Tuesday, April 4, 2017

प्रभु श्रीराम से बड़ा श्रीराम का नाम

आदरणीय मित्रो!
जय श्री राम!
इस रामनवमीं आईये अपने अंदर के हनुमान को ढूंढे जो हमें प्रभु श्री राम के और करीब ले जाने में मदद करे !
आइये चलें दो कदम ...
राम की ओर !
आपको शायद न पता हो कि जब आदरणीय वाल्मीकि जी ने रामायण लिखी थी उसी समय एक और रामायण हनुमान जी ने भी १२ केले के पत्तों पर लिखी थी !
हनुमान जी की रामायण जिसने भी सुनी उसने बहुत तारीफ़ की और तारीफ़ इतनी अधिक हुई कि वाल्मीकि जी को हनुमान जी की रामायण से चिंता होने लगी और उन्होंने सोचा कि यदि हनुमान जी की रामायण इतनी अच्छी है तो फिर उनकी रामायण कौन पढ़ेगा ? चिंता और कौतुहल वश वाल्मीकि जी भी हनुमान की रामायण देखने और पढ़ने सकुचाते हुए पहुँच गए !
हनुमान जी ने बड़ी श्रद्धा से श्री वाल्मीकि जी का स्वागत किया और अपनी रामायण दिखाई !
रामायण पढ़ कर वाल्मीकि जी रोने लगे !
हनुमान जी घबरा गए कि -"शायद उन्होंने लेखन में कुछ त्रुटि कर दी है एवम जिससे प्रभु राम का अपमान हुआ है !"
अपराध बोध से हनुमान जी ने वाल्मीकि जी से रोने का कारण पूंछा ? तो वाल्मीकि जी बोले कि -"आपने इतनी सुन्दर रामायण लिखी है कि मेरे बरबस आंसू ढलक पड़े और अब मैं सोचता हूँ कि  -आपकी रामायण के सामने अब -"मेरी रामायण कौन पढ़ेगा ? आपकी इतनी भावपूर्ण और प्रेरक जो ठहरी !"
इतना सुन कर हनुमान जी ने १२ केले के पत्तों पर लिखी रामायण को कई टुकड़ों में फाड़ दिया !
वाल्मीकि आश्चर्यचकित रह गए कि -"हनुमान ने यह क्या किया !"
हनुमान जी ने वाल्मीकि की और देखा और बोले -"हे भगवन !अब आप निश्चिन्त  जाइए ! अब दुनियां सदा आपकी रामायण ही पढ़ेगी ! उसे मेरी रामायण न देखने को मिलेगी और न सुनने को !
वाल्मीकि ने पूंछा -मगर आपने अपनी रामायण क्यों फाड़ी ?
हनुमान बोले- "मैंने जिसके लिए लिखी थी उसने पढ़ ली  सो मेरा ध्येय पूरा हुआ !"
न मैंने किसी और के पढ़ने के लिए यह स्वरचित रामायण लिखी थी और न मुझे 'वाही वाही' पाने की इच्छा थी !
हनुमान जी बोले -"यह रचना तो मैंने अपने प्रभु श्री राम के लिए लिखी थी एवम इससे दुनिया का क्या सम्बन्ध ?
"राम मेरे हैं और मैंने उनके साथ चन्द कदमों का अनुगमन किया है सो अपने अनुभव लिख दिए !"
"न किसी ने मुझसे रामायण लिखने को कहा था और न किसी के लिए मैंने यह रामायण लिखी है !
जिसके लिए लिखी है वे मेरे आराध्य प्रभु श्री राम हैं !"
"सारी दुनिया आपकी रामायण पढ़ कर प्रभु श्री राम के सदमार्ग का अनुगमन करे;  मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ !"
इतना कह कर हनुमान जी अपने आराध्य प्रभु श्री राम के भजन में लींन हो गए !
मैं आपके नाम काम और प्रसिद्धि के बीच नहीं आना चाहता !
कथा सार :
हम सभी की ज़िन्दगी में बहुत सी परछाईयाँ ऐसी भी हैं जिन्हें हम इस वर्णित कहानी के "श्री हनुमान" कह सकते हैं !
वे हनुमान बन सदा आपके पीछे खड़े रहते हैं ; आपको  सफलता और प्रसिद्धि दिलाने के लिए !
उन्हें स्वयं की प्रसिद्धि की चिंता न होकर आपकी सफलता की कामना सताती है !
मित्रो !
"राम से बड़ा राम का नाम है !"
किसी के जीवन में श्री हनुमान बन उसकी मदद करें तो निश्चित ही हम प्रभु श्री राम के करीब अपने आप को पाएंगे !
इस रामनवमीं चलो किसी की ज़िन्दगी में परोक्ष रूप में श्री हनुमान बन उसे सम्बल प्रदान करें !
रामनवमीं की शुभकामनाएं !!
जय श्री राम !
"प्रभु श्री राम से बड़ा प्रभु श्री राम का नाम !"
("गर्वित गौरव" द्वारा अनुवादित!)

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