राम राज्य!
वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में :
१) जहाँ राज्य 'राम' द्वारा सुशासित तो हो अपितु कोई 'रावण' जैसा अत्याचारी शासक न हो!
२) जहाँ लोकतंत्र में कोई कैकई या मंथरा जैसी शख्सियतें न हों जो अम्मा बन या बहिन जी बन बाँट दें राज्य को या लूट लें राज्य को! (आरक्षण एवं भ्रष्टाचार!)
३) जहाँ शबरी के बेर (अस्पृश्यता!) कोई भी ग्रहण कर सकता हो!
४) जहाँ राज्य की रक्षा और कार्यप्रणाली के क्रियान्यवन में प्रतिभाओं के मध्य 'आरक्षण' का दावानल न हो जैसा की वास्तविक 'राम राज्य' में हुआ था -जहाँ वानरों ने इंसानों से हाथ मिलाया था!
५) जहाँ राम के वनवास पर जाने से कोई 'भरत' खड़ाऊ से न चलाये राज्य की सत्ता और परिवारवाद को बढ़ावा दे!
६) जहाँ भारतीयता रग रग में बसी हो जहाँ नौकरी के फॉर्म पे जति का कॉलम न हो और धर्म सिर्फ भारतीय हो!
७) जहाँ राजनीति को कैरियर बनाने वालों को अनिवार्य रूप से -पांच वर्ष भारत के गाँव में निवास कर खेती करना जरूरी हो!
८) जहाँ राज्य उत्तराध्कारी की गद्दी पर पिता के बाद पुत्र न बैठे!
९) जहाँ Military Services प्रत्येक नागरिक को ०२ वर्ष अनिवार्य हो!
१०) जहाँ शिखण्डिओं की कोई जगह न हो जो चापलूसी को ही महजब मानते हों!
धन्यवाद!
(गौरव खरे)
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'बुन्देली धमाका!'(गर्जना स्वाभिमान और आत्मबल की!) BUNDELI DHAMAKA...' समूचे बुंदेलखंड को एक मुखर मंच प्रदान करने का अभिनव प्रयास है 'बुन्देली धमाका' !हर चीज जिसका सम्बन्ध सुख-दुःख से हो अथवा भ्रष्टाचार-शिष्टाचार से हो या विकास-पतन से हो- यह ब्लॉग- महाराजा छत्रसाल की तलवार की भांति अपने उद्देश्य को पूरा करेगा!बुन्देली रिश्तों और उसकी सोच को नई परिभाषाओं मे बदलने का प्रयास करेगा यह मंच!पर्यटन और उसका आर्थिक प्रगति में योगदान सहित राजनीति तथा कूट नीति के असर पे भी हम बात करेंगे!!
Saturday, May 30, 2015
राम राज्य! क्या है?
Thursday, May 21, 2015
मिठास!
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मिठास
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चाय का कप लेकर आप
खिड़की के पास बैठे हों
और बाहर के सुंदर नज़ारे का
आनंद लेते हुए चाय की चुस्की लेते हैं
.....अरे चीनी डालना तो भूल ही गये..;
और तभी फिर से किचन मेँ जाकर
चीनी डालने का आलस आ गया....
आज फीकी चाय को जैसे तैसे
पी गए,कप खाली कर दिया
तभी आपकी नज़र कप के तल
में पड़ी बिना घुली चीनी पर
पडती है..!!
मुख पर मुस्कुराहट लिए सोच में पड
गये...चम्मच होता तो मिला लेता
हमारे जीवन मे भी कुछ ऐसा ही है...
सुख ही सुख बिखरा पड़ा है
हमारे आस पास...
लेकिन,
बिन घुली उस चीनी की तरह !!
थोड़ा सा ध्यान दें-
किसी के साथ हँसते-हँसते उतने ही
हक से रूठना भी आना चाहिए !
अपनो की आँख का पानी
धीरे से पोंछना आना चाहिए !
रिश्तेदारी और दोस्ती में कैसा
मान अपमान ?
बस अपनों के दिल मे रहना
आना चाहिए...!
प्यार एवं सत्संग रूपी चम्मच
से जीवन में मिठास घोलनी चाहिए!!
♑
चाँद नियति और दस्तूर!
आँखें मींच कर...
दिल सिकोड़ कर.....
ढाढस बाँध कर...
रख दिया है -तुझको
उसी जगह....
जहाँ
नियति ने मुक़म्मल किया था -तेरा-मेरा दस्तूर!
अगर जुदाई भी इक कहानी है तो -आमीन!
अगर बेवफाई भी इक रस्म है तो -अमीन!
अगर दिलों के दरख्तों का टूटना लाजमी है तो -सुम्मामीन!
पर यह न समझ लेना की फ़ना हुई मेरी मोहब्बत!
नहीं!
अभी नहीं!
साबित करूँगा मैं अपना वजूद..
और बताऊंगा की -
दूर से भले चाँद के चहरे पे बड़े बड़े गड्ढे दीखते हों पर हकीकत में तो...
उम्मीदों और ख़्वाबों के उन्नत शिखर हैं!
Monday, May 18, 2015
वक़्त लगता है!
पानी को बर्फ में
बदलने में वक्त लगता है ....
ढले हुए सूरज को
निकलने में वक्त लगता है ....
थोड़ा धीरज रख,
थोड़ा और जोर लगाता रह ....
किस्मत के जंग लगे दरवाजे को
खुलने में वक्त लगता है ....
कुछ देर रुकने के बाद
फिर से चल पड़ना दोस्त ....
हर ठोकर के बाद
संभलने में वक्त लगता है ....
बिखरेगी फिर वही चमक
तेरे वजूद से तू महसूस करना ....
टूटे हुए मन को
संवरने में थोड़ा वक्त लगता है ....
जो तूने कहा
कर दिखायेगा रख यकीन ....
गरजे जब बादल
तो बरसने में वक्त लगता है
Friday, May 15, 2015
Indian Pride!
Ten best Indian Army quotes: Must read. Really felt proud just by reading them.
"Either I will come back after hoisting the tricolor, or I will come back wrapped in it, but I will be back for sure.” – Capt. Vikram Batra, PVC
“What is a lifetime adventure for you is a daily routine for us.” – Ladakh Leh highway sign board
“If death strikes, before I prove my blood, I swear I’ll kill death.” – Capt. Manoj Kumar Pandey PVC 1/11 Gorkha Rifles
“Our flag does not fly because the wind moves it, it flies with the last breath of each soldier who died protecting it.”
“To find us, you must be good, to catch us you must be fast, but to beat us…………you must be kidding.”
“May God have mercy on our enemies, because we won’t.”
“We live by chance, we love by choice, we kill by profession.” – Officers Training Academy, Chennai
“If a man says he’s not afraid of dying, he’s either lying, or he’s a Gorkha.” – Field Marshal Sam Manekshaw
“It is God’s duty to forgive the enemies, but it’s our duty to convene a meeting between the two.”
“I regret I have but one life to give for my country.” – Prem Ramchandani
Life Tenure!
ज़िंदगी के 20 वर्ष हवा की तरह उड़ जाते हैं. फिर शुरू होती है नौकरी की खोज . ये नहीं वो , दूर नहीं पास . ऐसा करते 2-3 नौकरीयां छोड़ते पकड़ते , अंत में एक तय होती है. और ज़िंदगी में थोड़ी स्थिरता की शुरूआत होती है.
और हाथ में आता है पहली तनख्वाह का चेक , वह बैंक में जमा होता है और शुरू होता है अकाउंट में जमा होने वाले कुछ शून्यों का अंतहीन खेल.
इस तरह 2-3 वर्ष निकल जाते हैँ . 'वो' स्थिर होता है. बैंक में कुछ और शून्य जमा हो जाते हैं. इतने में आयु पच्चीस वर्ष हो जाते हैं.
विवाह की चर्चा शुरू हो जाती है. एक खुद की या माता पिता की पसंद की लड़की से यथा समय विवाह होता है और ज़िंदगी की राम कहानी शुरू हो जाती है.
शादी के पहले 2-3 साल नर्म , गुलाबी , रसीले और सपनीले गुज़रते हैं .
हाथों में हाथ डालकर बातें और रंग बिरंगे सपने . पर ये दिन जल्दी ही उड़ जाते हैं. और इसी समय शायद बैंक में कुछ शून्य कम होते हैं. क्योंकि थोड़ी मौजमस्ती, घूमनाफिरना , खरीदी होती है.
और फिर धीरे से बच्चे के आने की आहट होती है और वर्ष भर में पालना झूलने लगता है.
सारा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित हो जाता है. उसका खाना पीना , उठना बैठना , शु शु पाॅटी , उसके खिलौने, कपड़े और उसका लाड़ दुलार. समय कैसे फटाफट निकल जाता है.
इन सब में कब इसका हाथ उसके हाथ से निकल गया, बातें करना , घूमना फिरना कब बंद हो गया, दोनों को ही पता नहीं चला ?
इसी तरह उसकी सुबह होती गयी और. बच्चा बड़ा होता गया. .. वो बच्चे में व्यस्त होती गई और ये अपने काम में. घर की किस्त , गाड़ी की किस्त और बच्चे कि ज़िम्मेदारी . उसकी शिक्षा और भविष्य की सुविधा. और साथ ही बैंक में शून्य बढ़ाने का टेंशन. उसने पूरी तरह से अपने आप को काम में झोंक दिया.
बच्चे का स्कूल में एॅडमिशन हुआ और वह बड़ा होने लगा . उसका पूरा समय बच्चे के साथ बीतने लगा.
इतने में वो पैंतीस का हो गया. खूद का घर , गाड़ी और बैंक में कई सारे शून्य. फिर भी कुछ कमी है, पर वो क्या है समझ में नहीं आता. इस तरह उसकी चिढ़ चिढ़ बढ़ती जाती है और ये भी उदासीन रहने लगा.
दिन पर दिन बीतते गए , बच्चा बड़ा होता गया और उसका खुद का एक संसार तैयार हो गया. उसकी दसवीं आई और चली गयी. तब तक दोनों ही चालीस के हो गए. बैंक में शून्य बढ़ता ही जा रहा है.
एक नितांत एकांत क्षण में उसे गुज़रे दिन याद आते हैं और वो मौका देखकर उससे कहता है '
अरे ज़रा यहां आओ ,
पास बैठो .
चलो फिर एक बार हाथों में हाथ ले कर बातें करें , कहीं घूम के आएं .... उसने अजीब नज़रों से उसको देखा और कहा " तुम्हें कभी भी कुछ भी सूझता है . मुझे ढेर सा काम पड़ा है और तुम्हें बातों की सूझ रही है " . कमर में पल्लू खोंस कर वो निकल गई .
और फिर आता है पैंतालीसवां साल , आंखों पर चश्मा लग गया .बाल अपना काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझनें शुरू ही थीं. . . . . बेटा अब काॅलेज में है. बैंक में शून्य बढ़ रहे हैं. उसने अपना नाम कीर्तन मंडली में डाल दिया और . . . .
बेटे का college खत्म हो गया , अपने पैरों पर खड़ा हो गया. अब उसके पर फूट गये और वो एक दिन परदेस उड़ गया...
अब उसके बालों का काला रंग और कभी कभी दिमाग भी साथ छोड़ने लगा.... उसे भी चश्मा लग गया था. अब वो उसे उम्र दराज़ लगने लगी क्योंकि वो खुद भी बूढ़ा हो रहा था.
पचपन के बाद साठ की ओर बढ़ना शुरू था. बैंक में अब कितने शून्य हो गए, उसे कुछ खबर नहीं है. बाहर आने जाने के कार्यक्रम अपने आप बंद होने लगे ।
गोली -दवाइयों का दिन और समय निश्चित होने लगा . डाॅक्टरों की तारीखें भी तय होने लगीं. बच्चे बड़े होंगे ये सोचकर लिया गया घर भी अब बोझ लगने लगा. बच्चे कब वापस आएंगे , अब बस यही हाथ रह गया था .
और फिर वो एक दिन आता है. वो सोफे पर लेटा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था . वो शाम की दिया-बाती कर रही थी . वो देख रही थी कि वो सोफे पर लेटा है. इतने में फोन की घंटी बजी , उसने लपक के फोन उठाया . उस तरफ बेटा था. बेटा अपनी शादी की जानकारी देता है और बताता है कि अब वह परदेस में ही रहेगा. उसने बेटे से बैंक के शून्य के बारे में क्या करना यह पूछा. अब चूंकि विदेश के शून्य की तुलना में उसके शून्य बेटे के लिये शून्य हैं इसलिए उसने पिता को सलाह दी " एक काम करिये , इन पैसों का ट्रस्ट बनाकर वृद्धाश्रम को दे दीजिए और खुद भी वहीं रहीये". कुछ औपचारिक बातें करके बेटे ने फोन रख दिया.
वो पुनः सोफे पर आ कर बैठ गया. उसकी भी दिया बाती खत्म होने आई थी. उसने उसे आवाज़ दी " चलो आज फिर हाथों में हाथ ले के बातें करें "
वो तुरंत बोली " बस अभी आई " उसे विश्वास नहीं हुआ , चेहरा खुशी से चमक उठा , आंखें भर आईं , उसकी आंखों से गिरने लगे और गाल भीग गए .
अचानक आंखों की चमक फीकी हो गई और वो निस्तेज हो गया.
उसने शेष पूजा की और उसके पास आ कर बैठ गई, कहा " बोलो क्या बोल रहे थे " पर उसने कुछ नहीं कहा . उसने उसके शरीर को छू कर देखा . शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ गया था और वो एकटक उसे देख रहा था .
क्षण भर को वो शून्य हो गई, क्या करूं उसे समझ में नहीं आया . लेकिन एक-दो मिनट में ही वो चैतन्य हो गई, धीरे से उठी और पूजाघर में गई . एक अगरबत्ती जलाई और ईश्वर को प्रणाम किया और फिर से सोफे पे आकर बैठ गई.
उसका ठंडा हाथ हाथों में लिया और बोली " चलो कहां घूमने जाना है और क्या बातें करनी हैं तम्हे " बोलो !! ऐसा कहते हुए उसकी आँखें भर आईं. वो एकटक उसे देखती रही , आंखों से अश्रुधारा बह निकली .
उसका सिर उसके कंधों पर गिर गया. ठंडी हवा का धीमा झोंका अभी भी चल रहा था ................
यही जिंदगी है ❓
Wednesday, May 13, 2015
Awesome True!
Nice lines :
"सफर का मजा लेना हो तो साथ में सामान कम रखिए
और
जिंदगी का मजा लेना हैं तो दिल में अरमान कम रखिए !!
तज़ुर्बा है मेरा.... मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है,
संगमरमर पर तो हमने .....पाँव फिसलते देखे हैं...!
जिंदगी को इतना सिरियस लेने की जरूरत नही यारों,
यहाँ से जिन्दा बचकर कोई नही जायेगा!
जिनके पास सिर्फ सिक्के थे वो मज़े से भीगते रहे बारिश में ....
जिनके जेब में नोट थे वो छत तलाशते रह गए...
Wednesday, May 6, 2015
गौधूली बेला का सफर!
जो चले गए हैं -शहर
उनके फिर गाँव लौट के आने की आस न कर...
जो चले गए जड़ों से बहुत दूर... उनसे फिर जड़ों तक लौट आने की बाट न जोह!
वो जो गए थे बड़े आदमी बनने उनसे फिर गरीब बन पुरानी हवेली में वापस आने की क्यों करता है -आस?
रे मानव! बड़ी नश्वर है यह धन की प्यास.. इक बार जाग जाये फिर बुझती ही नहीं..
ये इंसान -कोई पंछी नहीं... जो सुबह रोटी की तलाश में उड़े और साँझ होते फिर उसी पेड़ के उसी घोंसले में लौट आये...
हाँ... जीवन की गौधूली बेला पे... गाँव की पक्की हो चुकी पुरानी पगडंडियों पे वो जरूर आएगा... अपने अतीत से रूबरू होने.. आँख मिलाने... और बताने की... वो व्यस्त था...ज़िन्दगी के धागों को पिरोने में...
बहुत धीरे से वहां भी नज़र दौड़ाएगा जहाँ पुराने शयन कक्ष में -दादा-दादी और अम्मा-बाबूजी टंगे छोड़ गया था... फोटो फ्रेम में जडे हुए.. कई दशकों के लिए.. धूल और मकड़जालों से दोस्ती करने को..
खैर...
काश तू समझ पाता -घर गाँव और घोंसले का मतलब...? और गाये की तरह रम्भाते हुए आ जाता अपनी जीवन गौधूली पे.. अपनी पुरानी दीवारों के आँचल में... नटखट गोलू या बबलू या श्याम या पप्पू बन... और फिर ढूंढने लगता अपने पुराने खिलोने.. सीपी कंचे और चिरंगे...
पर मुझे पता है की -तू क्यों आया है यहां?
"मुझ पुराने बीहड़ ज़िंदा मकान को बेचने आये हो? वैसे भी अब तुम्हें इस मकान की जरूरत कहाँ? तुम्हारा स्थान तो शहर के किसी वृद्धाश्रम में सुरक्षित है! "
(गर्वित गौरव!)