उस हिंदी को सादर नमन ..
जो अपने -
शब्दों के आँचल से ..
ढाँपे रहती है ;
मेरा अंतर्मन !
मेरा आत्मबल और
मेरी प्रासंगिकता !
हिंदी ! बिन तेरे ..
मैं कुछ भी नहीं !
माँ और पिता के -
जाने के बाद ..
बस एक "तू" ही है ..
जो सुख दुःख ,आशा निराश ,
सफलता असफलता और
प्रेम और नफरतों के ...
समंदर में गोते लगाते ...
मन और चेतना को
अपने शब्दों के गर्भ में
छुपे अर्थों से
सम्बल देती है और
ज़िन्दगी
गतिमान और चलायमान
बनाये रखती है !
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