Monday, September 5, 2016

दरख्वास्त ऐ ज़िन्दगी !

ऐ ज़िन्दगी !
तेरी पकाई रोटी ...
बहुत सोंधी सोंधी ...
चूल्हे से निकली ...बिलकुल ...
माँ के हाथों जैसी 
फूली फूली !
और मैं भी ..
उसे खाकर ऐसे तृप्त..
जैसे प्यारे पापा का गाना और 
उनकी गोद में झूलती मेरी नींद !

बस तू -कभी कभी ...
सब्ज़ी में -
मिर्ची ज्यादा कर देती है ;
और मैं "सी - सी"
करने लगता हूँ !

प्लीज !
थोड़ा तीखापन कम कर दे ..
ऐ साथ साथ चलने वाली ..
मेरी राहगुज़र !

खट्टा मीठा तो -
अच्छा लगता है पर ;
देख इस "दौर ऐ मन्ज़िल" में
मेरे रायते में ...लाल मिर्च ;
कुछ ज्यादा ही ...
हो गई है !

ऐ ज़िन्दगी !
कम से कम राहत भरा ..
पानी ही पिला दे !
कुछ सुकून तो मिल ही जाएगा !

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