Thursday, November 27, 2014

अल्लाह मियां!

नील गगन पर बैठे कब तक
चांद सितारों से झांकोगे,

पर्वत की ऊचीं चोटी से कब तक
दुनिया को देखोगे,

आदर्शों के बंद ग्रन्थ में
कब तक तुम आराम करोगे?

मेरा छप्पर टपक रहा है
बनकर सूरज इसे सुखाओ!

खाली है आटे का डब्बा
बनकर गेहूं इसमे आओ!

मां का चश्मा टूट गया है,
बनकर शीशा इसे बनाओ!

चुपचुप हैं आँगन में बच्चे,
बनकर गेंद इन्हे बहलाओ!

शाम हुई है चाँद उगाओ,
पेड़ हिलाओ हवा चलाओ!

काम बहुत  है हाथ बटाओ,
अल्ला मियां......
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मियां...

अंतिम यात्रा!

किसी शायर ने अपनी अंतिम यात्रा
का क्या खूब वर्णन किया है.....

था मैं नींद में और
मुझे इतना
सजाया जा रहा था....

बड़े प्यार से
मुझे नहलाया जा रहा
था....

ना जाने
था वो कौन सा अजब खेल
मेरे घर
में....

बच्चो की तरह मुझे
कंधे पर उठाया जा रहा
था....

था पास मेरा हर अपना
उस
वक़्त....

फिर भी मैं हर किसी के
मन
से
भुलाया जा रहा था...

जो कभी देखते
भी न थे मोहब्बत की
निगाहों
से....

उनके दिल से भी प्यार मुझ
पर
लुटाया जा रहा था...

मालूम नही क्यों
हैरान था हर कोई मुझे
सोते
हुए
देख कर....

जोर-जोर से रोकर मुझे
जगाया जा रहा था...

काँप उठी
मेरी रूह वो मंज़र
देख
कर....
.
जहाँ मुझे हमेशा के
लिए
सुलाया जा रहा था....
.
मोहब्बत की
इन्तहा थी जिन दिलों में
मेरे
लिए....
.
उन्हीं दिलों के हाथों,
आज मैं जलाया जा रहा था !
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     लाजवाब लाईनें
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Tuesday, November 11, 2014

कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं!

मै यादों का किस्सा खोलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
मै गुजरे पल को सोचूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
अब जाने कौन सी नगरी में,
आबाद हैं जाकर मुद्दत से.
मै देर रात तक जागूँ तो ,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
कुछ बातें थीं फूलों जैसी,
कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,
मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
वो पल भर की नाराजगियाँ,
और मान भी जाना पलभर में,
अब खुद से भी रूठूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं...��

Friday, November 7, 2014

स्व.डा। रूपेंद्र खरे -यात्रा अनंत की ओर। ....

डा.रूपेंद्र !

(1935 -1995 )

मेरे पापा!


मेरे प्यारे पापा!
"शिद्दत से ढूंढ़ता हूँ आपको 
अपने अंदर.....
आपके जाने के इतने साल बाद भी....
आपका बेटा हूँ न!
जब जब कोई नीचा दिखाता है आपका कन्धा आपके बाजू याद आते हैं जहाँ अक्सर मैं चिपक कर सबकुछ भूल जाता था!
जब जब कोई ऊँचा उठाता है, सम्मान और इज़्ज़त देता है और कहता है -डाक्टर रूपेंद्र का बेटा है तो बरबस आँखों के बिनबुलाये आंसू आपको तलाशते हैं कि - काश आप होते!
जब गुस्से में झल्लाता हूँ तो सब कहते हैं कि - गुस्सा पापा पे गया है!
जब कोई चुनौती देता है तो कह देता हूँ कि -मेरी वल्दियत देख लेना ;टूटना मंजूर हैं झुकना नहीं!
और -जब लिखता हूँ.....
बोलता हूँ..... या -किसी के सामने झुक कर पैर छूता हूँ तो सब कहतें हैं कि-अपने पापा पे गया है!
मेरे प्यारे पापा!
आपके जाने के बीस साल बाद भी.....
रंगीला बन....... रंगा हुआ हूँ  …
उन्हीं रंगों में -जो आपने उकेरे थे ;
अपने ' बेटे 'के अंतर्मन में!
हर 'पिता ' घबराता है जब बच्चे बड़े होते हैं,
क्यों कि-
यह पाठ तो पापा ने बताया नहीं था....
क्या करें? उस पल..... इस पल....
सच......
आप याद आतें हैं!
गिरुं तो आप? टूटूं तो आप?
दुखी तो आप? परेशान तो आप?
प्यार तो आप! पवित्रता तो आप ?
माँ तो आप! पापा तो आप!
दिलासा तो आप!
ख़ुशी तो आप! 
सफलता तो आप! हंसी तो आप! 
और सुख तो आप!
मन घबराता है.... आप जो नहीं हो......
बस....
हिम्मत देना की वो कर जाऊँ
जिससे कभी -मैं भी......
आपके जैसा याद किया जाऊँ! "

                                        परिचय :
"बुंदेलखंड अंचल में पत्रकारता के जनक स्व. डॉक्टर रूपेंद्र खरे ने 1970 के दशक में आज के लवकुशनगर में अपना निजी चिकित्सालय खोला था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से चिकित्सा की स्नातक उपाधि प्राप्त कर उन्होंने लवकुशनगर में चिकित्सक बन जन सेवा शुरू की थी। उनके कुशल चिकित्सक ,बेबाक पत्रकार और एक ईमानदार ,स्पष्ट वक्ता एवं मृदुभाषी जिंदादिल इंसान की मिसालें आज भी लोग देतें हैं।" पत्रकारिता में वे इस अंचल के जनक थे। 
शत शत नमन !
चरणों को सिर रख कर प्रणाम !
श्रद्धानवत -
शानू -वंदना ,आशीष -अर्चना ,
सब्यसांची ,यश्वी व यश। 

प्रतिष्ठान -(पापा !आप की कृपा से सब काम हो रहें हैं  ....... )
  • RK Teachers Training Institute-Lav Kush Nagar. 
  • RK College Of Science and Technology Lav Kush Nagar
  • RK Hospitality Ventures. 
  • Travel Xpert Khajuraho.  




Wednesday, November 5, 2014

औकात!

कुछ पंक्तियां:

मै सूरज के साथ रहकर भी भूला नही अदब,
लोग जुगनू का साथ पाकर... मगरूर हो गये.

खुद मे काबिलीयत हो तो...भरोसा कीजिये,
सहारे कितने भी अच्छे हों...साथ छोड़ जाते हैं.

सच की हालत किसी तवायफ सी है,
तलबगार बहुत हैं तरफदार कोई नही.

आदमी ही आदमी का रास्ता काट रहा है,
बिल्लियां तो बेचारी बेरोजगार बैठी हैं.

मुद्दतों बाद किसी ने पूछा- कहां रहते हो,
मैने मुस्करा कर कहा- अपनी औकात मे.