Sunday, January 10, 2016

अमृत मंथन!

"अब तुझसे ज्यादा गिला शिकवा रहा नहीं -ऐ ज़िन्दगी!"

अपने ही बोए पेड़ों की छाया का शौक फर्मा रहा हूँ!

"माना की कुछ अंगूर खट्टे निकले...
माना की ज़िन्दगी के खेत की मिर्ची तीखी निकली.....
लेकिन मैं खुश हूँ अपने बचे खुचे अमरूदों से...
तोतों ने जूंठे कर के भी जो छोड़े...
वो मेरे कर्मों का फल है!"

"अमृत मंथन में कभी -कोई विष से बच पाया है???"
"शानू!"

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