नील गगन पर बैठे कब तक
चांद सितारों से झांकोगे,
पर्वत की ऊचीं चोटी से कब तक
दुनिया को देखोगे,
आदर्शों के बंद ग्रन्थ में
कब तक तुम आराम करोगे?
मेरा छप्पर टपक रहा है
बनकर सूरज इसे सुखाओ!
खाली है आटे का डब्बा
बनकर गेहूं इसमे आओ!
मां का चश्मा टूट गया है,
बनकर शीशा इसे बनाओ!
चुपचुप हैं आँगन में बच्चे,
बनकर गेंद इन्हे बहलाओ!
शाम हुई है चाँद उगाओ,
पेड़ हिलाओ हवा चलाओ!
काम बहुत है हाथ बटाओ,
अल्ला मियां......
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मियां...
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