Friday, January 22, 2016

सत्य!

सत्य!
शिथिल जरूर है ;
रूका नही है...
थका जरूर है...
पर पराजित नही है!
सदा रहा है...
सदा रहेगा,
सत्य सार्थक...
झुका नही है।

मद ताकत का...
या दौलत का,
पथ भटका देता है..अक्सर!!
नशा कोई भी हो चाहे, जीवन भटका देता है अक्सर॥

चाल चलन तय करता है, दुनिया में सबकी सही जगह।
केवल कर्म दिलाते है, दुनिया में सबको सही जगह॥

सत्य सादगी और प्रेम ही, मूल मंत्र है जीवन के।
किसे मिला....
सम्मान जगत में,
नफरत के पथ पर चल के॥

चले गये जग से...
सब खाली हाथ,
वो दौलत वाले भी
बिन कपडों...
बिन आभूषण ही,
महल दुमहले वाले भी॥

सत्य यही हैं...
और सच्चाई भी
इसका किसी भी युग में मुका नही है....
सदा रहा है...
सदा रहेगा,
सत्य सार्थक.
झुका नही है!!

Wednesday, January 20, 2016

बिलकुल अनछुए!!!

"ज़िन्दगी में बहुत सी ज़िंदगियाँ मिलीं....
पर तेरी कुछ अदाएं...

 फिर दुबारा कहीं न मिलीं! 


तेरी आंसू पौंछने की अदा..
जब बिना रुमाल या अपनी चुनरी के....
तू -

मेरी आँखों की... पोरों पे 

ढलक आईं बूंदों को 

पौंछने की 

नाकाम कोशिश करती थी .....


मेरे सिर पे... 

मेरे बालों पे... 

तू हाथ फेर कर...
कहती थी...
की मैं भूल जाऊं तुझे...
और खुश रहा करूँ... 


सच..
तुझसे बिछड़े बीस साल हो गए और...
मेरी ख़ुशी की परवाह..
तेरे सिवा...
फिर किसी और ने
ज़िन्दगी में-
इतनी... शिद्दत से 

कभी नहीं की! 

और
आखिर में... तेरी 
मुझे भूलने की अदा!!

वो भी...
फिर दोबारा...
किसी की मोहब्बत में...
कहीं न मिली!

जिस दिन से -हम 
दूर हुए... 

कुछ... ऐसे हुए...
की अब...
क्या बताएं की...
कैसे हुए??

सच तूने साबित किया की 

हम दोनों थे -
अनछुए... कोरे...

 बिलकुल अनछुए!!"

Sunday, January 17, 2016

सर्द,सूखे,बीते पल छिन्न!

"सर्द रातें...
कभी कभी...
बहुत भारी होतीं है...
याद दिला जातीं हैं... बीतीं महकतीं रातें और बातें!

सूखे जख्मों के दाग...
कभी कभी.
याद दिला देते हैं...
हरे जख्मों की!

छोड़ी-भूली गालियां... कभी कभी....
याद दिला जातीं हैं..
भूली बिसरी मुलाक़ातें!

जंग लगे संदूक...
टूटी खराब चैन वालीं अटैचियां...
पुराने बुने हुए स्वेटर...
अक्सर -
स्मृति में लाते हैं -
माँ की ममता और पापा  का साया!

जिल्द चढ़ी किताबें...
टूटे "ज्योमेट्री बॉक्स"...
रफ़ कापियों के आखिरी के...
"दिल" बने....
गुदे हुए पेज...
याद दिला जाते हैं -
बचपन का पढाई का कमरा और
टूटी कुर्सी -मेज!

और
बूढी लाठी टेकती औरत में...
बूढ़े किसान दादा में...
भूखीं गाये में...
मूंगफली बेचते बच्चे में..
या
झोली लटकाये डाकिये में...
दिख जाता है -
बचपन का -
मेरा गाँव -मेरा देश! "

"गर्वित गौरव!"

Friday, January 15, 2016

मन का तूफ़ान..

एक छक्के सी हो जाती है -ज़िन्दगी!
जब....
अपनों के बीच-
तलाश हो मंच की...
वजूद की...
पहचान की..
या सुकून की!

कितना मुश्किल होता है - सम्भालना...
अपने आप को...
अपने संताप को...
और...
अपने अहसास को....
जब -
पटकथा के सारे पात्र -अपना ही साया हों???

याद आते हैं...
महाभारत के वे सारे पात्र भी...
जो-
भीष्म पितामह को आइना दिखाते थे..
और हर बात पर साबित करते थे-
उनको की - वे एक जंग लगी तलवार हैं और ....
शकुनि एक..
जीवंत पाठशाला....

या स्व.हरिवंश राय बच्चन की वो मधुशाला.....
जैसी बातें भी जहाँ -
मधु के गिलास;
जिनका वजूद मधु के खत्म होने तक ही था ...
बोतल से कह रहे थे-
की;
तुझमें सुरूर की कमी थी ; तभी
हमें कचरे में फेंक दिया गया...

सच!
कुछ कुछ बड़ी अजीब सी हो जाती है-ज़िन्दगी ;
जब...
अपने ही...
गले में रस्सी डाल कर कहते हैं- की -
कूदना मत...
कूदना मत...
फंदा कस जाएगा!

सच!
क्यों नहीं समझते अपने... अपनों को?
अपने.."अपनों के सपनों" को???

Wednesday, January 13, 2016

गुज़रा हुआ ज़माना... आता नहीं दुबारा!

गुज़र गया वो वक़्त भी.. जो तेरी यादों से सराबोर
था....
अपने मौजूं के साथ!!!

वक़्त भी निकला तेरी तरह हरजाई...
कुछ दिन साथ चला फिर आगे निकल गया...
ठीक तेरी तरह...
मेरा मजाक उडाता हुआ!

और मैं भटकते भटकते...
रह गया हूँ ;
अकेला....
उस कफ़न की मानिंद...
जो रह जाता है-
अक्सर अकेला....
इंसान के गुज़र जाने बाद!

Sunday, January 10, 2016

अमृत मंथन!

"अब तुझसे ज्यादा गिला शिकवा रहा नहीं -ऐ ज़िन्दगी!"

अपने ही बोए पेड़ों की छाया का शौक फर्मा रहा हूँ!

"माना की कुछ अंगूर खट्टे निकले...
माना की ज़िन्दगी के खेत की मिर्ची तीखी निकली.....
लेकिन मैं खुश हूँ अपने बचे खुचे अमरूदों से...
तोतों ने जूंठे कर के भी जो छोड़े...
वो मेरे कर्मों का फल है!"

"अमृत मंथन में कभी -कोई विष से बच पाया है???"
"शानू!"

Wednesday, January 6, 2016

किसका त्याग बड़ा?

वो चुनाव जीत कर- फहराते हैं तिरंगा...
हम गोली खा कर बचाते हैं ; तिरंगा!

वो चुनाव जीत कर पहुंचते हैं -लाल किले की प्राचीर.... और
हम सीमा पर गोली खाकर बन जाते हैं -अपने घर की तस्वीर!

शायद कभी वो सोचेंगे..
कौन बड़ा देश प्रेमी?
किसका त्याग अतुलनीय??

Tuesday, January 5, 2016

पठानकोट!

पठानकोट!
इक हादसा -
कुछ टूटी चूड़ियाँ...
कुछ उजड़ी मांगें...
कुछ भीगी पलकें और
कुछ पथराई आँखें!

पठानकोट!
कुछ तुतलाते लफ्ज -"पापा!"
कुछ सिसकती आवाजें -भैया!
कुछ दबी दबी चीत्कारें -
प्रिये! और
कुछ कराहते क्रंदन -बेटा!

पठानकोट!
बीस लाख और नौकरी..
शहीद का दर्जा..
तिरंगे में लिपटा शरीर... और
बंदूकों की सलामी!

पठानकोट!
दीवार पर फ्रेम की हुई माला से लिपटी -तस्वीर!...
नेताओं की सांत्वना..
पाकिस्तान को मुहतोड़ जवाब देने का वादा.... और
छब्बीस जनवरी को -लाल किले की प्राचीर के पास -सफ़ेद वस्त्रों में लिपटी "पद्मिनियों" को "रिजर्व्ड" कुर्सियां!

पठानकोट!
कुछ नहीं... बस...
ज़िन्दगी भर के आंसूं...
ता उम्र टूटे ख्वाब..
विरह का लम्बा जीवन..
न जाने किसका -श्राप???

पठानकोट!
निशब्द...
निर्विकार...
दीवार की तस्वीर और
चीत्कार!

(गौरव!)

Sunday, January 3, 2016

दिग्विजय!

"कमाल के वफादार सिपहसालार हो!
डूबते हुए जहाज पर भी खड़े हो कर-माला जप रहे हो वफादारी की?
और यही तुम्हारा दायित्व भी है!
पर हे राधौगढ़ के पुत्र!
मेरे देश के प्रधानमंत्री को कुछ मत कहो...
आप पार्टी भक्त होगे पर मेरे नमो -एक देशभक्त! "