जिले में वर्तमान में सहकारिता के माध्यम से किसान अपनी मेहनत से उपजाई फसलों को सरकार की अधिकृत सेवा सहकारी समितियों को बेंच रहा है। शासन का प्रयास है कि -मिट्टी के मानुस को उसकी मिट्टी से उपजाई फसल का सही एवं वाजिब दाम मिले !इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु शासन ने समितियों को अपने क्षेत्र के किसानों के बैंक खाते खोलने पर जोर दिया था। एवं इसी लक्ष्यपूर्ति हेतु समितियों ने खाते भी खुलवाए गए। चूँकि २०११ के सेंसस अनुसार छतरपुर ग्रामीण का साक्षरता रेट 59. २२% था तो ग्रामीणों एवं विशेषकर किसानों का इतनी जल्दी बैंक या ऑनलाइन फ्रेंडली लेनदेन करने लगना ;कुछ अजीब सा लगता है।
जरा गौर करें :
- कृषि उपज मंडी महाराजपुर अंतर्गत मनकारी सेवा सहकारी समिति की दिनांक १५/४/१७ तक गेहूं खरीदी लगभग ३००००/-क्विंटल !
- कटेहरा सेवा सहकारी समिति की दिनांक १५/४/१७ तक गेहूं खरीदी लगभग १२००० क्विंटल और
- लवकुशनगर सेवा सहकारी समिति की दिनांक १५/४/१७ तक गेहूं खरीदी लगभग ३५० क्विंटल !
- मनकारी @३०००० क्विंटल
- कटेहरा @१२००० क्विंटल
- और लवकुशनगर @३५० क्विंटल !
लवकुशनगर इतना कम क्यों ??और
मनकारी इतना ज्यादा क्यों ?? क्या मनकारी में किसानों ने बेहतरीन फसल पैदा की एवं भगवान् ने भी बदले में कृपा की बरसात की ?
और वहीँ लवकुशनगर में किसान आलसी था और भगवान् बेहद नाराज़ ??
या किसानों के ऑनलाइन पंजीयन में कोई घोटाला छुपा हुआ है ???
RTI वाले थोड़ा एक RTI लगा दें कि -कृषि विशेषज्ञ और समाज सेवी थोड़ी इस ओर भी नज़र दौड़ाएं !
वे कौन कौन से किसान हैं जिनकी कटेहरा एवं मनकारी सेवा सहकारी समिति ने फसल खरीदी कर के बैंक के माध्यम से भुगतान किया है ??
एवं उनके खेत में दर्शाई फसल उतनी वजन की पैदावार हुई भी है अथवा नहीं ???
ऑनलाइन खातों में भुगतान किसानों को हो भी रहा है अथवा समिति सेवकों और गल्ला व्यापारियों के अच्छे दिन आ गए हैं ??
कुछ न कुछ गड़बड़ हो सकती है !
हक़ीक़त में सहकारिता में बहुत बड़ा घोटाला हो रहा है जिसमें अन्य विभागों के चौकीदार भी मिले हुए हैं ! कोऑपरेटिव बैंक , सोसाइटी का समिति सेवक , बेअरहॉउस एवं मंडी स्तरीय कर्मचारियों का कुछ ऐसा तालमेल है कि -"धीमीं धीमीं आंच में खिचड़ी भी पक रही है और किसी को आभास तक नहीं हो रहा है; इस मायावी षड्यंत्र का !"
षड्यंत्र का सूत्रधार कौन ??
समिति सेवक ही अपनी रिस्क पर किसान का -कोऑपरेटिव बैंक का खाता खोलता है व् उसके हस्ताक्षर /अंगूठा लगाता है एवं बाउचर भर के राशि आहरण करता है ! और कोऑपरेटिव बैंक के धुरंधर बिना सशरीर /फिजिकल वेरिफिकेशन किये ऑनलाइन ट्रांसैक्शन में किसान के खाते में जमा की गई राशि समिति सेवक द्वारा भरे गए बाउचर या विथड्रावल फॉर्म से निकाल कर समिति सेवक को थमा देते है !बिचारे किसान को पता ही नहीं चलता कि -उसके और खेत के नाम से कागज़ों में समितिसेवक ने खेती भी कर ली है फसल भी सरकारी रेट पर समिति को बेच दी है और राशि उसके नाम के खाते से आहरण भी कर ली गई है !
कैसे होता है समितिसेवक को फायदा :
समितिसेवक-बैंक और मॉनिटरिंग अधिकारियों का आपसी तालमेल ही सुर लय और ताल में-
"हाय-किसान हाय-किसान" बोलकर भ्रष्टाचार को जन्म देता है !
माना की -
माना की -
"व्यापारी १३५० /-रुपए में किसान से उसका गेहूं थोक में उसके ही गाँव में लेता है एवं उस गेहूं को सरकारी खरीद के १६२०/-रुपए के मूल्य पर समितिसेवक को पटा कर किसी किसान के ऑनलाइन खाते में दर्ज करवा कर बेच देता है !
अर्थात ०१ क्विंटल पर २७०/-रुपए खाये गए एवं इसी प्रकार १०० क्विंटल गेहूं खरीदी पर २७०००/-रुपए खाये जा रहे हैं !
अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि -
"किसी समिति की ३०००० क्विंटल खरीद कैसे और क्यों हो रही है और कितने लाख या करोड़ का घोटाला अवश्यसंभावी है !"
- मनकारी में तो बिहार से आये पल्लेदार ट्रकों से माल उतार रहे हैं और इससे तो ऐसा लगता है कि -मनकारी में कोई बेरोज़गार ही नहीं है एवं पूरे गाँव में सुख एवं सम्पन्नता है !
- क्षेत्र के एक विशेष बैंक की शाखा में तो समितिसेवकों द्वारा ५०००/-रुपए प्रतिदिन के हिसाब से बैंक कर्मियों को ओवरटाइम एवं रिस्क बेनीफिट मुहैया करवाया जा रहा है !आखिर नौकरी को खतरे में समितिसेवक के साथ साथ बैंक प्रबंधन भी तो डाल रहा है !
- सुनते हैं कि -एक गाँव में तो समितिसेवक ने मुफ्त चाय पान का डिब्बा तक खुलवा दिया है जिससे किसानों के विरोध के स्वर मुखर रूप न अख्तियार कर लें !
- क्यूंकि कुछ गिने-चुने ईमानदार किसानों का गेहूं दो -दो दिन तक नहीं तुलता है और सेठ साहूकारों का "ऑनलाइन सेटिंग " वाला गेहूं तुरंत तौल दिया जाता है !एवं पैसा भी खाते में पहुँच कर -आहरण या विथड्रॉल दिखा दिया जाता है !यह भी यही जांच का विषय है कि- किसान इतना बैंक फ्रेंडली कब से हो गया की खाते में रकम पहुंची नहीं कि उसके द्वारा निकाल ली गई ????कुछ ईमानदार किसान हैं जिनका पैसा उनके खाते में नहीं आ रहा है क्यूंकि उन्हें किसी को खिलाना पिलाना नहीं है और न वे कहीं भी बिके हैं !
No comments:
Post a Comment