Friday, June 23, 2017

पहाड़ों से लौट कर ....

ऊँचे पहाड़ों को ...
नापने निकले थे !
एक ज़िन्दगी ...
भांपने निकले थे !
पास से देखा तो पाया ..
दूर के ख्वाब ...
सुहाने थे ...
और हम ;
बियाबान जंगलों जैसे
वीराने थे !
इन पहाड़ों पर ...
बस ये पेड़ खड़े हैं और ..
हम भटकते बादल ..
बेगाने से ..
बरस उठने को आकुल ..
लिए अपना ..
निस्पृह मानव आकार
चले आते हैं अपनी अपनी
बदलियों को साथ लिए !
ऊँचे पहाड़ों के ...
मौन आमंत्रण को ..
स्वीकारते हुए ..
हम चले आये हैं ..
चंद साँसों से बनी ..
इस रूह को ..
सुकून देने ..
बारिशों की चंद बूंदों का ..
और
हसीन वादियों में खिलती ज़िन्दगी का !
पता सभी को है कि -
ये धोखा हैं !
आँखों का सुकून ..
चंद पलों का लुत्फ़ ..
ज़िन्दगी नहीं !
बहुत ऊंचाई से ..
नीचे देख ..
घबराहट होती हैं!
लेकिन नीचे से ...
पहाड़ों की ऊंचाई देख .. सौंदर्य बोध !
यही मानव स्वभाव है !
सुंदरता के ...
रसास्वादन के लिए ...
हम ऊपर चढ़ते जाते हैं ...
मगर ; फिर ...
ऊपर से नीचे के सफर में ..
हम लड़खड़ा जाते हैं !
दुर्गमता को ..
कर्मठता से प्राप्त करना ..
फिर उसको सुगमता से .. त्याग देना ...
मानव फितरत नहीं !
पहाड़ों का अंतर्नाद;
सुनना पड़ेगा !
उनको रौंद कर ..
हम सुकून से ...
नहीं रह पाएंगे !
चलो ढूंढे शम्भू को ..
और उनके निवास को !
देखना हर चोटी के आकार में
शंकर नज़र आएंगे !
हर खोह में ...
वे ही दर्शन देंगे ..
अपने त्रिशूल के साथ !
इन पहाड़ों को मत छेड़ो !
उन्हें रहने दो ;यहां ..
जिनका ये निवास है !