कभी कभी ...
बढ़ी हुई दाढ़ी ..
बिखरी हुई बेतरतीब जुल्फें भी ...
इंसान के ऊपर खूब जंचती हैं !
क्यूंकि ..
वही शगल बताती है ..
इंसानी फितरत जज्बा और औकात ..
कि मेहनत और संघर्ष ही गुरुमंत्र हैं ..
ज़िन्दगी को ज़हीनियत से जीने के लिए !
पसीने की चुचुहाती बूंदें ..
बनियान और चड्डी के फ़टे हुए छेद ..
घिसी हुई चप्पलें ...
ट्रैन की जनरल बोगी का सफर ..
स्लीपर क्लास के रिज़र्वेशन की जदोजहद ..
गंतव्य पर रिक्शे वाले से मोलभाव ..
गुमटी में चाय और टोस्ट को डुबा कर सस्ते पेट भरने की मानव कोशिश ..
जैसे फलसफे ;
प्रयास हैं ...
मानव मन के ...
निर्मल,निर्लिप्त और निर्विकार होकर ...
ज़िन्दगी से हार न मान ..
तालमेल बैठाने की ...
निस्पृह शगल का !
कुरता पजामे और चश्मे से सजे पिताजी ..
बेंत ,सरौते और जर्दा सुपारी से लैस दादाजी ..
गोलमिठाई पारले जी बिस्किट और पेठे से लदे नानाजी ...
मूंगफली खाते कड़क गुरूजी ...
बरी और चिप्स बनाती बूढी होती अम्मा ..
क्रोशिये से स्वेटर बुनती बुआ ...
अक्सर याद दिला जाते हैं ...
सन सत्तर से अस्सी के दशकों के ....
ग्रामीण मासूम भारत के ...
कालजई कथानकों को !
वो एक समय था जब
एक पीढ़ी ...
जिसने देश को स्वतन्त्रता दिलवाई थी ...
हमसे जुदा हो रही थी ...
और हाशिये पर जा रहे थे .. संस्कार;
पुरातन देश की पुरातन सभ्यता के !
लालटेन,दीपक,और ....
हाँथ का पंखा ...
विदा की पालकी लिए ;कहार और
हाँथ गाड़ी जैसी ...
बेशुमार चीज़ें ...
अब ग्रामीण भारतीय इतिहास के झरोखे की ... विरासत हैं !
बिलकुल वैसे ही जैसे -
मर्फी का रेडियो या टेपरिकॉर्डर ,ग्रामोफोन और ब्लैक एंड वाइट टीवी ;
कभी हमारे शहरी होने का सर्टिफिकेट होते थे !
अब तो कंघी करती अम्मा ..
उबटन लगाती बहन ..
लौकी का हलुआ बनाती बुआ और देवर की शादी की बात चलाती ;
भौजी भी ...
न जाने ...
किस देश को चली गईं हैं ?
सच इस पागलपन ने ..
कितना पगला दिया है हमें ?
इस दौड़ ने कितना ...
दौड़ा दिया है हमें ?
इस न ख़तम होने वाली हवस ने ...
कितना बौरा दिया है हमें ?
ज़िन्दगी तो ...
अपनी खटारा बस की ..
रफ्तार से ,
चलती ही जा रही है जनाब !
हाँ ! कहीं फटी फ़टी है तो ..
कहीं कहीं छुपी छुपी सी है !
हर कोई अपनी ज़िन्दगी की रफ़ूगीरी कर के ..
छुपा रहा है अपना गमज़दा चेहरा !
अरे छोड़ सारी फ़ज़ीहतें और मक्कारियां ..
और बस ...
"मिट्टी से पूछ आजकल सिकंदर कहाँ है" ???
[GARVIT GAURAV! ]