Wednesday, January 20, 2016

बिलकुल अनछुए!!!

"ज़िन्दगी में बहुत सी ज़िंदगियाँ मिलीं....
पर तेरी कुछ अदाएं...

 फिर दुबारा कहीं न मिलीं! 


तेरी आंसू पौंछने की अदा..
जब बिना रुमाल या अपनी चुनरी के....
तू -

मेरी आँखों की... पोरों पे 

ढलक आईं बूंदों को 

पौंछने की 

नाकाम कोशिश करती थी .....


मेरे सिर पे... 

मेरे बालों पे... 

तू हाथ फेर कर...
कहती थी...
की मैं भूल जाऊं तुझे...
और खुश रहा करूँ... 


सच..
तुझसे बिछड़े बीस साल हो गए और...
मेरी ख़ुशी की परवाह..
तेरे सिवा...
फिर किसी और ने
ज़िन्दगी में-
इतनी... शिद्दत से 

कभी नहीं की! 

और
आखिर में... तेरी 
मुझे भूलने की अदा!!

वो भी...
फिर दोबारा...
किसी की मोहब्बत में...
कहीं न मिली!

जिस दिन से -हम 
दूर हुए... 

कुछ... ऐसे हुए...
की अब...
क्या बताएं की...
कैसे हुए??

सच तूने साबित किया की 

हम दोनों थे -
अनछुए... कोरे...

 बिलकुल अनछुए!!"

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