Tuesday, December 30, 2014

एक जाता हुआ साल..... कुछ....... चंद....

एक जाता हुआ साल....

कुछ बीते हुए लम्हे....
चंद बिसरे हुए पल छिन...

कुछ खट्टी मीठी यादें......
चंद सोंधी सोंधी बातें....

कुछ ज़िन्दगियों का जाना.....
चंद बिछड़ों का मिल जाना....

कुछ कड़वे कड़वे बोल....
चंद मीठी मीठी बातें...

कुछ जीवन के कटु अनुभव....
चंद जीवन के सफल अनुभव....

कुछ को उनकी मोहब्बतों का मिलना...
चंद की वफाओं का बिछड़ना और टूटना..

और..... आखिर में...

हर बनते बिगड़ते.... टूटते सम्भलते... मिलते बिछड़ते.... रोते बिलखते.... समय के पलों के साथ....
अपने भगवान पर अगाध विश्वास....

जाते हुए पलों को सलाम -दिल से.....
आने वाले पलों का स्वागत -दिल से...

गौरव!

Monday, December 29, 2014

सबक!

बाप पतंग उड़ा रहा था  बेटा ध्यान से देख रहा था

थोड़ी देर बाद बेटा बोला पापा ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है इसे तोड़ दो

बाप ने धागा तोड़ दिया

पतंग थोडा सा और ऊपर गई और उसके बाद निचे आ गई

तब बाप ने बेटे को समझाया

बेटा जिंदगी में हम जिस उचाई पर है,
     हमें अक्सर लगता है ,
       की कई चीजे हमें
          और ऊपर
           जाने से 
         रोक रही है,
जैसे
            घर,
          परिवार,
        अनुशासन,
           दोस्ती,

और हम उनसे आजाद होना चाहते है,
मगर यही चीज होती है
जो हमें उस उचाई पर बना के रखती है.

उन चीजो के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे
मगर
बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो पतंग का हुआ.

इसलिए जिंदगी में कभी भी
          अनुशासन का,
           घर का ,
           परिवार का,
           दोस्तों का,
     रिश्ता कभी मत तोड़ना..�� अगर आप सहमत हो तो औरों को भी बताऐं । ����

Wednesday, December 24, 2014

अटल बिहारी वाजपेयी!

आओ फिर से दिया जलाएँ

भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ|

-अटलबिहारी वाजपेेई

Monday, December 22, 2014

बदलता शहर!

कुछ अजीब सा माहौल हो चला है,
मेरा शहर अब बदल चला है....

ढूंढता हु उन परिंदों को,
जो बैठते थे कभी छज्ज़ो पर मेरे,
शोर शराबे से आशियाँना अब उनका भी उजड़ चला है,
मेरा शहर अब बदल चला है.....

होती थी इमाम बाडे से
कभी तांगे की सवारी,
मंज़िल तो वही है
मुसाफिर अब आई बस में
चढ़ चला है
मेरा शहर अब बदल चला है...

भुट्टे, कबीट, ककड़ी, इमली
खाते थे कभी हम स्कूल कॉलेजो के प्रांगण में,
अब तो बस मैकडोनाल्ड, पिज़्जाहट और
कैफ़े कॉफ़ी डे का दौर चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

वो स्टारलिट, बेम्बिनो,
एलोरा के दीवाने थे आप हम,
अब आइनॉक्स, बिग सिनेमा,
और पीवीआर का शोर चला है
मेरा शहर अब बदल चला हैै....

कभी कभी रुक कर
किसी चौराहे पर बतिया
लेते थे दो दोस्त घंटो,
अब तो बस शादी, पार्टी या
उठावने पर मिलने का ही दौर
चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

वो टेलीफोन का काला चोगा उठाकर खेर खबर
पूछ लेते थे,
अब तो स्मार्टफोन से फेसबुक, व्हाटसऐप और
ट्वीटर का रोग चला है
मेरा शहर अब बदल चला है.....

वो नेहरूपार्क और
शिवाजी वाटिका में
सेव परमल का जायका,
अब तो सेन्डविच, पिज़्ज़ा, बर्गर और पॉपकॉर्न की और चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

वो साइकिल पर बैठकर
दूर की डबल सवारी,
कभी होती उसकी, कभी
हमारी बारी,
अब तो बस फर्राटेदार
बाइक का फैशन चला है
मेरा शहर अब बदल चला है....

जाते थे कभी ट्यूशन
पढ़ने माट साब के वहाँ,
बैठ जाते थे फटी दरी पर भी
पाँव पसार,
अब तो बस कोचिंग क्लासेस
का धंधा चल पड़ा है,
मेरा शहर अब बदल चला है.....

खों-खों, सितोलिया, क्रिकेट, गुल्लिडंडा, डिब्बाडाउन
खेलते थे गलियो और
मोहल्लों में कभी,
अब तो न वो गलियाँ रही
न मोहल्ले न वो खेल,
सिर्फ और सिर्फ कंप्यूटर गेम्स का दौर चला है,
मेरा शहर अब बदल चला हैं.....

सुनते थे खालिस संगीत
कभी कभी सांघी के मुक्त आकाश तले रात भर,
अब तो पब, और डीजे का रोग   चला है,
मेरा शहर अब बदल चला है....

कॉलेज की लड़कियो से
आँख मिलाना तो दूर,
बात करना भी एक कला थी
अब तो हाय ड्यूड, हाय बेब्स का रिवाज़ चल पड़ा है
मेरा शहर अब बदल चला है....

साइकिल घर में एकाद ही
होती थी और था
बाबुजी के पास स्कूटर,
अब तो हर घर में कारो और बाइक का काफिला चला हैै
मेरा शहर अब बदल चला है....

खाते थे फ़क्त समोसे,
कचोरी, जलेबी, गराडू,
मालपुए सराफे में,
अब वहाँ भी चाउमिन, नुडल्स, मन्चूरियन का स्वाद चला हैं
मेरा शहर अब बदल चला है....

सहेज लो पुरानी यादो
को धरोहर की तरह मुट्ठी में यारो
कि मेरा शहर अब बदल चला हैैं....

Monday, December 15, 2014

हकीकत ज़िन्दगी की!

नंगे पाव चलता इन्सान को लगता है
.
कि "चप्पल होते तो कितना अच्छा होता"
.
बाद मेँ,
"साइकिल होती तो कितना अच्छा होता"
.
उसके बाद,
"मोपेड होता तो थकान नही लगती"
.
बद मेँ सोचता है
"मोटर साइकिल होती तो बातो-बातो मेँ
रास्ता कट जाता"
.
फिर ऐसा लगता है,
"कार होती तो धुप नही लगती"
.
फिर लगता है कि,
"हवाई जहाज होती तो इन ट्राफिक कि जंजट
नही होती"
.
जब हवाई जहाज मेँ बेठकर नीचे हरे-भरे घास के
मैदान
देखता है तो सोचता है,
कि "नंगे पाव घास मेँ चलता तो दिल
को कितनी तसल्ली मिलती"
.
.
""जरुरत के मुताबिक जिंदगी जिओ - ख्वाहिशों के
मुताबिक नहीं।
.
क्योंकि जरुरत
तो फकीरों की भी पूरी हो जाती है;
और
ख्वाहिशें
बादशाहों की भी अधूरी रह
जाती है""

Friday, December 12, 2014

मेरे पापा!

जब मम्मी डाँट रहीं थी तो कोई
चुपके से हँसा रहा था, वो थे पापा. . .
.
जब मैं सो रही थी तब कोई
चुपके से सिर पर हाथ
फिरा रहा था , वो थे पापा. . .
.
जब मैं सुबह उठी तो कोई बहुत
थक कर भी
काम पर जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
खुद कड़ी धूप में रह कर
कोई मुझे
एसी में सुला रहा था , वो थे पापा. . .
.
सपने तो मेरे थे पर उन्हें
पूरा करने का रास्ता कोई और
बताऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
मैं तो सिर्फ अपनी खुशियों में हँसती हूँ
पर मेरी हँसी देखकर कोई अपने
गम भुलाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
फल खाने की
ज्यादा जरूरत तो उन्हें है पर कोई मुझे
सेब खिलाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
खुश तो मुझे होना चाहिऐ कि
वो मुझे मिले , पर मेरे जन्म लेने की खुशी कोई और
मनाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
ये दुनिया पैसों से चलती है पर
कोई सिर्फ मेरे लिऐ
पैसे कमाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
घर में सब अपना प्यार दिखाते हैं पर
कोई बिना दिखाऐ भी इतना ‪#‎प्यार‬ किऐ
जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
पेड़ तो अपना फल खा नही सकते
इसलिऐ हमें देते हैं...पर कोई अपना पेट
खाली रखकर भी
मेरा पेट भरे जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
‪#‎विदा‬ तो मैं हो रही थी पर मुझसे भी
अधिक आंसू कोई और
बहाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .
.
मैं अपनी "‪बेटी‬" शब्द को
सार्थक बना सकती या नही...
पर कोई बिना स्वार्थ के
अपने "‎पिता‬" शब्द को सार्थक
बनाऐ जा रहा था , वो थे पापा. . .!! एक लाइक  अपने पापा जी के लिये बनता है

Feelings and Friendship!

एक बहुत ही सुंदर कविता;

एक काम करना,थोड़ी सी मिट्टी लेना,
उससे दो प्यारे से दोस्त बनाना।

इक तुझ जैसा....एक मुझ जैसा....
फिर उनको तुम तोड़ देना।

फिर उनसे दोबारा दो दोस्त बनाना,
इक तुझ जैसा...एक मुझ जैसा...

ताकि तुझ में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ
और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ।

कुछ तुम जैसा कुछ मुझ जैसा......

Sunday, December 7, 2014

बाबूजी क्षितिज की ओर .......

बाबूजी  क्षितिज की ओर  .......

इस शरणागत की उम्र में  …
एक और ज़िम्मेवारी माथे पर   …

पार्षद बन लवकुशनगर को नया रास्ता दिखाना  ....
नेतृत्व दे कर युवा पीढ़ी को " कर्मवीर" बनने का सन्देश देना   ……

आभार  जिन्होंने बाबूजी  माथे लगाया   …।
आभार उनको जिन्होंने लवकुशनगर के बुजुर्ग के स्पंदन को समझा   …
आभार उनका जिन्होंने  रिश्तों की परिभाषा को समझा   ……
आभार जनता का   ……
और
आभार उस ऊपर वाले भगवान और ख्वाजा का
जिसने
आशीर्वाद  दिया जीत का। 

Thursday, December 4, 2014

अम्मा!

मां को समर्पित एक कविता

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा
दुःख थे पर्वत, राई अम्मा
हारी नहीं लड़ाई अम्मा
इस दुनियां में सब मैले हैं
किस दुनियां से आई अम्मा
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे
गरमागर्म रजाई अम्मा
जब भी कोई रिश्ता उधड़े
करती है तुरपाई अम्मा
बाबू जी तनख़ा लाये बस
लेकिन बरक़त लाई अम्मा
बाबूजी थे छड़ी बेंत की
माखन और मलाई अम्मा
बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई अम्मा
नाम सभी हैं गुड़ से मीठे
मां जी, मैया, माई, अम्मा
सभी साड़ियाँ छीज गई थीं
मगर नहीं कह पाई अम्मा
अम्मा में से थोड़ी - थोड़ी
सबने रोज़ चुराई अम्मा
घर में चूल्हे मत बाँटो रे
देती रही दुहाई अम्मा
बाबूजी बीमार पड़े जब
साथ-साथ मुरझाई अम्मा
रोती है लेकिन छुप-छुप कर
बड़े सब्र की जाई अम्मा
लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई अम्मा
बेटी की ससुराल रहे खुश
सब ज़ेवर दे आई अम्मा
अम्मा से घर, घर लगता है
घर में घुली, समाई अम्मा
बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई अम्मा
दर्द बड़ा हो या छोटा हो
याद हमेशा आई अम्मा
घर के शगुन सभी अम्मा से,
है घर की शहनाई अम्मा
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई अम्मा

Tuesday, December 2, 2014

शाकाहार!

गर्व था भारत-भूमि को
कि महावीर की माता हूँ।।

राम-कृष्ण और नानक जैसे
वीरो की यशगाथा हूँ॥

कंद-मूल खाने वालों से
मांसाहारी डरते थे।।

पोरस जैसे शूर-वीर को
नमन 'सिकंदर' करते थे॥

चौदह वर्षों तक वन में
जिसका धाम था।।

मन-मन्दिर में बसने
वाला शाकाहारी राम था।।

चाहते तो खा सकते थे
वो मांस पशु के ढेरो में।।

लेकिन उनको प्यार मिला
' शबरी' के झूठे बेरो में॥

चक्र सुदर्शन धारी थे
गोवर्धन पर भारी थे॥

मुरली से वश करने वाले
'गिरधर' शाकाहारी थे॥

पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम
चोटी पर फहराया था।।

निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥

सपने जिसने देखे थे
मानवता के विस्तार के।।

नानक जैसे महा-संत थे
वाचक शाकाहार के॥

उठो जरा तुम पढ़ कर
देखो गौरवमयी इतिहास को।।

आदम से गाँधी तक फैले
इस नीले आकाश को॥

दया की आँखे खोल देख लो
पशु के करुण क्रंदन को।।

इंसानों का जिस्म बना है
शाकाहारी भोजन को॥

अंग लाश के खा जाए
क्या फ़िर भी वो इंसान है?

पेट तुम्हारा मुर्दाघर है
या कोई कब्रिस्तान है?

आँखे कितना रोती हैं
जब उंगली अपनी जलती है।।

सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है॥

बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नही।।

जीते जी तन काटा जाए,
उस पीडा का पार नही॥

खाने से पहले बिरयानी,
चीख जीव की सुन लेते।।

करुणा के वश होकर तुम भी शाकाहार को चुन लेते॥

शाकाहारी बनो...!

Thursday, November 27, 2014

अल्लाह मियां!

नील गगन पर बैठे कब तक
चांद सितारों से झांकोगे,

पर्वत की ऊचीं चोटी से कब तक
दुनिया को देखोगे,

आदर्शों के बंद ग्रन्थ में
कब तक तुम आराम करोगे?

मेरा छप्पर टपक रहा है
बनकर सूरज इसे सुखाओ!

खाली है आटे का डब्बा
बनकर गेहूं इसमे आओ!

मां का चश्मा टूट गया है,
बनकर शीशा इसे बनाओ!

चुपचुप हैं आँगन में बच्चे,
बनकर गेंद इन्हे बहलाओ!

शाम हुई है चाँद उगाओ,
पेड़ हिलाओ हवा चलाओ!

काम बहुत  है हाथ बटाओ,
अल्ला मियां......
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मियां...

अंतिम यात्रा!

किसी शायर ने अपनी अंतिम यात्रा
का क्या खूब वर्णन किया है.....

था मैं नींद में और
मुझे इतना
सजाया जा रहा था....

बड़े प्यार से
मुझे नहलाया जा रहा
था....

ना जाने
था वो कौन सा अजब खेल
मेरे घर
में....

बच्चो की तरह मुझे
कंधे पर उठाया जा रहा
था....

था पास मेरा हर अपना
उस
वक़्त....

फिर भी मैं हर किसी के
मन
से
भुलाया जा रहा था...

जो कभी देखते
भी न थे मोहब्बत की
निगाहों
से....

उनके दिल से भी प्यार मुझ
पर
लुटाया जा रहा था...

मालूम नही क्यों
हैरान था हर कोई मुझे
सोते
हुए
देख कर....

जोर-जोर से रोकर मुझे
जगाया जा रहा था...

काँप उठी
मेरी रूह वो मंज़र
देख
कर....
.
जहाँ मुझे हमेशा के
लिए
सुलाया जा रहा था....
.
मोहब्बत की
इन्तहा थी जिन दिलों में
मेरे
लिए....
.
उन्हीं दिलों के हाथों,
आज मैं जलाया जा रहा था !

     लाजवाब लाईनें


Tuesday, November 11, 2014

कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं!

मै यादों का किस्सा खोलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
मै गुजरे पल को सोचूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
अब जाने कौन सी नगरी में,
आबाद हैं जाकर मुद्दत से.
मै देर रात तक जागूँ तो ,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
कुछ बातें थीं फूलों जैसी,
कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,
मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
वो पल भर की नाराजगियाँ,
और मान भी जाना पलभर में,
अब खुद से भी रूठूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं...��

Friday, November 7, 2014

स्व.डा। रूपेंद्र खरे -यात्रा अनंत की ओर। ....

डा.रूपेंद्र !

(1935 -1995 )

मेरे पापा!


मेरे प्यारे पापा!
"शिद्दत से ढूंढ़ता हूँ आपको 
अपने अंदर.....
आपके जाने के इतने साल बाद भी....
आपका बेटा हूँ न!
जब जब कोई नीचा दिखाता है आपका कन्धा आपके बाजू याद आते हैं जहाँ अक्सर मैं चिपक कर सबकुछ भूल जाता था!
जब जब कोई ऊँचा उठाता है, सम्मान और इज़्ज़त देता है और कहता है -डाक्टर रूपेंद्र का बेटा है तो बरबस आँखों के बिनबुलाये आंसू आपको तलाशते हैं कि - काश आप होते!
जब गुस्से में झल्लाता हूँ तो सब कहते हैं कि - गुस्सा पापा पे गया है!
जब कोई चुनौती देता है तो कह देता हूँ कि -मेरी वल्दियत देख लेना ;टूटना मंजूर हैं झुकना नहीं!
और -जब लिखता हूँ.....
बोलता हूँ..... या -किसी के सामने झुक कर पैर छूता हूँ तो सब कहतें हैं कि-अपने पापा पे गया है!
मेरे प्यारे पापा!
आपके जाने के बीस साल बाद भी.....
रंगीला बन....... रंगा हुआ हूँ  …
उन्हीं रंगों में -जो आपने उकेरे थे ;
अपने ' बेटे 'के अंतर्मन में!
हर 'पिता ' घबराता है जब बच्चे बड़े होते हैं,
क्यों कि-
यह पाठ तो पापा ने बताया नहीं था....
क्या करें? उस पल..... इस पल....
सच......
आप याद आतें हैं!
गिरुं तो आप? टूटूं तो आप?
दुखी तो आप? परेशान तो आप?
प्यार तो आप! पवित्रता तो आप ?
माँ तो आप! पापा तो आप!
दिलासा तो आप!
ख़ुशी तो आप! 
सफलता तो आप! हंसी तो आप! 
और सुख तो आप!
मन घबराता है.... आप जो नहीं हो......
बस....
हिम्मत देना की वो कर जाऊँ
जिससे कभी -मैं भी......
आपके जैसा याद किया जाऊँ! "

                                        परिचय :
"बुंदेलखंड अंचल में पत्रकारता के जनक स्व. डॉक्टर रूपेंद्र खरे ने 1970 के दशक में आज के लवकुशनगर में अपना निजी चिकित्सालय खोला था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से चिकित्सा की स्नातक उपाधि प्राप्त कर उन्होंने लवकुशनगर में चिकित्सक बन जन सेवा शुरू की थी। उनके कुशल चिकित्सक ,बेबाक पत्रकार और एक ईमानदार ,स्पष्ट वक्ता एवं मृदुभाषी जिंदादिल इंसान की मिसालें आज भी लोग देतें हैं।" पत्रकारिता में वे इस अंचल के जनक थे। 
शत शत नमन !
चरणों को सिर रख कर प्रणाम !
श्रद्धानवत -
शानू -वंदना ,आशीष -अर्चना ,
सब्यसांची ,यश्वी व यश। 

प्रतिष्ठान -(पापा !आप की कृपा से सब काम हो रहें हैं  ....... )
  • RK Teachers Training Institute-Lav Kush Nagar. 
  • RK College Of Science and Technology Lav Kush Nagar
  • RK Hospitality Ventures. 
  • Travel Xpert Khajuraho.  




Wednesday, November 5, 2014

औकात!

कुछ पंक्तियां:

मै सूरज के साथ रहकर भी भूला नही अदब,
लोग जुगनू का साथ पाकर... मगरूर हो गये.

खुद मे काबिलीयत हो तो...भरोसा कीजिये,
सहारे कितने भी अच्छे हों...साथ छोड़ जाते हैं.

सच की हालत किसी तवायफ सी है,
तलबगार बहुत हैं तरफदार कोई नही.

आदमी ही आदमी का रास्ता काट रहा है,
बिल्लियां तो बेचारी बेरोजगार बैठी हैं.

मुद्दतों बाद किसी ने पूछा- कहां रहते हो,
मैने मुस्करा कर कहा- अपनी औकात मे.

Friday, October 31, 2014

ज़माने के रंग!

मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है ....
उम्र के साथ .. जिंदगी को .. ढंग बदलते देखा है .. !!

वो .. जो चलते थे .. तो शेर के चलने का .. होता था गुमान..
उनको भी .. पाँव उठाने के लिए .. सहारे को तरसते देखा है !!

जिनकी .. नजरों की .. चमक देख .. सहम जाते थे लोग ..
उन्ही .. नजरों को .. बरसात .. की तरह ~~ रोते देखा है .. !!

जिनके .. हाथों के .. जरा से .. इशारे से .. टूट जाते थे ..पत्थर ..
उन्ही .. हाथों को .. पत्तों की तरह .. थर थर काँपते देखा है .. !!

जिनकी आवाज़ से कभी .. बिजली के कड़कने का .. होता था भरम ..
उनके .. होठों पर भी .. जबरन .. चुप्पी का ताला .. लगा देखा है .. !!

ये जवानी .. ये ताकत .. ये दौलत ~~ सब ख़ुदा की .. इनायत है ..
इनके .. रहते हुए भी .. इंसान को ~~ बेजान हुआ देखा है ... !!

अपने .. आज पर .. इतना ना .. इतराना ~~ मेरे .. युवा यारों ..
वक्त की धारा में .. अच्छे अच्छों को ~~ मजबूर हुआ देखा है .. !!!

कर सको......तो किसी को खुश करो......दुःख देते ........तो हजारों को देखा है......

Thursday, October 30, 2014

यह कैसी दिल्ली है मेरे भाई!

यह कैसी दिल्ली है भाई,
हमको समझ नहीं आई,

पहाड़ गंज में पहाड़ नहीं,

धुला कुआँ में कुआँ नहीं,

दरियागंज में दरिया नहीं,

इन्द्रलोक में परियां नहीं,

गुलाबी बाग में गुलाबी नहीं,

चांदनी चौक में चांदनी नहीं,

पुरानी दिल्ली में नई सड़क,

नई दिल्ली में पुराना किला,

कश्मीरी गेट में कश्मीर नहीं,

अजमेरी गेट में अजमेर नहीं,

यह कैसी दिल्ली है भाई,

हमको समझ नहीं आई.....

����

Monday, October 27, 2014

Good Morning Zindagi!

नयन का नयन से, नमन हो रहा है
लो उषा का आगमन हो रहा है

परत दर परत, चांदनी कट रही है
तभी तो निशा का, गमन हो रहा है

क्षितिज पर अभी भी हैं, अलसाये सपने
पलक खोल कर भी, शयन हो रहा है

झरोखों से प्राची की पहली किरण का
लहर से प्रथम आचमन हो रहा है

हैं नहला रहीं, हर कली को तुषारें
लगन पूर्व कितना जतन हो रहा है

वहीं शाख पर पँक्षियों का है कलरव
प्रभाती-सा लेकिन, सहन हो रहा है

बढ़ी जा रही जिस तरह से अरुणिमा
है लगता कहीं पर हवन हो रहा है

मधुर मुक्त आभा, सुगंधित पवन है
नये दिन का कैसा सृजन हो रहा है।   

सुप्रभात!

Saturday, October 25, 2014

Sister's are necessary!

कैसी भी हो एक
बहन होनी चाहिये..........।
.
बड़ी हो तो माँ- बाप से बचाने वाली.
छोटी हो तो हमारे पीठ पिछे छुपने वाली..........॥
.
बड़ी हो तो चुपचाप हमारे पाँकेट मे पैसे रखने वाली,
छोटी हो तो चुपचाप पैसे निकाल लेने वाली.........॥
.
छोटी हो या बड़ी,
छोटी- छोटी बातों पे लड़ने वाली,एक बहन होनी चाहिये.......॥
.
बड़ी हो तो ,गलती पे हमारे कान खींचने वाली,
छोटी हो तो अपनी गलती पर,साँरी भईया कहने
वाली...
खुद से ज्यादा हमे प्यार करने वाली एक बहन होनी चाहिये.... ....॥
��भाईदूज की अग्रिम शुभकामनाय��े

Wednesday, October 22, 2014

क्या होली क्या दिवाली!

पटाखो कि दुकान से दूर हाथों मे,
कुछ सिक्के गिनते मैने उसे देखा...

एक गरीब बच्चे कि आखों मे,
मैने दिवाली को मरते देखा.

थी चाह उसे भी नए कपडे पहनने की...
पर उन्ही पूराने कपडो को मैने उसे साफ करते देखा.

तुमने देखा कभी चाँद पर बैठा पानी?
मैने उसके रुखसर पर बैठा देखा.

हम करते है सदा अपने ग़मो कि नुमाईश...
उसे चूप-चाप ग़मो को पीते देखा.

थे नही माँ-बाप उसके..
उसे माँ का प्यार और पापा के हाथों की कमी महसूस करते देखा.

जब मैने कहा, "बच्चे, क्या चहिये तुम्हे"?
तो उसे चुप-चाप मुस्कुरा कर "ना" मे सिर हिलाते देखा.

थी वह उम्र बहुत छोटी अभी...
पर उसके अंदर मैने ज़मीर को पलते देखा

रात को सारे शहर की दीपो की लौ मे...
मैने उसके हसते, मगर बेबस चेहरें को देखा.

हम तो ज़िंदा है अभी शान से यहा.
पर उसे जीते जी शान से मरते देखा.

नामकूल रही दिवाली मेरी...
जब मैने ज़िन्दगी के इस दूसरे अजीब से पहलु को देखा.

कोई मनाता है जश्न
और कोई रहता है तरस्ता...

मैने वो देखा..
जो हम सब ने देख कर भी नही देखा.

लोग कहते है, त्योहार होते है ज़िन्दगी  मे खुशियों के लिए,

तो क्यो मैने उसे मन ही मन मे घुटते  और तरस्ते देखा?

शुभ दीपावली!
गौरव!

Wednesday, October 15, 2014

Happy Deepawali!

दो भाई साथ साथ खेती करते थे।
मशीनों की भागीदारी और
चीजों का व्यवसाय किया करते थे। चालीस
साल के साथ के बाद एक
छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से उनमें पहली बार
झगडा हो गया था झगडा दुश्मनी में बदल
गया था।
एक सुबह एक बढई बड़े भाई से काम मांगने आया. बड़े
भाई ने कहा "हाँ ,मेरे पास तुम्हारे लिए काम हैं।
उस तरफ देखो, वो मेरा पडोसी है, यूँ
तो वो मेरा भाई है, पिछले हफ्ते तक हमारे
खेतों के बीच घास का मैदान हुआ करता था पर
मेरा भाई बुलडोजर ले आया और अब हमारे खेतों के
बीच ये खाई खोद दी, जरुर उसने मुझे परेशान करने
के लिए ये सब किया है अब मुझे उसे
मजा चखाना है, तुम खेत के चारों तरफ बाड़
बना दो ताकि मुझे उसकी शक्ल
भी ना देखनी पड़े."
"ठीक हैं", बढई ने कहा।
बड़े भाई ने बढई को सारा सामान लाकर दे
दिया और खुद शहर चला गया, शाम
को लौटा तो बढई का काम देखकर भौंचक्का रह
गया, बाड़ की जगह वहा एक पुल था जो खाई
को एक तरफ से दूसरी तरफ जोड़ता था. इससे पहले
की बढई कुछ कहता, उसका छोटा भाई आ गया।
छोटा भाई बोला "तुम कितने दरियादिल हो ,
मेरे इतने भला बुरा कहने के बाद भी तुमने हमारे
बीच ये पुल बनाया, कहते कहते उसकी आँखे भर आईं
और दोनों एक दूसरे के गले लग कर रोने लगे. जब
दोनों भाई सम्भले तो देखा कि बढई जा रहा है।
रुको! मेरे पास तुम्हारे लिए और भी कई काम हैं,
बड़ा भाई बोला।
मुझे रुकना अच्छा लगता ,पर मुझे ऐसे कई पुल और
बनाने हैं, बढई मुस्कुराकर बोला और अपनी राह
को चल दिया.
दिल से मुस्कुराने के लिए जीवन में पुल की जरुरत
होती हैं खाई की नहीं।
छोटी छोटी बातों पर अपनों से न रूठें।
"दीपावली आ रही है घरेलू रिश्तों के साथ साथ
सभी दोस्ती के रिश्तों पर जमी धूल भी साफ
कर लेना, खुशियाँ चार गुनी हो जाएंगी"
आने वाली दीपावली आप सभी के लिए
खुशियाँ ले कर आए!