Friday, September 9, 2016

ज़िन्दगी के ख़्वाबों की तुरपाई !

बहुत लम्बी दूरी का सफर ;
हो गया तय ...
अधूरी ख्वाइशों के साथ !

खुशियों को बांटना ही तो चाहता था -मैं ;
कुछ लेना तो नहीं ?
और वह "ख़ुशी" भी ..
मयस्सर न हुई !

ज़िन्दगी की -
जिम्मेवारियों की ...
तुरपाई और रफू ....
करते करते ;
जीवन की दुपहरी ढल ...
अब सांझ की बेला -
उतर आई और
ख्वाब अभी तक ..
दे रहे हैं दस्तक !
लेकिन किस्मत ...
जरा भी न -
लजाई !

कभी कभी ...
सोचता हूँ कि -
शराबी होता तो ...
कितना अच्छा होता !

किसी कोनें में -
पड़ा होता ;
सुकून के साथ ...
बेपरवाह ,लापरवाह ...
बिना कोई जवाबदारियों के !

हर सुबह -
मिलती कुछ नफ़रतें ..
कुछ ताने और गालियां ..
लेकिन न मिलती -
अपेक्षाओं की वो गठरी ..
जिसे उठा कर ..
ढोते ढोते ..
लगभग गठरी ही -
बन गया हूँ ;मैं !

रोज़ सुबह निकल जाता ..
किसी अपने की जेब से ..
कुछ नोट ...
निकाल कर ;
और शाम को -
चहलकदमीं करते हुए ..
लड़खड़ाते कदमों से ..
घुसता घर में -निर्लझता से !

कम से कम ..
मेरे उन लौटते थके कदमों में ....
ज़िन्दगी की दौड़ के
हारे हुए इंसा की -
लड़खड़ाती निराशा
तो न होती ?

रोज़ करते हैं -
मुझसे नमस्कार ..
वो शराबी -
सलीकेदार इंसानी लिफ़ाफ़े !

बीती हुई रात में -
किये गए तमाशे और ...
शराबखोरी से ...
बिलकुल बेअसर !

सफाई पसन्द और
इतने इज़्ज़तदार कि - कोई ...
कह ही नहीं सकता कि ..
"बाबूमोशाय" ...
रात भर गटर में ..
पड़े रहे हैं !

वहीँ ..
दूसरी तरफ मैं ;
इंसानी रिश्तों नातों के -
हुजुमों से डरता हुआ ...
ज़िन्दगी के मकड़जालों को हटाते हुए ..
निकल पड़ता हूँ ..
अपने पूर्ण होशोहवाश में ..
बिना दारु और गुटका गटके ..
इस उमंग से कि -
'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा" ;
चलो !
कर्तव्यों को ...
ख़्वाबों के पंख पहना कर ..
उड़ने की कोशिश करें !

शायद ...
ख्वाब और ख्वाइशें ..
सफलता के बादलों पे ...
सवार हो आ जाएँ ...
मेरी हाँथ की रेखाओं में ...
और
ज़िन्दगी की सांझ बेला में ..
जब मैं निहारूँ ...
अपने तुरपाई किये -
ख़्वाबों को ...
तो सन्तोष भरी "मधुमिता"
मुझे अपनी बाहों में ले ले !

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