Friday, November 2, 2012

शाश्वत? निर्मल? अमर? पावन? या पवित्र?

 "तुम हमेशा मुझ से आगे रहती हो-
प्रेम में,समर्पण में और पूजा में। 

क्यों कि -

तुम्हारा प्यार मेरे प्यार से ज्यादा है। 
और- 
तुम बहुत आगे हो -बहुत आगे .......
भगवान् और पूज्य पापा से बातें करने में-
और-
उनसे मेरे लिए सब-कुछ मांगने में।।

यही कुछ चिरंतन सत्य हैं जो बनाते हैं तुम्हें -
दुनिया से बिलकुल अलग और अजब।

तुम्हारे प्यार को क्या कहूं???
शाश्वत? निर्मल? अमर? पावन? या पवित्र?

कुछ समझ नहीं आता क्यों कि -
मै ठहरा टेढ़ा-मेढ़ा "complicated" इन्सान और कहाँ तुम?
 मेरी सिर्फ मेरी ......
इस जन्म में मेरी .........
उस जन्म में भी मेरी ...........
और अगले जन्म जन्मान्तरों में भी सिर्फ मेरी!

मै इस लायक नहीं था कि -तुम मुझे मिलो-या 
तुम मुझे सिलो ........
तुम मुझे लिखो
या जन्मो-जन्मो तक 
मुझे हर जन्म में मिलो।।
पर .....
तुम मुझे मिलीं;
और ....
यही बात कहती है कि -
जीवन कर्म के साथ भाग्य प्रधान भी होता है।
जीवन जन्म-जन्मान्तरों से बंधा हुआ है।
और-
भगवान सबका है!!"


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