Sunday, January 17, 2016

सर्द,सूखे,बीते पल छिन्न!

"सर्द रातें...
कभी कभी...
बहुत भारी होतीं है...
याद दिला जातीं हैं... बीतीं महकतीं रातें और बातें!

सूखे जख्मों के दाग...
कभी कभी.
याद दिला देते हैं...
हरे जख्मों की!

छोड़ी-भूली गालियां... कभी कभी....
याद दिला जातीं हैं..
भूली बिसरी मुलाक़ातें!

जंग लगे संदूक...
टूटी खराब चैन वालीं अटैचियां...
पुराने बुने हुए स्वेटर...
अक्सर -
स्मृति में लाते हैं -
माँ की ममता और पापा  का साया!

जिल्द चढ़ी किताबें...
टूटे "ज्योमेट्री बॉक्स"...
रफ़ कापियों के आखिरी के...
"दिल" बने....
गुदे हुए पेज...
याद दिला जाते हैं -
बचपन का पढाई का कमरा और
टूटी कुर्सी -मेज!

और
बूढी लाठी टेकती औरत में...
बूढ़े किसान दादा में...
भूखीं गाये में...
मूंगफली बेचते बच्चे में..
या
झोली लटकाये डाकिये में...
दिख जाता है -
बचपन का -
मेरा गाँव -मेरा देश! "

"गर्वित गौरव!"

No comments:

Post a Comment