Thursday, September 15, 2016

तेरह दिन का साध्य और आज का असाध्य मानव !


अपनों के जाने के बाद के -
वे तेरह दिन ..
बमुश्किल कटते हैं ;
तेरहवीं तक ..
बिन प्याज और ...
छोंक बघार के ...
जुबां छटपटाने लगती है -
जैसे ;जल बिन मछली !

सिर्फ तेरहवीं तक ही नहीं ...
बल्कि अब तो ...
वे साल भी ..
बमुश्किल काटने और
झेलने पड़ते हैं ...
कुछ औलादों को ;
जब उनके पालनहार रिटायर हो जाते हैं !

अरे पुराने ज़माने के ...
खाये पिए आदमीं हैं ;
न दमा न खांसी न खुन्नस ..
बीपी और शुगर से भी -
बहुत दूर ..
लम्बा जीवन जीते हैं और ..
रिटायरमेंट के बाद ..
भगवान् के भजन में -
मगन रहते हैं !

अब ऊपर वाले का
बुलावा जरा देर से आये ;
तो वे बिचारे ...
क्या करें ??

फिर भगवान् भी न ...
जाने क्यों ...
गाड़ी के दो पहियों में से ..
किसी एक को ;
ले लेता है और -
बिचारा दूसरा ...
अकेला अधजली लाश सा ...
बीहड़ों में ...
सूखे ,जर्जर ,बंजर ,
बियाबान सी ज़िन्दगी ..
गुज़ारता है ...
और कुछ अपने ही लोग ..
उसके -ढलने ...
गिरने और रुखसती का ...
इन्तिज़ार करते हैं !

पढ़ने में जरूर बुरा
लगेगा लेकिन -
इस नई पीढ़ी में ...
लोग ;
माँ बाप से ज्यादा ...
अपनी कार और मोबाइल से;
प्यार करते हैं !

शायद मेरी पीढ़ी ..
वो अंतिम पीढ़ी थी ...
जो अपने माँ पापा से ..
तहेदिल से जुडी थी !

वर्ना आज ....
तेरहवीं और चालीसवें तक के
दुःख भरे दिन ...
बड़ी मुश्किल से कटते हैं !

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