Wednesday, December 12, 2012

Nidheesh Tyagi Joins BBC....

"बी बी सी 'ज्वाइन' करने पे-
हम-
दे रहें हैं वे भरी हुई नीवें-
जिनके ऊपर आपको इंडिया या भारत के हिन्दी भाषी श्रोताओं की-
उम्मीदों की इमारत को बुलंद करना है।

ज़िम्मेदारी उन सपनों के हिफाज़त की ........
जो देखे गए है -बसंत की आशा में ....
उन आँखों द्वारा .....
जिनके भाग्य में हमेशा पतझर ही रहा है
पर ......
यदा-कदा .....
उन आँखों के सपनों को
कोई और भी पूरा करता है।
और वो आप हो।
केवल आप .
हाँ !
केवल आप!

मै! आशा करता हूँ कि-
BBC में आपके आने के बाद .....

  • -दिए अंधेरों से समझौता नहीं करेंगे 
  • -सत्य झूठ के शिविर में नहीं पनपेगा

और ........

  • -सैनिक स्कूल की -"विधेव बलम" की मशाल 

रौशन होती रहेगी ......
और ....
हमारा आपका ...
अमर,अमिट ,पावन स्नेह का बंधन
रिश्तों का मोहताज़
नहीं रहेगा।"

Congrats Sir !Congrats Sir !
Proud to be urs Junior !
Keep it Up !

Saturday, November 17, 2012

Shri. Bala Sahib Thakrey!



Shri. Bala Sahib Thakrey!

We will Miss U Sir!We will recall U Sir!We will Love U Sir!Bye.....Bye.....Bye.....



Lets pray to the all mighty to rest his "Soul" in Peace!
Long Live Bala Sahib!

B-Bold Personality.
A-Arrow & Straight forward Attitude.
L-Lion of Maharashtra.
A-Attitude always positive.

S-Secure Maharashtra Secure Hindu!
A-Arrogant for the Interest of the Hindus.
H-Hindu by Soul & Blood.
I-Intelligent Journalist & Cartoonist!
B-Bold for the Truth.

T-Truth Loving.
H-Honest.
A-Awesome Looks.
K-King Size Life
R-Royal till the End.
E-Elegant in Style.
Y-Youth Power.

Thursday, November 15, 2012

चित्र गुप्त दोज मिलन



आज लव कुश नगर में आयोजित चित्र गुप्त दोज मिलन एवम यम द्वितिया कार्यक्रम पुरानी तहसील में स्थित हनुमान जी के मंदिर में आयोजित किया गया!कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री देवी प्रसाद खरे ने की!कार्यक्रम सफल रहा और सभी ने मंदिर निर्माण  के विषय में चर्चा की !











Saturday, November 3, 2012

"सूरज को चुनौती देना?

"सूरज को चुनौती देना?
उसकी रौशनी को नापना?
उसके तेज़ को आंकना?
और उसकी उर्जा को जांचना?
सिर्फ एक विज्ञानिक क्रिया है
कोई-
सामाजिक,सांस्कृतिक या राजनैतिक प्रयोग नहीं
जिसके दम पर हम
कोई निष्कर्ष निकालने का प्रयास करें
और सन्देश दें-भावी मानवता को -
सूरज से बच कर रहने को!

आज हमारे देश में
सूरज-चन्द्रमा-और ध्रुव तारे पर  ;
सत्य-निष्ठां,ईमानदारी,कर्तव्य और जिम्मेदारी पर
 प्रश्न चिन्ह लगाना और
चुनौती देना इक आम बात हो गई है
और अगर हालात नहीं सुधरे तो वो दिन दूर नहीं
जब हम भगवान् पर भी प्रश्न -चिन्ह लगा देंगे
और
उसके अस्तित्व को ही चुनौती देने से भी नहीं डरेंगे ?

भ्रष्टाचार के तालाब में
अपनी अपनी जवानी के दिनों में
सभी ने गोता लगाया
किसी ने तर्क दिया कि -
वो डूबते को बचा रहा था
किसी ने कहा कि वो समुन्दर में गहरे पानी में गोता  लगा कर मोती ढूडने का प्रयास कर रहा था
और किसी ने कहा की-
वह तो बस खड़ा था;हवा कि  तेज़ आंधी आयी और पैर फिसल गया और तालाब में गिर गया

अपने अपने तर्क
अपनी अपनी सफाई

अपने अपने कुतर्क
अपनी अपनी जग-हंसाई

किसी ने इज्ज़त फंसाई
और किसी ने इज्ज़त गँवाई

हकीकत तो यह है कि -आजकल टीवी  पे
अपने देश के इन तथा-कथित कर्णधारों को देख कर बरबस याद आ जातें हैं-
महाभारत के शिखंडी और रामायण की शूर्पनखा और लगता है कि फिर कोई
श्री कृष्णा और श्री राम अवतरित हो कर -
इन सब को तार  कर -
पृथ्वी को प्रदुषण से मुक्त करें!

केजरीवाल को गाली देने से अथवा--
मनीष सिसोदिया को धमकाने से-
ख़त्म नहीं हो जाता-
इन कोरवों का पाप!
और देख लेना धरती माता अपने वजूद की रक्षा के लिए -
खुद थोडा सा हिलेंगी और-
भूकंप तथा सुनामी की आंधी ख़त्म कर देगी-
इन वजनदार सज्जन बोझिल लोगों को !"
  

Friday, November 2, 2012

शाश्वत? निर्मल? अमर? पावन? या पवित्र?

 "तुम हमेशा मुझ से आगे रहती हो-
प्रेम में,समर्पण में और पूजा में। 

क्यों कि -

तुम्हारा प्यार मेरे प्यार से ज्यादा है। 
और- 
तुम बहुत आगे हो -बहुत आगे .......
भगवान् और पूज्य पापा से बातें करने में-
और-
उनसे मेरे लिए सब-कुछ मांगने में।।

यही कुछ चिरंतन सत्य हैं जो बनाते हैं तुम्हें -
दुनिया से बिलकुल अलग और अजब।

तुम्हारे प्यार को क्या कहूं???
शाश्वत? निर्मल? अमर? पावन? या पवित्र?

कुछ समझ नहीं आता क्यों कि -
मै ठहरा टेढ़ा-मेढ़ा "complicated" इन्सान और कहाँ तुम?
 मेरी सिर्फ मेरी ......
इस जन्म में मेरी .........
उस जन्म में भी मेरी ...........
और अगले जन्म जन्मान्तरों में भी सिर्फ मेरी!

मै इस लायक नहीं था कि -तुम मुझे मिलो-या 
तुम मुझे सिलो ........
तुम मुझे लिखो
या जन्मो-जन्मो तक 
मुझे हर जन्म में मिलो।।
पर .....
तुम मुझे मिलीं;
और ....
यही बात कहती है कि -
जीवन कर्म के साथ भाग्य प्रधान भी होता है।
जीवन जन्म-जन्मान्तरों से बंधा हुआ है।
और-
भगवान सबका है!!"


Wednesday, October 31, 2012

"पुरानी दीवारें कुछ याद दिलाती हैं!"

"पुरानी दीवारें कुछ याद दिलाती हैं कि -
यादें कभी ख़त्म नहीं होतीं चाहे 
कितनी ही समय की परते 
रास्तों पे पिघल जाएँ !!!"

पुराने रिश्ते भी कुछ याद दिलाते हैं कि- 
कभी एक ही दिशा में देखा था-
दोनों ने -
इक-दूसरे को विश्वास और प्रेम की डोर में बांध के! 
चाहे अब-
वो मजबूत डोर बन कर रह गई हो-
अब इक अध्-जली रस्सी !

पुराने कपडे भी कहते हैं कि -
कभी अपनाया था तुमने उन्हें 
बड़े जतन  से और देखे थे स्वप्न सुन्दर-मदहोश!
पर ......
समय के साथ त्याग दिया उन्हें जब-
छेद हो गया उनमे और 
कगार पे पहुचे वे कपडे -
चुकी हुई -मूंगफली बनने के!

पुराने जूते  भी अपना दर्द बयां करते है-कि 
कभी भी उन्होंने तुम्हे धोका नहीं दिया जब- 
बहुत जल्दी में थे तुम-क्यों की तुम्हें मिलना था उससे; ठीक चार बजे और फिर-
दबे पाँव होस्टल पहुंचना था -
खुशी और प्यार का दीदार करने के बाद!

अभी भी वक़्त है-
अपना लो उन सभी को जिन्हें समय के साथ 
छोड़ दिया है तुमने बहुत दूर तन्हाई में -
और .....
आज भी पश्चाताप के भाव से उन्हें याद कर 
अपना थूंक गुट्कते  हो -
अकेले में-जब कोई नहीं होता-तुम्हारे पास!

याद रखो बस इतना ही की -
रिश्ते कभी नहीं मरते!
सिर्फ हमारा नजरिया मरता है और 
हम सोचते हैं कि -
रिश्ता ख़त्म हो गया!"




Friday, October 26, 2012

दीपावली शुभ हो !!!


उन सभी को सादर  समर्पित जो कहीं न कहीं  किसी न किसी रूप में मेरी ज़िन्दगी में आये और कुछ या कई कदम मेरे साथ चले .......................

 "अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे 
क्यों कि -
जिसकी जितनी जरुरत थी उसने 
उतना ही पहचाना मुझे।"

दीपावली शुभ हो !!!

Monday, October 15, 2012

पत्थर!!!

"इस अनजान शहर में पत्थर कहां से आकर लगा मुझे
लगता है इन गैरों की भीड़ में कोई अपना भी है..."


"पत्थर तो पत्थर होते हैं
फिर वो चाहे शब्दों के पत्थर हों 
या ....
हकीकत के!

हम तो अक्सर शब्दों की स्याही से पत्थर बनाते हैं; 
पर कभी कभी-
शब्द ही साथ न दें और बगावत पे उतर आएं-
और पत्थर उठा लें 
तो हम क्या करें ?

आदि मानव ने भी सबसे पहले पत्थर ही उठाया था?
इंदिरा की वानर सेना ने भी पत्थर उठा के अंग्रेजों को ललकारा था?

आदि से अंत तक इक पत्थर ही तो हैं जो इन्सान का साथ देते हैं 
वरना .....
पत्थर दिल इंसान कब से इंसानों का साथ देने लगे???"



Wednesday, September 26, 2012

खजुराहो किसका है???



खजुराहो किसका है???

"खजुराहो का असली मालिक कौन?
खजुराहो का असली नेता कौन???
खजुराहो का असली शुभ चिन्तक कौन???
खजुराहो का सरपरस्त कौन???
खजुराहो का चौकीदार कौन???
खजुराहो का पल्लेदार कौन???
और ....
खजुराहो का थानेदार कौन???

आज "विश्व पर्यटन दिवस" पे-
बहुत सारे ठेकेदार इक्कट्ठा हो कर-
हुंकार भरेंगे की वो ही खजुराहो के असली शुभ चिन्तक हैं-
और उन्हीं के सुरक्षित हाथों से -
इस कस्बे  का उद्धार होगा!

Cheers Cheers Cheers !!!
Happy World Tourism day!!!
Happy World Tourism day !!!
Long Live Khajuraho !!!
  • उद्धार तो कभी "टी एस बर्ट" ने भी किया था
          जो इसे विश्व मंच पे लाये!
  • उद्धार तो चंदेलों ने भी किया था जिन्होंने अपने ख्वाब को मूर्त रूप दे कर
          अपने अस्तित्व को अमरता प्रदान की!
  • उद्धार तो-खजुराहो के महाराज जी ने भी किया था जिन्होंने अपना सब कुछ निछावर कर दिया था इन मंदिरों को को विश्व मंच पे लाने  के लिए-
और----
  • असली उदधारक तो स्वयं भगवान् मतंगेश्वर हैं; जिन्होंने खजुराहो और उसकी कला को चिरंतनता का अमर वरदान दे कर स्वयं उसकी रक्षा का भार लिया और खुद विराजमान हो गए-अपना त्रिशूल ले कर इस कस्बे की रक्षा के लिए !!!
  • उद्धारक तो पवनपुत्र हनुमानजी भी हैं जो राजनगर के पास "चोडा-खेड़े" में विराज कर और सेवाग्राम खजुराहो में विराज कर अपनी कृपा बनाये हुए हैं!उन्होंने ही दशकों पहले स्व,हरिवंश राय बच्चन को खजुराहो आ कर कुछ अमर पंक्तियाँ लिखने को कहा था जिन्हें आज हम उन्हीं के पुत्र अमिताभ की आवाज़ में रोज -Light & Sound Program me में सुनते हैं और स्वम पवन पुत्र की दक्षिण मुखी सबसे बड़ी मूर्ति है!
  • रक्षक तो एअरपोर्ट boundary के किनारे स्थित "माता मंदिर "भी हैं जो अपने आँचल में खजुराहो के सारे दुःख समेटे हुए हैं!
  • और वो क्लार्क होटल की दीवाल से सटा हुआ चबूतरा- नदी किनारे वाला हम कैसे भूल सकते हैं जो वाहनों की रक्षा करते हैं!   
"असल में अपने अपने समय में सभी ने अपना अपना काम पूरी ईमानदारी से किया और जीवन पथ पे आगे बढ़ गए!!!"
  • चाहे वो बर्ट साहब हों या चंदेल वंशज हों अथवा स्वर्गीय दाऊ साहिब अर्थात स्वर्गीय कुंवर अर्जुन सिंह हों???
  • परन्तु हम उन्हें भी कभी नहीं भूल सकते या नज़र अंदाज़ कर सकते हैं जिन्होंने खजुराहो नाम के खंडहर हो चुके जर्जर ध्वस्त कस्बे और उसकी धरोहरों को उचित मंच प्रदान किया -फिर चाहे वो -श्री कांति पोतदार हों या श्री अशोक जैन हों अथवा वयोवृद्ध श्री लावानियाँ जी हों!
  • स्वर्गीय श्री अनिल ओस्मंड,जापानी बाबु अथवा उन आत्माओं को हम कैसे बिसरा सकते हैं जिन्होंने एक ज़िन्दगी लगाई इस खजुराहो नाम की अबूझ पहेली को सुलझाने में!
  • आवाज़  के ऋणी तो हम श्री अमिताभ बच्चन के भी हैं जिन्होंने- "Light & Sound show" के माध्यम से इस खजुराहो नाम के काव्य को जीवंतता प्रदान की!
  • और भी इक नाम है जो बड़ी तन्मयता से अपना काम किये जा रहा है और विश्वास है की हमेशा करता  रहेगा और वो नाम है -आदरणीय श्री ब्रिजेन्द्र सिंह मामाजी guide का;जिन्होंने भी लाखों बार अपनी वाणी से खजुराहो को मंचासीन किया है!

आज जब सारी दुनिया पर्यटन दिवस मन रही हैं हम क्यों बात करें उनकी जो दीमक और लालच भरी नजरों से देख रहें है -विलक्षण खजुराहो को !जो आज गर्व से मंचासीन है- अपने हुनर और कला के बल-बूते पर और कोशिश कर रहा है कि -आगे और आगे बढ़ता ही जाये।

आओ कोशिश करें -खजुराहो को भू-माफियाओं से बचाने की ;जो सुड़क या गुटक जाने को तैयार हैं-खजुराहो के चंदेल कालीन तालाब और बेशकीमती जमीनें जिन पर येन-केन-प्रकरेण कब्ज़ा कर ये नकाबपोश सफेदपोश तथाकथित "खजुराहो के शुभ-चिन्तक" इस चंदेल कालीन कसबे को गर्त पे लाने की कोशिश कर रहें हैं!

"देखना यह है कि -वो भागीरथ तारनहार कौन है जो इस धरा को इन जिंदा दानवों से बचा कर वर्ष 2050 ईस्वी के बच्चों के लिए उपहार स्वरुप विरासत में खजुराहो नामक यह "विश्व दाय स्मारक " भेंट कर के जायेगा??? "

आओ कभी अपनी चुश्कियों के बीच कुछ समय उस -खजुराहो को भी दें जो बड़ी खामोशी से हम सब को पाल रहा है -बिना किसी न-नुकुर के???
आओ सच्चे मन से सोचें -

खजुराहो का असली मालिक कौन?
खजुराहो का असली नेता कौन???
खजुराहो का असली शुभ चिन्तक कौन???
खजुराहो का सरपरस्त कौन???
खजुराहो का चौकीदार कौन???
खजुराहो का पल्लेदार कौन???
और ....
खजुराहो का थानेदार कौन???"

उत्तर है दोस्तों -सिर्फ हम!सिर्फ हम!

जय जय मतंगेश्वर महादेव जय जय !!!!!





Monday, September 24, 2012

"किस्मत कनेक्शन"


"हम-तुम एक साथ नहीं हुए तो क्या हुआ?
सात फेरे नहीं लिए तो क्या हुआ ?
मांग में सिन्दूर नहीं भरा तो क्या हुआ? 
दो शरीरों का मिलन नहीं हुआ तो क्या हुआ? 

चलो कम से कम -

हम दोनों ने एक-साथ डूबते हुए सूरज को निहारा और उस सूरज में 'ज़ुदाई' और 'इक नई सुबह' दोनों को तलाशा तो !
हम दोनों ने एक दुसरे की आँखों में निश्चल मन से झाँका तो!
एक-दुसरे का हाथ पकड़ के कुछ कदम साथ में चले तो!
कुछ सपनें साथ में बुनें तो!
कुछ शब्द साथ में गुथें तो!
एक-दुसरे की आँखों पे सिमट आई लटों को हक से हटाया तो!
और ......
बहुत करीब से अपनी उँगलियों से एक-दुसरे के आसुओं को पोंछा!
जानती हो -
ऐसा  जीवन सुख और सत्य बहुत से शादी-शुदा लोगों को नहीं मिल पता है;जो-
हम-दोनों ने बांटा,एहसास किया और जीवन भर के लिए मन में संजोया!

जहाँ तक मेरी बात है -

मै खुश हूँ!तुम्हारी उड़ती हुई चुनरी या दुपट्टा संभालने में-
मै खुश हूँ तुम्हारी खिसकती बिंदी को माथे पे संवारने या लगाने में-
मै खुश हूँ -जाते-जाते बदहवास में तुम्हारे -"अपना ध्यान रखना"कहने के अंदाज़ पे!
मै खुश हूँ मंदिर में साथ-साथ भगवान् के सामने मत्था टेकने पे!
मै खुश हूँ  तुम्हारा कुछ अपने हाथ से बना के चोरी-चोरी मुझे खिलाने पे!
मै खुश हूँ तुम्हारी जूठी प्याज़ खाने और पानी पीने में!
और--
मै  बहुत खुश हूँ इस बात पे कि -इस ज़िन्दगी में "प्यार";बनकर तुम आयीं-
मुझे वाकिफ कराया कि प्यार क्या होता है?
और मेरे शब्दकोष में-
निश्चलता,पावनता,अमानत,पक्का,वादा,तुम्हारी कसम और सच्ची-मुच्ची; जैसे शब्दों के मायने जोड़े और
तुम्हारी-सिर्फ तुम्हारी,,इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में,पहला प्यार,सच्ची सिर्फ तुम्हारी कसम ;जैसे मुहावरों की गहराई को बताया!
"तुमने आत्मा और शरीर के मिलन के अंतर को समझाया कि -शरीर तो एक जन्म में सात फेरों से बांधा जा सकता है परन्तु "आत्मा" निर्बाध है और उसे कोई मिलने से कोई नहीं रोक सकता!"

जहाँ तक तुम्हारी बात है -तुम खुश होगी? यकीनन खुश होगी!
जानती हो क्यों? -
तुम्हारे न मिलने पर भी- मेरे न भटकने पर!
तुम्हारे न मिलने पर भी- मेरे संभलने पर!
तुम्हारे न मिलने पर भी -मेरे कुछ बनने पर!

मुझे मालूम है कि -तुम बहुत खुश होगी-

मेरी सफलता पे!
मेरी ख़ुशी पे!
मेरी व्यस्त ज़िन्दगी पे!
और मेरे उसी  'मस्त-मौलापन' पे जो कभी! जब तुम ज़िन्दगी में थीं तब भी था और आज भी है; क्यूँ कि -
'मै'  नहीं बदला - बिलकुल भी ......
क्यूँ की ज़िन्दगी! प्यार न मिलने पे ख़त्म नहीं होती बल्कि-
शुरू होती है !!!"

 इतना ही बहुत है-कि तुमने मेरे लिए
अपनी पलकों को झुकाया!
उन पलकों से मेरे हिस्से की चंद आँसूं की बूंदें भी ढलकाई !
मेरे पसंद के कंगन पहने
मेरी पसंद के रंगों के सलवार-सूट पहने!
और वो सबकुछ किया जो मुझे पसंद था या आज भी है!

चलो ये जन्म न सही!
अगला जन्म ही सही!
शायद!
"किस्मत कनेक्शन" क्लिक कर जाए-

 एक जन्म की अधूरी उमंगें शायद-
अगले जन्म में पूरी हो जाए!!!
शायद ............
शायद।।।"












Sunday, September 16, 2012

"खुदा की लाठी चलती है तो आवाज़ नहीं करती!"

















"क्यों लगने लगा है आस्थाओं,आदर्शों और अपनों से डर ???
क्यों ऐसा लगता है कि -मर्यादा,ईमानदारी और वफादारी बेकार की बातें है;
और इसे अपनाने से कुछ ख़ास हासिल नहीं होने वाला है और
इस प्रकार पूज्य बापू के-"शोध सत्य के साथ" के फलसफों को अपना या लागू कर -
मै अपने बच्चों को धकेल रहा हूँ -
ज़िन्दगी की दौड़ में कई हाथ पीछे ........?????

"जो ईमानदार नहीं है वो क्यों सफलता के झंडे गाड रहे हैं ???
जो बेईमान हैं वो क्यों सुख से ज़िन्दगी गुजार रहें है???
और कभी कभी तो बड़ा आश्चर्य होता है जब
पूज्य ईश्वर  के मंदिर में ये लोग -
मुझ से ज्यादा प्रसाद चढाते हैं और महंगी महंगी अगरबत्तियो से ऊपर वाले का आहवान करते हैं और
उन्हें देख के लगता है जैसे-
ये ही सच्चे पुजारी हैं और मै  तुच्छ पापी जो अपने पापों के कारण
भगवान् का भी सामना नहीं कर पा रहा हूँ???"

सभी कहते हैं कि -चिंता मत करो -"खुदा की लाठी चलती है तो आवाज़ नहीं करती!"
ईश्वर-न्याय जरूर करता है और उसकी मर्ज़ी से ही सब-कुछ होता है!
पर ईश्वर का ऐसा कैसा न्याय जो-
तोड़ दे उसके प्रति हमारी आस्था और विश्वास को?
प्रश्न चिन्ह लगा दे हमारी कर्मठता और ईमानदारी को?
या--
विश्वास को ही डिगा दे???

अब सबसे बड़ी दिक्कत यह नहीं है कि -मै  ज़िन्दगी की रेस में पीछे रह गया पर---
दिक्कत यह है की-आगे आने वाली पीढी को उस परम पिता परमेश्वर के बारे में क्या बताऊँ जो सदियो से
सत्य और न्याय का हम-सफ़र रहा है???
यह ठीक है कि -कल युग है पर .....
कलयुग में "भ्रष्ट" तो हम हैं न??? फिर ?
भगवान् के न्याय पर सवाल क्यों ???
उसकी तर्क संगत  नवीन परिभाषा क्या हमें स्वयं गढ़नी पड़ेगी???
कितने प्रश्न कितने तर्क ......
अरे पर बिचारे भगवान्!!! को तो छोड़ दो-उसने क्या बिगाड़ा?????
कुछ कुछ ऐसा ही आप सभी सोच रहें होंगे???है न???

पर चिंता मत करो!!!
इसी को इम्तिहान कहते हैं।

अपने विचार जिंदा रखो!
अपने ख्वाब जिंदा रखो।
अपने मील के पत्थर ताकते रहो।
अपने कर्तव्य याद रखो।
अपने वादे दोहराते रहो।
अपने कायदे पे कायम रहो।

फिर देखना एक दिन-

अँधेरों के बाद रौशनी आएगी!
उमस के बाद बारिश होगी।
ठण्ड के बाद सुनहली धूप निकलेगी।
और ........
राहत,सुकून व सफलता की ब्यार चलेगी

देखना एक दिन---
बेटा "आई ए एस " में सिलेक्ट होगा।
बिजनेस ठीक-ठाक चलेगा।
बुढ़ापा सुकून से बीतेगा।
और .......
और .......
और भी बहुत कुछ होगा।

बस इतना करना कि -
अगरबत्ती वही सस्ती वाली लगाते-जलाते रहना
और ......
आस्था और विश्वास को कभी खंडित मत करना
क्यों कि यही कुछ जीवन सत्य रह गए हैं जो
कभी संतृप्त मानवता को
नई दिशा देंगे!!!!!"





Friday, September 14, 2012

देखो रामा अस्सो बाहर निकल गओ पकड़ो गिर न जाय!

"चले गए अपने
और दे गए एक मजबूत बाहुपाश
जिसने सात जन्मों के रिश्तों में
हम सब को बाँध दिया है .....

अपनी अम्मा जी के नाम के आगे -स्वर्गीय लगाना
कुछ ऐसा लगता है -जैसे जाने वाले को जबरन जाने को कह रहे हों?
माना  कि  अपनी अम्मा -स्वर्ग सिधार गईं
पर अपनी अम्मा तो आज भी हम सब के साथ में हैं
रग -रग में हैं,कतरे कतरे में हैं ,खून की बूंद बूंद में हैं और  अपनी
यादों में हैं वादों में हैं
साँसों में हैं।।।

हम सभी अम्माजी की तेरहवी में इक्कठा थे
पर क्या ऐसा लगा कि -
अम्मा हमारी अम्मा हम सब के बीच नहीं हैं???
बल्कि हमें तो ऐसा लगा कि जैसे-

-अपनी अम्मा कह रहीं हों-

देखो रामा "अस्सो" बाहर निकल गओ पकड़ो गिर न जाय!
सविता कां गई?
मंजू अबे तक नैं  आइ ?शाम हो गई?
पिरभा ने माचिस कितेक रखी ?
राजू देखो बद्री काय बुला रओ ?
जो असीस भौतई छकाएँ हैं!
और----
तुम ओरें हमाए सब - नाती-नातिनन को ध्यान राखिओ !

सच कहा न मैंने???

हम सभी लोगों को कल मऊ में ऐसा ही लगा ???
और ऐसा लगा जैसे अम्मा अपने आँगन में
अपनी नातिनों -नाती,बिटिया-दामादों,और बेटों को देख के-
संतोष में होंगी की -
चलो सभी ऐसे ही मिलजुल के रहना और-
मौरानीपुर का घर कभी मत छोड़ना
और ......
सुखदुख हमेशा मिल-बैठ के मानना!!!

अम्मा आप की भाषा और भाव हम सब ने समझ लिए हैं और
हम-सब हमेशा आप और पूज्य दद्दा जी के आशीर्वाद से
मिल जुल के रहेंगे!!!

मौरानीपुर की बड़ी देवीओं की छाया में पनपा  यह कायस्थ परिवार का वट-वृछ सदा ऐसे ही फलता फूलता रहेगा!आप दोनों की छाया और आशीर्वाद के सहारे सफलता का सौपान हम सभी हमेशा करते रहेंगे!









Wednesday, September 12, 2012

Pain!!!


"कुछ सपने बन ढल जायेंगे ;
कुछ दर्द चित्ता तक जायेंगे ;
उसमे इक दर्द तुम्हारा  होगा 
उसमे इक दर्द तुम्हारा होगा!"


Sunday, September 9, 2012

अम्मा को नाती की पाती!







"बहुत आसानी से,भारी मन से ,रोते हुए-सिसकते हुए-
हमने आपको-
वहीं पहुंचा दिया जहाँ की आप मुसाफिर थीं।
और बहुत दिनों से कह रहीं थीं कि -
हमें जाने दो -तुम लोग जाने नहीं दे रहे हो?"

"कितना कठिन होता है  -

गंतव्य से इलाहाबाद तक का सफ़र-
-यह कोई उनसे पूंछे जो अपनों को इक थेले में लेकर और गोद में बिठा के -
सदा सदा के लिए माँ गंगा के जल में सदा सदा के लिए प्रवाहित कर-
विदा-अलविदा कर देते हैं -अपने माँ-पिता को
और बस ....सब
पछ्ताते रह जाते हैं अपनी यादों के साथ,
अपने वादों के साथ ....
अपने बिछोह के साथ .".

"कल तक हम जिसकी गोद में खेल के बड़े हुए-
आज उसकी अस्थिओं को अपनी गोद में लेकर इलाहाबाद जाना-
और .......
माँ गंगा में प्रवाहित कर बिछड़ जाना-
हे भगवान .....
कुछ समझ नहीं आया?"

"ले आते हैं वापस घर .......
कुछ प्रसाद ....
कुछ यादें-
कुछ वादे -
कुछ दवाईयाँ -जाने वाले की- बची हुई;
और ....
कुछ सूखे हुए आँसूं
कुछ आती हुई हिचकियाँ
कुछ गुट्कता सा थूंक
और ......
कुछ वीरान आँखें-
कुछ स्याह रातें।

गूंजती रह जाती  हैं -अपनों की आवाज़ और सुर -
जो बचपन में हमें -
सुलाते थे-बहलाते थे -मनाते थे;
लोरी की थाप से गाते थे और पीठ में-
खुजली कर के -
सुलाते थे।"

"कितनी विचित्र है ऊपर वाले की लीला-
इक जीता-जागता शरीर-
हो जाता है हमसे जुदा ...
और तब्दील हो जाता है ...
तस्वीरों के फ्रेम में ......
अपनी मालाओं के साथ .....
हमें सिर्फ रुलाने और सिसकाने के लिए??????"

आप बहुत याद आओगी अम्मा-
सदर चरण वंदन सहित-
आपके सारी -
नातिनें और नाती और आशीष /शानू !









..



Friday, September 7, 2012

सफलता के पैमाने!


"यह ठीक है कि-
ज़िन्दगी की दौड़ में मै पिछड़ गया हूँ।
पर मै हारा नहीं हूँ!
मै हताश नहीं हूँ !
और निराश नहीं हूँ!

जज्बा अभी जिंदा है,
आग अभी भी  सुलग रही है,
सपने अभी भी तैर रहें हैं,
या यूँ कह लो कि -
ख्वाब अभी ज़मीदोज नहीं हुए हैं!

ऐसा नहीं है कि -
वही घिसा-पिटा तर्क दूं  कि -
ईश्वर ने साथ नहीं दिया या
किस्मत ठीक नहीं थी भाई!
और----
कोशिश तो बहुत की पर क्या करूँ सफलता नहीं मिली।

ईश्वर,किस्मत और मेरी मेहनत मेरे साथ हमेशा रही और आगे भी रहेगी।
इन आधार स्तंभों के कारण  ही-
सच्चा जीवन साथी मिला,
प्यारे प्यारे दो बच्चे मिले,
बड़े बड़े तो नहीं पर छोटे छोटे सपने साकार हुए,
और-----
इतने भीषण एक्सीडेंट के बावजूद भी -
मेरा परिवार अखंडित रहा और आज मै जिंदा हूँ।

असल में भगवान् और पूर्वज उतनी ही मदद और दया करते हैं जितने के आप हक़दार है।
दूसरों के पास लाखों-करोड़ों रुपए हों पर कुछ तो बात है जो मुझे विचलित नहीं करती?
इसे मेरी अकर्मण्यता कह लो या मेरा आत्म-विश्वास ?
मै सुकून में हूँ क्यों कि -
मुझे संतोष है अपनी उप्लब्धियों पे और अपने उन सपनों पे -
जो मुझे और मेरे भगवान को, मेरी आस्था को मेरे अन्दर-आज भी जीवित किए हुए हैं।
जिससे ---
मेरे अन्दर समाई सपनों को जीवंत करने की जीजिविषा कहीं ख़त्म न हो जाय और-
यही चंद बातें  कहीं उदाहरण न बन जाएँ ----
आगे आने वाली पीढयों को  -
मेरे सफलता के पैमाने को नापने की।।।"


Friday, August 31, 2012

अम्मा तुम चली गईं .....

अम्मा तुम चली गईं .....
अम्मा तुम चलीं गईं ....

पर
तुम हमेशा याद आओगी
जन्मों जन्मों तक ...
हमसब में समाओगी
अनवरत-अनवरत- अनवरत !

आपके चरणों को सिर रख के प्रणाम!
आपके उन स्नेहिल हाथों को प्रणाम जिन्होंने लाखों बार हम सब को आशीष दी!
आपके उन आंसूओं को भी प्रणाम जो सैकड़ों बार हमसब के भले के लिए भगवान् के सामने निकले!
उस प्यारे मुखड़े को बार बार प्रणाम जिसने सैकड़ों बार अपने बच्चों को चूमा
और
क्या कहूँ???
बस इक बच्चा अपनी सदैव को बिछ्ड्ती माँ से क्या कहे?
आप सिर्फ हमारी माँ नहीं थी!
दरअसल आप हम सब की "अम्मा' थीं सिर्फ "अम्मा"!

आप चिंता मत करना बिलकुल मत करना-
क्यूँ कि -
आप तो हमेशा हम सब के पास रहोगी -
तन में - मन में;लहू में -साँसों में -
इस जन्म में -उस जन्म में -जन्म -जन्मों में
हर जनम में ...
हमें मार्गदर्शन देने के लिए,संबल देने के लिए और सहारा देने के लिए !
पर अम्मा .....
हम बहुत रोएँगे भी ...
क्यों कि ...
अब हमें आपका आँचल कैसे मिलेगा?
आँचल का वो छोर कैसे मिलेगा जिससे हमारी अम्मा हमारे आंसूं पौंछती थी?

बस अम्मा भगवान् से यही कहना कि -
जन्मों जन्मों तक हमारी अम्मा-
हमारी अम्मा ही रहें !

अम्मा अम्मा अम्मा
मेरी अम्मा -हम सबकी अम्मा !
शत शत वंदन !
चरण स्पर्श!
अश्रुं पूरित श्रधांजलि!


Friday, August 24, 2012

क्यूँ भूलता जा रहा हूँ ?




क्यूँ भूलता जा रहा हूँ -
दीवाल पे टंगी उन अपनों की तस्वीरों को-
जिन्होने एक ज़िन्दगी गुजारी हमारे साथ?
जो हमें इस दुनिया में लेकर आये -
संघर्ष कर के, हमें बड़ा और होनहार बनाया!
और.....
अपने बहुत कुछ सुनहरे सपनों और ख्वाबों को त्याग कर
हमारे सपनों को हकीकत बनाया !

क्यूँ भूलता जा रहा हूँ -
उनको- जिनकी फोटो पे हर बरस दीवाली पे;माला बदलना अब भारी लगने लगा है ?
जिनकी फोटो और यादों पे जमी धूल को साफ़ करना अब पुरानी आदत हो गई है?
और अब उनके चित्र के सामने दीया और अगरबत्ती लगाना औपचारिकता बन कर रह गई है?
और....
उनके सामने जा के उनसे मन की मुराद मांगना तो बीते दिनों की बात हो चुकी है ?
और और....
न जाने कब से उनकी याद में,उनके प्यार में,उनके दुलार में और बिछोह में मेरी आँखों में आँसूं नहीं झिलमिलाये?
पता नहीं क्यों?
न जाने क्यों???

भूलने की आदत तो देखिये-
-भूल गया घर के उस पहले 'ब्लैक एंड वाईट' टी.वी.को जो कभी प्यारे पापाजी बड़े जतन से अपने बच्चों के लिए लाये थे!
-भूल गया उस फिलिप्स के रेडियो-टेप- रेकॉर्डर 'टू -इन वन ' को;जो कभी पापा हमें गाना सुनाने को लाये थे!
-भूल गया उस टूटी हुई 'रेवोल्विंग चेएर' को जिसपे बैठ के पूज्य पापा ने जीवन की 'ऊँच-नीच' अपने बेटों को सिखाई-पढाई थी!
भूल गया अलमारी के उन 'हैंगरों' को जिनपे कभी पापा की शर्ट्स-पैंट टंगती थी!

जीवन की आप-धापी में भूल गया सब कुछ पर....
नहीं भूला सिर्फ अपने माँ -पापा को-
उनके जज्बे को,उनके संघर्ष को और उनके जतन को -
जिसके कारण आज मेरा अस्तित्व है वर्ना ....
मेरा क्या होता ?

आओ याद करें उन्हें जिन्हें हम धीरे धीरे भूलते जा रहे हैं !
हाँ !हम व्यस्त हैं -हम भी अपने बच्चे पाल रहें हैं ,पर इसका मतलब यह तो नहीं कि-
-हम अपनी जड़ों को बिसरा दें?
-हम अपनी उर्वरा शक्ती को भूल जायें ?
-हम अपनी दुआओं को भूल जाएँ?
-हम अपनी छाया को भूल जाएँ जिसकी ठंडक और उस छाँव को बिसरा दें जिसने
-अपने दामन और आँचल में हमें पाला और इस लायक बनाया कि
आज हम हैं!