पापा भी थे ;
आफताब !