Thursday, May 21, 2015

चाँद नियति और दस्तूर!

आँखें मींच कर...
दिल सिकोड़ कर.....
ढाढस  बाँध कर...
रख दिया है -तुझको
उसी जगह....
जहाँ
नियति ने मुक़म्मल किया था -तेरा-मेरा दस्तूर!

अगर जुदाई भी इक कहानी है तो -आमीन!
अगर बेवफाई भी इक रस्म है तो -अमीन!
अगर दिलों के दरख्तों का टूटना लाजमी है तो -सुम्मामीन!

पर यह न समझ लेना की फ़ना हुई मेरी मोहब्बत!
नहीं!
अभी नहीं!
साबित करूँगा मैं अपना वजूद..
और बताऊंगा की -
दूर से भले चाँद के चहरे पे बड़े बड़े गड्ढे दीखते हों पर हकीकत में तो...
उम्मीदों और ख़्वाबों के उन्नत शिखर हैं!

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