Friday, April 28, 2017

पगडंडियों से गुज़रती ज़िन्दगी और मैं !!

कभी कभी ...
बढ़ी हुई दाढ़ी ..
बिखरी हुई बेतरतीब जुल्फें भी ...
इंसान के ऊपर खूब जंचती हैं !
क्यूंकि ..
वही शगल बताती है ..
इंसानी फितरत जज्बा और औकात ..
कि मेहनत और संघर्ष ही गुरुमंत्र हैं ..
ज़िन्दगी को ज़हीनियत से जीने के लिए !

पसीने की चुचुहाती बूंदें ..
बनियान और चड्डी के फ़टे हुए छेद ..
घिसी हुई चप्पलें ...
ट्रैन की जनरल बोगी का सफर ..
स्लीपर क्लास के रिज़र्वेशन की जदोजहद ..
गंतव्य पर रिक्शे वाले से मोलभाव ..
गुमटी में चाय और टोस्ट को डुबा कर सस्ते पेट भरने की मानव कोशिश ..
जैसे फलसफे ;
प्रयास हैं ...
मानव मन के ...
निर्मल,निर्लिप्त और निर्विकार होकर ...
ज़िन्दगी से हार न मान ..
तालमेल बैठाने की ...
निस्पृह शगल का !

कुरता पजामे और चश्मे से सजे पिताजी ..
बेंत ,सरौते और जर्दा सुपारी से लैस दादाजी ..
गोलमिठाई पारले जी बिस्किट और पेठे से लदे नानाजी ...
मूंगफली खाते कड़क गुरूजी ...
बरी और चिप्स बनाती बूढी होती अम्मा ..
क्रोशिये से स्वेटर बुनती बुआ  ...
अक्सर याद दिला जाते हैं ...
सन सत्तर से अस्सी के दशकों के ....
ग्रामीण मासूम भारत के ...
कालजई कथानकों को !

वो एक समय था जब
एक पीढ़ी ...
जिसने देश को स्वतन्त्रता दिलवाई थी ...
हमसे जुदा हो रही थी ...
और हाशिये पर जा रहे थे .. संस्कार;
पुरातन देश की पुरातन सभ्यता के !

लालटेन,दीपक,और ....
हाँथ का पंखा ...
विदा की पालकी लिए ;कहार और
हाँथ गाड़ी जैसी ...
बेशुमार चीज़ें ...
अब ग्रामीण भारतीय इतिहास के झरोखे की ... विरासत हैं !
बिलकुल वैसे ही जैसे -
मर्फी का रेडियो या टेपरिकॉर्डर ,ग्रामोफोन और ब्लैक एंड वाइट टीवी ;
कभी हमारे शहरी होने का सर्टिफिकेट होते थे !

अब तो कंघी करती अम्मा ..
उबटन लगाती बहन ..
लौकी का हलुआ बनाती बुआ और देवर की शादी की बात चलाती ;
भौजी भी ...
न जाने ...
किस देश को चली गईं हैं ?

सच इस पागलपन ने ..
कितना पगला दिया है हमें ?

इस दौड़ ने कितना ...
दौड़ा दिया है हमें ?

इस न ख़तम होने वाली हवस ने ...
कितना बौरा दिया है हमें ?

ज़िन्दगी तो ...
अपनी खटारा बस की ..
रफ्तार से ,
चलती ही जा रही है जनाब !

हाँ ! कहीं फटी फ़टी है तो ..
कहीं कहीं छुपी छुपी सी है !

हर कोई अपनी ज़िन्दगी की रफ़ूगीरी कर के ..
छुपा रहा है अपना गमज़दा चेहरा !

अरे छोड़ सारी फ़ज़ीहतें और मक्कारियां ..
और बस ...
"मिट्टी से पूछ आजकल सिकंदर कहाँ है" ???

[GARVIT GAURAV! ]

Thursday, April 27, 2017

न कुछ कथनी है और न कुछ करनी है !!"

"एक दिन..
कुछ ऐसे ही ..
तोड़ दूंगा ये ..
रात और दिन का दुष्चक्र ..
और चल दूंगा ..
निष्चक्र ..
स्वछंद आकाश और
शायद अंतरिक्ष के दरमियान कहीं ..
बेसुध,बेआवाज़,बेवजह ...
बमुश्किल ...
चंद दशकों बाद !!

चींटी से लेकर हांथी तक ..
और इंसान से लेकर ..
हैवान तक ..
वो आएगी जरूर और
चल देगी गोद में उठा ..
बेवक़्त बेसुध और बेवजह !

इतरा मत !!
इस धरती पर ...
तेरी क्या औकात ??
रे मानव !

राम से लेकर माधव तक ..
रावण से लेकर कंस तक ..
राजकपूर से लेकर बिनोद खन्ना तक ....
और तुझ से लेकर मुझ तक ....
एक दिन औकात सबको पता चलनी है ..
सिर्फ आग जलनी है और ..
"तुझे-मुझे" ...
धुंआ धुंआ बन ...
राख बननी है !!

फिर वही ...
माँ गंगा के इलाहाबाद में ..
संगम की धार मिलनी है !

न कुछ कथनी है ...
न कुछ करनी है !

बस विश्वास रख ..
हम सब की ...
वक़्त वक़्त पर ...
चिता जलनी है !

न कुछ कथनी है ...
और न कुछ करनी है !!"

Garvit Gaurav!!

एक दिन ;सबको ... यूँ ही चले जाना है !

एक दिन ;सबको ...
यूँ ही चले जाना है !

ये पानी का बुलबुला ...
झट से फूट जाना है !

चार हाथों को ..
धीरे से उठाना है और ...
मिट्टी के मानुस को ...
मिट्टी में फूंक आना है !

मत इतरा ..
अपनी दौलत पे ;
सब यहीं पड़ा रह जाना है !

Wednesday, April 19, 2017

सेवा सहकारी समितियों की फसल खरीदी में ज़मीन आसमान का अंतर !घोटाले की आशंका !


जिले में वर्तमान में सहकारिता के माध्यम से किसान अपनी मेहनत से उपजाई फसलों को सरकार की अधिकृत सेवा सहकारी समितियों को बेंच रहा है। शासन का प्रयास है कि -मिट्टी के मानुस को उसकी मिट्टी से उपजाई फसल का सही एवं वाजिब दाम मिले !इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु शासन ने समितियों को अपने क्षेत्र के किसानों के बैंक खाते खोलने पर जोर दिया था। एवं इसी लक्ष्यपूर्ति हेतु समितियों ने खाते भी खुलवाए गए। चूँकि २०११ के सेंसस अनुसार छतरपुर ग्रामीण का साक्षरता रेट 59. २२% था तो ग्रामीणों एवं विशेषकर किसानों का इतनी जल्दी बैंक या ऑनलाइन फ्रेंडली लेनदेन करने लगना ;कुछ अजीब सा लगता है। 
जरा गौर करें :
  • कृषि उपज मंडी महाराजपुर अंतर्गत मनकारी सेवा सहकारी  समिति की दिनांक १५/४/१७ तक गेहूं खरीदी लगभग ३००००/-क्विंटल !
  • कटेहरा सेवा सहकारी समिति की दिनांक १५/४/१७ तक गेहूं खरीदी लगभग १२००० क्विंटल और 
  • लवकुशनगर सेवा सहकारी समिति की दिनांक १५/४/१७ तक गेहूं खरीदी लगभग ३५० क्विंटल !
आकंड़े कुछ गड़बड़ और अप्रत्याशित नहीं दिखते ?
  • मनकारी @३०००० क्विंटल 
  • कटेहरा @१२०००  क्विंटल 
  • और लवकुशनगर @३५० क्विंटल !
ऐसा क्यों ?
लवकुशनगर इतना कम क्यों ??और
मनकारी इतना ज्यादा क्यों ??
क्या मनकारी में किसानों ने बेहतरीन फसल पैदा की एवं भगवान् ने भी बदले में कृपा की बरसात की ?
और वहीँ लवकुशनगर में किसान आलसी था और भगवान् बेहद नाराज़ ??
या किसानों के ऑनलाइन पंजीयन में कोई घोटाला छुपा हुआ है ???
RTI वाले थोड़ा एक RTI लगा दें कि -
वे कौन कौन से किसान हैं जिनकी कटेहरा एवं मनकारी सेवा सहकारी समिति ने फसल खरीदी कर के बैंक के माध्यम से भुगतान किया है ??
एवं उनके खेत में दर्शाई फसल उतनी वजन की पैदावार हुई भी है अथवा नहीं ???
ऑनलाइन खातों में भुगतान किसानों को हो भी रहा है अथवा समिति सेवकों और गल्ला व्यापारियों के अच्छे दिन आ गए हैं ??
कृषि विशेषज्ञ और समाज सेवी थोड़ी इस ओर भी नज़र दौड़ाएं !
कुछ न कुछ गड़बड़ हो सकती है !
हक़ीक़त में सहकारिता में बहुत बड़ा घोटाला हो रहा है जिसमें अन्य विभागों  के चौकीदार भी मिले हुए हैं ! कोऑपरेटिव बैंक , सोसाइटी का समिति सेवक , बेअरहॉउस एवं मंडी स्तरीय कर्मचारियों का कुछ ऐसा तालमेल है कि -"धीमीं धीमीं आंच में खिचड़ी भी पक रही है और किसी को आभास तक नहीं हो रहा है; इस मायावी षड्यंत्र का !"

षड्यंत्र का सूत्रधार कौन ??

समिति सेवक ही अपनी रिस्क पर किसान का -कोऑपरेटिव बैंक का खाता खोलता है व् उसके हस्ताक्षर /अंगूठा लगाता है एवं बाउचर भर के राशि आहरण करता है ! और कोऑपरेटिव बैंक के धुरंधर बिना सशरीर /फिजिकल वेरिफिकेशन किये ऑनलाइन ट्रांसैक्शन में किसान के खाते में जमा की गई राशि समिति सेवक द्वारा भरे गए बाउचर या विथड्रावल फॉर्म से निकाल कर समिति सेवक को थमा देते है !बिचारे किसान को पता ही नहीं चलता कि -उसके और खेत के नाम से कागज़ों में समितिसेवक ने खेती भी कर ली है फसल भी सरकारी रेट पर समिति को बेच दी है और राशि उसके नाम के खाते से आहरण भी कर ली गई है !

कैसे होता है समितिसेवक को फायदा :

समितिसेवक-बैंक और मॉनिटरिंग अधिकारियों का आपसी तालमेल ही सुर लय और ताल में-
"हाय-किसान हाय-किसान" बोलकर भ्रष्टाचार को जन्म देता है !
माना की -
"व्यापारी १३५० /-रुपए में किसान से उसका गेहूं थोक में उसके ही गाँव में लेता है एवं उस गेहूं को सरकारी खरीद के १६२०/-रुपए के मूल्य पर समितिसेवक को पटा कर किसी किसान के ऑनलाइन खाते में दर्ज करवा कर बेच देता है !
अर्थात ०१ क्विंटल पर २७०/-रुपए खाये गए एवं इसी प्रकार १०० क्विंटल गेहूं खरीदी पर २७०००/-रुपए खाये जा रहे हैं !
अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि -
"किसी समिति की ३०००० क्विंटल खरीद कैसे और क्यों हो रही है और कितने लाख या करोड़ का घोटाला अवश्यसंभावी है !"
  • मनकारी में तो बिहार से आये पल्लेदार ट्रकों से माल उतार रहे हैं और इससे तो ऐसा लगता है कि -मनकारी में कोई बेरोज़गार ही नहीं है एवं पूरे गाँव में सुख एवं सम्पन्नता है !
  • क्षेत्र के एक विशेष बैंक की शाखा में तो समितिसेवकों द्वारा ५०००/-रुपए प्रतिदिन के हिसाब से बैंक कर्मियों को ओवरटाइम एवं रिस्क बेनीफिट मुहैया करवाया जा रहा है !आखिर नौकरी को खतरे में समितिसेवक के साथ साथ बैंक प्रबंधन भी तो डाल रहा है !
  • सुनते हैं कि -एक गाँव में तो समितिसेवक ने मुफ्त चाय पान का डिब्बा तक खुलवा दिया है जिससे किसानों के विरोध के स्वर मुखर रूप न अख्तियार कर लें !
  • क्यूंकि कुछ गिने-चुने ईमानदार किसानों का गेहूं दो -दो दिन तक नहीं तुलता है और सेठ साहूकारों का "ऑनलाइन सेटिंग " वाला गेहूं तुरंत तौल दिया जाता है !एवं पैसा भी खाते में पहुँच कर -आहरण या विथड्रॉल दिखा दिया जाता है !यह भी यही जांच का विषय है कि- किसान इतना बैंक फ्रेंडली कब से हो गया की खाते में रकम पहुंची नहीं कि उसके द्वारा निकाल ली गई ????कुछ ईमानदार किसान हैं जिनका पैसा उनके खाते में नहीं आ रहा है क्यूंकि उन्हें किसी को खिलाना पिलाना नहीं है और न वे कहीं भी बिके हैं !
अगर प्रशासन निष्पक्ष जांच करवाने हेतु किसानों के द्वारा आहरित की गई राशि के बाउचर में दर्ज हस्ताक्षर /अंगूठे ; किसान को बुला कर पुनः हस्ताक्षर करवा कर एक जांच कमिटी के सामने प्रमाणित करवाए तो -सहकारिता को दुष्प्रचारित करने वाले भ्रष्टाचारियों को पर्दाफाश एवं नस्तनाबूत होने में देर नहीं लगेगी !

Tuesday, April 11, 2017

सच्ची मोहब्बत!

सच्ची मोहब्बत वह है जो-
"न मुक़म्मल होने पर ..
आहिस्ता से भुला दी जाए!
न कि खुद को और ...
ज़माने भर को उसकी ...
सज़ा दी जाए !"

तू अपने इश्क़ के परदे को ..
बेपनाह पाकीज़गी से ..
पर्दा ही बना कर रख !
फिजूल बेपर्दा कर उसे ...
नुमाइशों के जलसे में ...
न तब्दील कर !

जब वो  ...
रुखसत हो गई ...
तुझे अकेला छोड़ ...
अपने हमसफ़र संग !
तो तू क्यों ?
उसकी यादों को ...
"ताज़िया" बना कर ..
खड़ा है खानाबदोशों की तरह ?

अरे ; उठ और ..
झझकोर कर उखाड़ फेंक ..
ये यादें जो तुझे ...
जीने नहीं दे रही और ..
देख ..
बहुत सी नवतरंगें ...
तेरा इन्तिज़ार कर रही हैं !

याद रख !
मोहब्बत का इन्तिक़ाम ...
बर्बाद होना या ...
करना नहीं है !

मोहब्बत में बदला लेने के लिए ...
साबित करना पड़ता है कि -
देख तू गलत थी !
देख मैं टूटा नहीं ; बिन तेरे !
देख ; मैंने बन कर दिखाया अपना वज़ूद !
देख मैं झूंठा नहीं था और बेवफा भी नहीं !

Garvit Gaurav!!

Saturday, April 8, 2017

एक तस्वीर;कई मायने!

"टेढ़ी मेढ़ी लकड़ी ..
गुज़रती उम्र ने ...
अपने हाथों से जकड़ी !

बूढी और जर्जर होती ...
मगर होंसले से भरी
पिताजी की काया ;
ईश्वरीय माया !

पिता के बाज़ू में ...
काँधे से सर टिकाये बैठी; बेटी ..
नश्वर संसार का ...
अप्रतिम आलौकिक पूज्य रिश्ता !
और
खेती या कृषि व्यवसाय !
इंसान के -
आदम से आदमीं बनने के बीच का
एकमात्र रोज़गार जो
समय के साथ
बदला नहीं !!"

Tuesday, April 4, 2017

प्रभु श्रीराम से बड़ा श्रीराम का नाम

आदरणीय मित्रो!
जय श्री राम!
इस रामनवमीं आईये अपने अंदर के हनुमान को ढूंढे जो हमें प्रभु श्री राम के और करीब ले जाने में मदद करे !
आइये चलें दो कदम ...
राम की ओर !
आपको शायद न पता हो कि जब आदरणीय वाल्मीकि जी ने रामायण लिखी थी उसी समय एक और रामायण हनुमान जी ने भी १२ केले के पत्तों पर लिखी थी !
हनुमान जी की रामायण जिसने भी सुनी उसने बहुत तारीफ़ की और तारीफ़ इतनी अधिक हुई कि वाल्मीकि जी को हनुमान जी की रामायण से चिंता होने लगी और उन्होंने सोचा कि यदि हनुमान जी की रामायण इतनी अच्छी है तो फिर उनकी रामायण कौन पढ़ेगा ? चिंता और कौतुहल वश वाल्मीकि जी भी हनुमान की रामायण देखने और पढ़ने सकुचाते हुए पहुँच गए !
हनुमान जी ने बड़ी श्रद्धा से श्री वाल्मीकि जी का स्वागत किया और अपनी रामायण दिखाई !
रामायण पढ़ कर वाल्मीकि जी रोने लगे !
हनुमान जी घबरा गए कि -"शायद उन्होंने लेखन में कुछ त्रुटि कर दी है एवम जिससे प्रभु राम का अपमान हुआ है !"
अपराध बोध से हनुमान जी ने वाल्मीकि जी से रोने का कारण पूंछा ? तो वाल्मीकि जी बोले कि -"आपने इतनी सुन्दर रामायण लिखी है कि मेरे बरबस आंसू ढलक पड़े और अब मैं सोचता हूँ कि  -आपकी रामायण के सामने अब -"मेरी रामायण कौन पढ़ेगा ? आपकी इतनी भावपूर्ण और प्रेरक जो ठहरी !"
इतना सुन कर हनुमान जी ने १२ केले के पत्तों पर लिखी रामायण को कई टुकड़ों में फाड़ दिया !
वाल्मीकि आश्चर्यचकित रह गए कि -"हनुमान ने यह क्या किया !"
हनुमान जी ने वाल्मीकि की और देखा और बोले -"हे भगवन !अब आप निश्चिन्त  जाइए ! अब दुनियां सदा आपकी रामायण ही पढ़ेगी ! उसे मेरी रामायण न देखने को मिलेगी और न सुनने को !
वाल्मीकि ने पूंछा -मगर आपने अपनी रामायण क्यों फाड़ी ?
हनुमान बोले- "मैंने जिसके लिए लिखी थी उसने पढ़ ली  सो मेरा ध्येय पूरा हुआ !"
न मैंने किसी और के पढ़ने के लिए यह स्वरचित रामायण लिखी थी और न मुझे 'वाही वाही' पाने की इच्छा थी !
हनुमान जी बोले -"यह रचना तो मैंने अपने प्रभु श्री राम के लिए लिखी थी एवम इससे दुनिया का क्या सम्बन्ध ?
"राम मेरे हैं और मैंने उनके साथ चन्द कदमों का अनुगमन किया है सो अपने अनुभव लिख दिए !"
"न किसी ने मुझसे रामायण लिखने को कहा था और न किसी के लिए मैंने यह रामायण लिखी है !
जिसके लिए लिखी है वे मेरे आराध्य प्रभु श्री राम हैं !"
"सारी दुनिया आपकी रामायण पढ़ कर प्रभु श्री राम के सदमार्ग का अनुगमन करे;  मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ !"
इतना कह कर हनुमान जी अपने आराध्य प्रभु श्री राम के भजन में लींन हो गए !
मैं आपके नाम काम और प्रसिद्धि के बीच नहीं आना चाहता !
कथा सार :
हम सभी की ज़िन्दगी में बहुत सी परछाईयाँ ऐसी भी हैं जिन्हें हम इस वर्णित कहानी के "श्री हनुमान" कह सकते हैं !
वे हनुमान बन सदा आपके पीछे खड़े रहते हैं ; आपको  सफलता और प्रसिद्धि दिलाने के लिए !
उन्हें स्वयं की प्रसिद्धि की चिंता न होकर आपकी सफलता की कामना सताती है !
मित्रो !
"राम से बड़ा राम का नाम है !"
किसी के जीवन में श्री हनुमान बन उसकी मदद करें तो निश्चित ही हम प्रभु श्री राम के करीब अपने आप को पाएंगे !
इस रामनवमीं चलो किसी की ज़िन्दगी में परोक्ष रूप में श्री हनुमान बन उसे सम्बल प्रदान करें !
रामनवमीं की शुभकामनाएं !!
जय श्री राम !
"प्रभु श्री राम से बड़ा प्रभु श्री राम का नाम !"
("गर्वित गौरव" द्वारा अनुवादित!)

Monday, April 3, 2017

लवकुशनगर की डायरी!लवकुशनगर में बोरिंग माफिया सक्रीय !

"बोरिंग दलालों की पौ बारह और लवकुशनगर का घटता जल स्तर !"
कलेक्टर महोदय की दखल की दरकार !
नगर में गरमीं सर चढ़ कर बोल रही है !चारों तरफ बिन हरियाली से नंगे पहाड़ों वाला यह नगर दिन भर सूरज की कृपा और कोप से ४४ डिग्री पर तपता है और सांझ ढलते ही यह ४४ डिग्री के गरम पहाड़ अपनी भाप निकाल कर ठन्डे होते हैं और यह बिचारा नगर कूलर और पंखों के सहारे सोता है !
लगभग २५००० हज़ार की
आबादी वाले लवकुशनगर में कुलमिलाकर १५ घरों में ही ऐ.सी. या एयर कंडीशन सिस्टम मौजूद है ! शेष जनता आज भी खस और घांस से भीगे हुए कूलरों या पंखों और छतों पर सो कर ज़िन्दगी और उसकी गर्मी गुज़ार रहे हैं या गुलज़ार और आबाद कर रहे हैं !
सर्राफ सागर और बड़े तालाब के बचे खुचे पानी ने
फिलहाल नगर का पर्यावरण एवम परिस्तिथिकी सम्भाली  हुई हैं !
ऐसे परिस्तिथियों सरेआम बोरिंग करने वाले ठेकेदार नगर में अपने दस चका बोरिंग मशीन और ट्रैक्टर मशीन के सहारे ज़मीन को रौंद और खोद कर भूजल स्तर नीचा कर रहे हैं और प्रशासन शांत है !
जिस प्रकार जिले के बकस्वाहा विकासखण्ड को माननीय कलेक्टर महोदय ने जल अभावग्रस्त घोषित कर के बोरिंग पर रोक लगा दी है वैसे ही प्रशासन से लवकुशनगर में भी बोरिंग पर रोक लगाने की अपेक्षा है !